14.7.08
अकथ कथन अर्थात ज़ेहन के गुप्त रोग
‘‘एक रोज़ शायद ... लोग ये सवाल पूछेंगे कि अपनी सबसे पुरशोर कारस्तानियों पर
छयी चुप्पी को बनाए रखने पर हम इतने आमादा क्यों हैं।’’
मिशेल फूको, द हिस्ट्री ऑफ़ सेक्शुऑलिटी, खंड I
कनॉट प्लेस के आउटर सर्कल के गलियारे में बने मोड़ के पास एक छोटा सा कोना। इसी कोने की फुटपाथ पर एक आदमी पॉर्न साहित्य बेच रहा है। पास ही में एक लड़का दिल की शक़्ल वाले रजतरंगी गुब्बारे बेच रहा है। दोनों के पीछे की दीवार पर मीरा नायर की कामसूत्र का एक बदरंग हो गया पोस्टर लगा हुआ है। पोस्टर के पास ही सिक्के से चलने वाला एक फ़ोन है जो अब चलता नहीं है। जल्दबाज़ी में ही सही लेकिन बहुत सारे लोगों ने उस दीवार पर अपने-अपने दिल की बात कह डाली है। इस ग़रज़ से कि किसी की लापरवाह नज़र से वह चूक न जाएँ, तक़रीबन सभी ने अपने संदेशों के कुछ ख़ास हिस्सों को पूरी एहितयात के साथ रेखांकित भी कर दिया है। इन पैग़ामों में लोगों ने अपने नाम और फ़ोन नंबर दिए हैं और पढ़ने वालों को बात करने का खुला न्यौता भी। ज़्यादातर लोगों ने रात के एक ख़ास वक़्फ़े में बात करने की इच्छा ज़ाहिर की है।
वाणी थक कर चूर हो जाने की हद तक सेक्स के बारे में बात करने को तैयार है बशर्ते बात करने वाला शख्स 18 से 25 साल के बीच हो. मनोज को ऐसे मर्दों से बात करने में दिलच्स्पी है जो मर्दों से बात करने में दिलचस्पी रखते हैं। अनीता सिर्फ़ एसएमएस के ज़रिए ताल्लुक क़ायम करना चाहती है। वह अपने फ़ोन पर नहीं बल्कि एक पेजर पर एसएमएस मंगवा रही है। उसका वादा है कि अगर उसे आपका संदेश अच्छा लगा तो वह भी यक़ीनन जवाबी एसएमएस भेजेगी।
इन लघुकथाओं के लेखक कौन है? आउटर सर्कल की एक पपड़ाई सी दीवार के पास कुछ लम्हा ठहरने वाले ये लोग मच्छरों से कुश्ती लड़कर अजनबियों को अपने जिस्मानी अहसासात के बारे में बताते हुए पूरी रात जागकर क्यों गुज़ार देना चाहते हैं? इसमें लेन-देन या पैसे का कोई चक्कर नहीं है। ये वैसे दिलकश इश्तहारी बोर्ड नहीं जिनके ज़रिए आपको एंटीगुआ के किसी नंबर पर बात करने की दावत दी जाती है और, किसी कोने में आहिस्ते से ये जानकारी भी दे दी जाती है कि आपकी कॉल पर आईएसडी दरें लागू होंगी। ये इश्तहार आपको लाइव चैट की दावत देते हैं। पर ये चैट न तो जीवंत होती है और न ही चटपटी। ऊपर हमने जिन पैग़ामों का ज़िक्र किया है उनको लिखने वाले लोग एस्कॉर्ट कारोबार या मसाज-मालिश के धंधे में लगे ख़वातीनो-हज़रात भी नहीं हैं जो अपने ऑनलाईन इश्तहार और रेट कार्डों के ज़रिए मुक़म्मल ज़ेहनी और जिस्मानी संतुष्टि का यक़ीन दिलाते हैं। शायद यह स्कूली बच्चों की शरारत हो। अगर ऐसा है भी तो उनके ये संदेश अतीत की यादगार के तौर पर अगले मौसम की पुताई तक इस दीवार पर बने रहेंगे - एक बड़े, उदास शहर में वाबस्तगी की गुज़ारिशों की तरह। जिन्होंने इन दीवारों पर ये पैग़ाम लिखे हैं, उसके बारे में क्या कहा जाए? ये लोग ऐसी कौन सी बेजान हवा में साँस लेते हैं कि उन्होंने ज़िन्दगी से मुँह मोड़ शाँति और सुकून के लिए इस दीवार और टेलीफ़ोन का सहारा ले लिया और इस बचे-खुचे आनंद में ही ज़िन्दगी का समूचापन ढूँढ़ने लगे हैं।
