tag:blogger.com,1999:blog-1791661064823014117.post3686842080950756365..comments2007-10-25T00:06:46.922-07:00Comments on हफ़्तावार: चाचीजी कड़ाही ख़रीदने निकलींराकेशhttp://www.blogger.com/profile/09355343165726493984noreply@blogger.comBlogger4125tag:blogger.com,1999:blog-1791661064823014117.post-46467191669657950072007-10-25T00:06:00.000-07:002007-10-25T00:06:00.000-07:00मित्रोंअच्छा लगा कि आपको ये संस्मरण लगा. दोस्त वैस...मित्रों<BR/><BR/>अच्छा लगा कि आपको ये संस्मरण लगा. दोस्त वैसे तो हम सारे शहरी बाबू हो गए हैं लेकिन गांव जाने पर एक-एक चीज़ लगता है कि बुला कर कुछ कह रही है. शोध-वोध की दुनिया का जीव हूं तो मुझे तो हर चीज़ और प्रतीक जो गांव में दिखती है, शोध के लायक़ माकूल जान पड़ता है. अच्छा लगता है जब आप जैसे मित्र हौसलाअफ़जाई करते हैं तब. और तो और गांव-जवार से निकलने वाले अख़बार भी नहीं लिखते हैं अब इन चीज़ों के बारे में. मुझे अच्छा लगता है ये लिखना. कोशिश करूंगा कि निरंतरता बनी रहे.<BR/><BR/>शुक्रियाराकेशhttp://www.blogger.com/profile/09355343165726493984noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1791661064823014117.post-57004158886745242442007-10-24T06:20:00.000-07:002007-10-24T06:20:00.000-07:00क्या चित्र खींचा है मित्र-एकदम जीवंत. मुझे लग ही र...क्या चित्र खींचा है मित्र-एकदम जीवंत. मुझे लग ही रहा था कि चाची लेंगी नहीं कड़ाही-और बुढऊ का समय अलग खराब होगा. सब चाची ऐसी ही होती हैं क्या?? गाँव की याद हो आई. बहुत खूब. मजा आ गया.Udan Tashtarihttp://www.blogger.com/profile/06057252073193171933noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1791661064823014117.post-24592692002603789862007-10-24T03:23:00.000-07:002007-10-24T03:23:00.000-07:00आंय हो विनीत जी?इ आपको तसला दिखता है , उकी चाची अभ...आंय हो विनीत जी?इ आपको तसला दिखता है , उकी चाची अभियो kadhahii पकडले ही हैं और उ बर्तानमा बला sametiyo रहा है और भुन्भुनाइयो रहा है की न लेना है त दीजिये न चले अब.Dr. Ajit Kumarhttp://www.blogger.com/profile/10047691305665129243noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-1791661064823014117.post-71461066371053417442007-10-23T23:09:00.000-07:002007-10-23T23:09:00.000-07:00ए भइया, हम ठेठ शहरवालों को आप कदम से बूडबक समझते ह...ए भइया, हम ठेठ शहरवालों को आप कदम से बूडबक समझते हैं का। बात किए कडाही के और फोटू दिखा रहे हैं भात पकावेवाला तसला के। अच्छा इ बताइ इ तसला के का दाम पड़ी,एगो खरीद के रख लेम।जे दिन हॉस्टल बंद रहतै, उ दिन झोल भात पकाइव।<BR/>मान गए सर, आपकी हर पोस्ट हमें जबरदस्ती बचपन में ठेलती है। चाची की जगह मेरी मां होती तो कहती कि आपही के लि चरचल्ला से उतर के आएं हैं और दाम कम नहीं करिएगा और फिर कोशिश करती कि दूकान के रिजेक्टेड कपडे से कडाही बदलकर ले ले ।<BR/>मजा आ गया सर, लेकिन फोटू यही सबका लगाइए, गांव में बिकनेवाली गुलाबी हवा मिठा की नहीं, अपने को रोकना मुश्किल होगा।विनीत कुमारhttp://www.blogger.com/profile/09398848720758429099noreply@blogger.com