tag:blogger.com,1999:blog-1791661064823014117.post1299335356069284928..comments2007-10-30T00:15:25.087-07:00Comments on हफ़्तावार: पत्ता बुहारने वाली औरतेंराकेशhttp://www.blogger.com/profile/09355343165726493984noreply@blogger.comBlogger8125tag:blogger.com,1999:blog-1791661064823014117.post-11662516895133028672007-10-30T00:15:00.000-07:002007-10-30T00:15:00.000-07:00नॉस्टैल्ज़िया से भरा आत्मीय चित्रण . अपने बचपन के ग...नॉस्टैल्ज़िया से भरा आत्मीय चित्रण . <BR/><BR/>अपने बचपन के गांव में पहुंच गया . पर क्या अब जाने पर गांव और गांव की अमराइयां वैसी मिलेंगी हमें ?Priyankarhttp://www.blogger.com/profile/13984252244243621337noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1791661064823014117.post-74234819070568470362007-10-29T23:07:00.000-07:002007-10-29T23:07:00.000-07:00विनीत भाई, नहीं कॉम्पलेक्स न पालिए. चाहिएगा त अगली...विनीत भाई, नहीं कॉम्पलेक्स न पालिए. चाहिएगा त अगली मर्तबा आपको भी लिए चलेंगे अपने गांव और फिर देख-परख कर दो-चार बात आप गोहे-बगाहे पर लिख दीजिएगा.<BR/> घुधूती बासूतीजी आपको अच्छा लगा मेरा ये खेप, जानकर मुझे भी अच्छा लगा. बस आते रहिए इस द्वारे भी. गांव-जवार में ऐसे ही टहलाता रहूंगा. <BR/>अमरजी शुक्रिया आपका. बेलाजी चालीस को छूने वाले हैं. अब बोतूसवारी की उम्र नहीं रही उनकी. टरेक्टर की सवारी कर रहे हैं आजकल वो. डराइबर हैं. ऐसे ही आते रहिएगा हफ़्तावार पर.राकेशhttp://www.blogger.com/profile/09355343165726493984noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1791661064823014117.post-23760792962602611582007-10-29T22:45:00.000-07:002007-10-29T22:45:00.000-07:00आपके गाछी के बारे में जान के बहूत मज़ा आया , और वो ...आपके गाछी के बारे में जान के बहूत मज़ा आया , और वो बोतू की सवारी वो तो और भी मजेदार थी .आजकल किसकी सवारी कर रहे हैं बेला जी ?Amar Rathodehttp://www.blogger.com/profile/14493739526034151612noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1791661064823014117.post-49363533204136934022007-10-29T22:02:00.000-07:002007-10-29T22:02:00.000-07:00ऐसा सुन्दर व जीवन्त वर्णन किया है कि हम भी लगता है...ऐसा सुन्दर व जीवन्त वर्णन किया है कि हम भी लगता है आपकी गाछी घूम आए । <BR/>घुघूती बासूतीMired Miragehttp://www.blogger.com/profile/06098260346298529829noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1791661064823014117.post-80890823183051396202007-10-29T20:34:00.000-07:002007-10-29T20:34:00.000-07:00आपका पोस्ट पढ़कर अपने भीतर एक कॉम्प्लेक्स पैदा होत...आपका पोस्ट पढ़कर अपने भीतर एक कॉम्प्लेक्स पैदा होता है कि मैं भी गांव से क्यों न हूं और जो लोग गांव के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं आपका पोस्ट इन्हें बताता है कि गांव में भी गर्व करने की कई चीजें है। ये गुड़गांव के फार्महाउस मेंबी जाकर नहीं मिलेगा भाई।विनीत कुमारhttp://www.blogger.com/profile/09398848720758429099noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1791661064823014117.post-89647656142746801812007-10-29T20:20:00.000-07:002007-10-29T20:20:00.000-07:00शुक्रिया मित्रों हौसलाअफ़ज़ाई के लिए. ऐसा लगता है,...शुक्रिया मित्रों हौसलाअफ़ज़ाई के लिए. <BR/>ऐसा लगता है, जब भी गांव जाता हूं गांव की एक-एक चीज़ें बुलाकर कुछ कहती है, शिकायत करती है. देखो मैं किस हाल में पहुंच गयी, क्या-क्या किया तुम्हारे घर, परिवार और समाज वालों ने हमारे साथ ...<BR/><BR/><BR/>मुझे लगता है तेज़ी से बदलती इस दुनिया में एक शहर-गांव का फ़र्क मिट-सा गया है और ग्रामीण संस्कार और सम्पदा नए विकास के लिए जबरन क़ुर्बान किए जा रहे हैं.<BR/><BR/>ख़ैर, यदा-कदा आपको झेलाता रहूंगा :))राकेशhttp://www.blogger.com/profile/09355343165726493984noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1791661064823014117.post-65790311070504744322007-10-29T07:53:00.000-07:002007-10-29T07:53:00.000-07:00बड़ा जीवंत चित्रण करते हो राकेश भाई. एक एक दृश्य उभ...बड़ा जीवंत चित्रण करते हो राकेश भाई. एक एक दृश्य उभरता है चलचित्र की तरह. बहुत उम्दा. तभी तो इन्तजार लगा रहता है.<BR/><BR/>यह भी मजेदार रहा:<BR/><BR/>सबजा (पकने पर इसमें कीड़ा लग जाता था. अंचार बहुत अच्छा होता था उस आम का. किसी को मुफ़्त में देना होता तो घर वाले इसे ही याद करते थे). <BR/><BR/>हा हा!!! :)Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1791661064823014117.post-70665536974428421052007-10-29T07:50:00.000-07:002007-10-29T07:50:00.000-07:00फणीश्वर नाथ रेणु की माटी का असर अभी बीता नहीं है, ...फणीश्वर नाथ रेणु की माटी का असर अभी बीता नहीं है, आसा है, बीतेगा भी नहीं। आपके ब्लॉग ने गांव की याद बिल्कुल ताजी कर दी। हां, मेरा सौभाग्य रहा कि मैं स्कूली पढ़ाई के दिनों गांव में ही रहा, सो मुझे उन सुखों की दीघॅ अनुभूति हुई, जिसकी कसक आपने जताई है। आंचलिक शब्दों का अंजुरी भर-भर कर किया गया प्रयोग मन को छू गया। आमों के नाम-----ये तो मेरे लिए भी बस इतिहास की ही बातें हैं। हृदय के अन्तस्तल से कोटिशः साधुवाद।manglamhttp://www.blogger.com/profile/09256454129822743663noreply@blogger.com