इस कराहती दीवार को मैने अपनी एक ख़ास तलाश के दौरान देखा था। उस वक़्त मैं दिल्ली में प्यार, वासना और चाहत के निशान खोज़ रहा था। मैं शहर की सड़कों और उसे जोड़े रखने वाले छोटे चौराहों पर चाहत, इज़ाहर व इक़रार की कहानियों और नृत्य-कथाओं को पढ़ना चाहता था। अब तक की दिल्लियों, यानी रसख़ान की दिल्ली, मीर और ग़ालिब की दिल्ली इन सबके भीतर रहा-बाट की बोल-चाल में काम-कला की साज-सज़ावट ख़ूब दिखाई देती है। दिल्ली की इन पुरानी शक़्लों ने मेरी सोच और चेतना पर एक गहरी परछाई छोड़ी है। अब मैं यही देखना चाहता था कि आज के दौर की तेज़ रोशनी में ये परछाईं कितनी टिक पाती है। मैं प्राचीन और आधुनिक दिल्ली की कामेच्छा का नक़्शा बनाना चाहता था। और इस काम के लिए ज़रूरी कुछ उपयोगी किंवदंतियाँ, सबूत और ऐसी ही कुछ दूसरी चीज़ें जुटानी चाहता था। मैं बस अड्डों, मक़बरों, सिनेमाघर की बालकनी में लगी सीटों, कॉफ़ी हाउसों में कोने पर रखी टेबलों की तरफ़ ग़ौर से देखने की ज़ुरूरत या गुंजाइश को दर्ज़ करना चाहता था। मैं चाहता था कि सार्वजनिक पार्कों के झाड़-झंखाड़ और शौचालयों से ख़ुद इन स्थानों को जो कामोद्दीपक हैसियत मिलती है, उसको जाना-बूझा जाए। शुरुआत में मैं बहुत दूर तक नहीं जा पाया। किसी बदतमीज़ वीडियो गेम के पहले ही दौर में ख़राब चाल चल कर लड़खड़ा जाने के नतीज़ों की तरह, आड़ी-टेढ़ी लिखावटों वाली यह दीवार मेरे रास्ते में आकर खड़ी हो गई। अपनी ख़ास भाषा या अल्फ़ाज़ा के कारण, या उनकी कमी से एक ख़ास हैसियत अख़्तियार कर चुकी इस दीवार, इस रुकावट ने मुझे मेरी खोज़ पर आगे बढ़ने से रोक दिया। अपनी खोज़ के लिए मुझे इस दीवार से आगे जाना ज़रूरी था और इसी कोशिश में मैं वहाँ जा पहुँचा जिसका ज़िक्र में करने जा रहा हूँ।
मैंने वाणी को फ़ोन घुमा दिया। रात के ग्यारह बज चुके थे। मैंने उससे जानना चाहा कि क्या मैं उसी वाणी से बात कर रहा हूँ जिसने कनॉट प्लेस के आउटर सर्कल में एक दीवार पर अपना फ़ोन नंबर लिख छोड़ा था।
‘‘यहाँ कोई वाणी नहीं रहती’’, एक थकी हुई सी आवाज़ आई। आवाज़ से लगता था कि वह किसी औरत की है और उसकी उम्र पच्चीस से सैंतीस साल के बीच होगी। ऐसा लगा कि आवज़ तो वाणी की है लेकिन जैसे वह अपने नाम की पहचान से भाग रही है।
मैं लगा रहता हूँ। अपनी इच्छा बताते हुए मैं उसे इस बात का भरोसा दिलाता हूँ कि मैंने होश गँवा देने की हद तक सेक्स के बारे में बात करने के लिए फ़ोन नहीं किया है, बल्कि मैं तो इस बारे में बात करना चाहता हूँ कि लोग दीवारों पर इस तरह के संदेश क्यों छोड़तें हैं। मैंने उससे कहा कि अब भी अगर वह चाहे तो फ़ोन काट सकती है। उसने फ़ोन नहीं काटा। अब उसने मुझसे एक सीधा सवाल किया - क्या मैं जेबोनेयर या फैंटेसी के लिए क़िस्से-कहानियाँ ढूँढ़ रहा हूँ। मैंने कहा कि मैं लिखता तो हूँ मगर मैं पत्रकार नहीं हूँ और अब तक डेबोनेयर या फैंटेसी में छपने का सौभाग्य नहीं मिला है। फिर पूछता हूँ कि क्या वह अब भी बात करने को तैयार है।
‘‘सेक्स’’, वह कुछ इस तरह बोलती है मानो बतियाने का मुद्दा खोल रही हो। कहा ‘‘अगर हम सेक्स के बारे में बात नहीं कर सकते तो फिर बात करने का क्या तुक है?’’
मेरे हाव-भाव में एहतियात का पुट है, आवाज़ बंद हो जाती है। मैं एक फ़ासला बनाए रखने की कोशिश कर रहा हूँ मुझे लगता है कि फ़ोन करके मैं बेमतलब ही इस झमेले में फँस गया हूँ। तभी उसने मेरी मुश्किल थोड़ी आसान कर दी। उसकी आवाज़ आयी, ‘‘क्या आपको कोई समस्या है? निजी ज़िन्दगी की कोई परेशानी? कोई गुप्त रोग?’’
‘‘तुम ये काम क्यों करती हो?’’ मैं पूछता हूँ।
उसने कहा, ‘‘तुमने ये फ़ोन क्यों किया?’’ और फ़ोन काट दिया। मैं इस अहसास के साथ फ़ोन के सामने बैठा रह जाता हूँ कि जवाबी सवाल पूछ कर उसने मेरे सवाल का जवाब ही तो दिया है। इस बात का आग्रह करके कि मैं संपर्क साधने की अपनी इस औचक कोशिश पर ज़रा ठहरकर सोचूँ। बड़ी महीन चतुराई से उसने ज़ाहिर कर दिया कि जिस तरह मैं उसे दीवार के पर्दे से खींचकर उससे बात कर सकता हूँ उसी सहजता से वह मेरे अस्तित्व को स्वीकार या नकार सकती है। किसी फ़ोन नेटवर्क के आउटर सर्कल पर हुआ यह संक्षिप्त साक्षात्कार जैसे रूहानी अंतरंगता का क्षण रहा हो।
मैं वाणी के बारे में सोचने लगता हूँ। एक ऐसी औरत जिसका नाम ‘ध्वनि’ या ‘शब्द’ का संस्कृत पर्यायवाची है। एक ऐसी औरत जो देह से ज़्यादा एक आवाज़ है - एक ऐसी आवाज़ जो किसी के भी कानों में गूँज सकती है। एक ऐसी औरत जो जिस्मानी तौर पर हो या न हो, मगर टेलीफ़ोन के तारों में क़ैद किसी भूत की तरह कहीं न कहीं है। सोचते -सोचते मुझे बचपन में सुनी एक कहानी याद आ गई जो अभी भी उस वक़्त मुझे पल भर के लिए चिंता में डाल देती है जब रात-बिरात अचानक फ़ोन की घंटी बज उठती है। मैं सोचने लगता हूँ कि अगर ऐसा ही है तो मर चुकी या क़ैद इच्छाओं के न जाने कितने भूत और जिन्न मेरे शहर की हवा में डोल रहे होंगे। निज़ामुद्दीन दरगाह की चारदीवारी के भीतर बनी छोटी-छोटी खोहों में ऐसे कई माहिर बैठे हैं जो ‘ऊपरी हवा’ में मौज़ूद जिन्न के सताये हुओं का इलाज करते हैं। क्या उन्होंने कभी मेरे शहर में कामना की सँकरी गलियों में भटकते भूतों पर ध्यान दिया है? क्या शहर की ख़त्म हो चुकी कामेच्छा में दोबारा जान आने के संकेत दिखाई देते हैं?
10.7.08
सेक्स रेवॉलूशनः ज़िन्दाबाद
1990 की बात है, दुनिया बदल रही थी जैसे कि हमेशा बदलती है। साहिबाबाद में तब लड़के ही लड़के दिखते थे। Correspondence course करते लड़के। Competition की तैयारी के इंतज़ार में लड़के। नौकरी न होने पर देहज की आस में बैठे लड़के। ...और कुछ यूँ ही खाली लड़के।। दरअसल, सूचना क्रान्ति, नई आर्थिक नीतियों और अजीबो ग़रीब शिक्षा तंत्र ने ऐसे पढ़े-लिखे नौजवानों और कुछ पुराने जवानों की एक फ़ौज़ तैयार कर दी थी जो Cable T.V. देखे-देख कर ऊँचे ख़्वाब देखने लगे पर भविष्य की अनिश्चितता और साहिबाबाद के रमणीय माहौल के कारण कार्य तुच्छ करने लगे। ये ख़तरा पैदा हो गाया कि इन लड़कों का असंतोष और नैसर्गिक उर्जा कहीं समाज में क्रान्ति लाने के लिए इस्तेमाल न हो जाए। पर उनका सारा जोश Cricket खेलने और Cricket पर लम्बी बेबुनियाद और तर्क़हीन चर्चाओं की ओर मुड़ गया। और भारत जैसा महान देश एक औपनिवेशिक खेल की बदौलत एक बार फिर सामाजिक असंतुलन और बदलाव से बच गया।
साहिबाबाद में अन्य चीज़ों की तरह ‘चक्कर’ में sex को पूँजीवाद के प्रतीक के रूप में देखा जाता था। यहीं कारण था कि चक्कर चलाने के सारे आयाम Public Domain में होने के बावजूद sex को उससे नहीं जोड़ा गया था। और इस प्रकार Love को बुर्जुआ पूँजीवाद से मुक़्त कर साहिबाबाद में चक्कर चलाने का दौर बुलन्द था। जिस प्रकार हर सरकारी तन्त्र में एक अभिजात्य शासक वर्ग होता है (उसी प्रकार) साहिबाबाद के कुछ चक्कर अन्य की अपेक्षा ज़्यादा महत्व लिए थे। शायद ही कोई चक्कर हो जिसके मानक फूल, गिफ़्ट्स, फ़िल्में, और पार्क होने की बजाय धूल, भयावह गर्मी, थकान, बोरियत और भीड़ हों। परन्तु साहिबाबाद की जीवन्त परम्परा के अनुसार यहाँ का सबसे लम्बा और सर्वाधिक लोकप्रिय चक्कर इन उपरोक्त चीज़ों की बदौलत ही याद किया जाता है।
गंजे और गुड्डी के चक्कर का एक प्रतीकात्मक दिन इस प्रकार होताः
सुबह मेहँदी घोलने की तैयारी के बीच एक फ़ोन। फ़ोन के बाद गुड्डी का विपिन को यह बताया जाना कि गंजे ने साहिबाबाद स्टेशन पर मिलने को कहा है। अब इस विषय पर यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि ठीक दोपहरी में एक बजे वाली ट्रेने लेना ही सही है, वर्ना बालों में मेहँदी लगाना रह जाएगा। वैसे भी मेहँदी की permanence को चक्कर की क्षणभंगुरता की अपेक्षा अधिक नम्बर मिलते थे। बाक़ी मंडली का इस बात से आनन-फ़ानन में ही अवगत हो जाना होता था कि गंजे और गुड्डी निकल पड़े हैं मिलने और इसके अनुसार अपनी दिनचर्या को सेट कर लो। इधर शाम को वापसी पर मंडली का मिंटो ब्रिज स्टेशन पर पहुँचना अनिवार्य था। वहाँ गंजे और गुड्डी अलग-अलग बैठे होते। गंजा अपनी चिर-परिचित मुद्रा में मुँह फुलाए और मंडली की सार्वजनिक बैठक का इंतज़ार, क़मीज़ के दो बटन खोलकर कर रहा होता। गुड्डी सबसे पहले ख़ुश होकर अलग से आज की नोंक-झोंक का कारण बताने को उत्सुक होती। कारण वही तुच्छ सा - ‘यार सामने रंगा अंकल खड़े थे और ये मेरे कंधे पर सिर रख रहा था।’ गंजे का कहना था कि ‘उस दिन तो अपने भाई के कंधे पर बड़े आराम से सिर रख लिया था।’ और यह कहकर दोनों कई घंटे गर्मी में वापस जाने वाली ट्रेन का इंतज़ार, जो क़रीब 5 घंटे बाद थी, कनॉट प्लेस के वाहियात चक्कर लगाने में व्यस्त हो जाते और सड़ी गर्मी की चपेट में लहुलुहान हुए शरीर की दशा के लिए मन ही मन एक दूसरे को दोषी ठहराने लगते। गुड्डी तो आज शाम को होने वाली बैठक में आज की छीछालेदार का आनन्द लेने के लिए बैचेन हो उठती। बिना आवाज़ किए दोनों एल-ब्लॉक में निरूलाज़ के सामने वाले चबूतरे पर जा बैठे। वहाँ बैठे चाय वाले ने उत्तेजित हो उन्हें सलाम किया जिसका गंजे पर कोई असर नहीं हुआ। पर गुड्डी ने एक फ़ीकी मुस्कान बिखेरकर चाय वाले को मानो सूचित किया कि आज भी मौसम ख़राब है। अब धीरे-धीरे मंडली के सदस्यों का आगमन शुरू हुआ। गिन्टी जो आस-पास ही मंडरा रहा था, अचानक प्रकट हुआ और गुड्डी की तरफ़ मुस्कुराया जिससे गंजे की भृकुटी तनी और उसने बेमतलब में 50 मीटर का एक चक्कर लगाया। गिन्टी और गुड्डी ने शीघ्रता से इस दौरान गंजे की बुराई कर लो तथा यही नहीं, उसे impractical घोषित कर ऐसे बैठ गए जैसे कि Supreme Court ने किसी याचिका पर अंतिम फ़ैसला दे दिया हो। चाय की चुस्कियों के दौरान ही दीपक खट्टर और अमित का प्रवेश हो गया, जो कुछ नई pant-shirt कम भाव में ख़रीद कर लाए थे। गिंटी ने उनमें से कुछ को वहीं पहनने की ज़िद की और कुछ पर व्यंग्य बाण छोड़े। गंजे ने चाय पीकर फिर से mainstream में प्रवेश किया और इल्ली के आते ही उसे फ़टकार लगाई कि वह वहाँ क्यों आया है।
उसका नाम इल्ली इसलिए पड़ा क्योंकि चने के झाड़ पर लगने वाले कीड़े की तरह वह कहीं भी किसी भी समय प्रकट हो सकता था तथा लाख कोशिश के बाद भी चिपका रहता था। इल्ली ने अपने नाम को चरितार्थ करते हुए इस फटकार को दरकिनार किया और गंजे से लिपट गया और साथ न छोड़ने का बिन माँगा वादा किया। अब शुरू हुआ दोपहरी में कनॉट प्लेस के फेरे लेने का सिलसिला जो बीच में चाय की तलब और भूख, दोनों विषयों पर होने वाली गहन चर्चा के लिए कभी-कभी रुकता। चर्चा का विषय वही होता, अब क्या करें तथा कहाँ क्या खाएँ। लोकतंत्र की मर्दायदाओं का पालन करने की धुन में कुछ फ़ैसला न हो पाता था ‘मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक’ वाली कहावत को सही सिद्ध कर वापस चबूतरे के चाय वाले का बिज़नेस बढ़ाया जाता। सामने निरूलाज़ में जाने की मंडली के छोटे सदस्य जैसे दीपक और अमित की इच्छा गंजे द्वारा मार्क्स़वादी दुराग्रह के चलते कठोरतापूर्वक दबा दी जाती। ये अलग बात है कि जब कभी रोमांस का थर्मामीटर अच्छा अंक दिखा रहा होता तो गंजे के द्वारा निरूलाज़ में जाना एक सामान्य बात होती। बीच-बीच में गंजे के द्वारा गाए गानों से उसकी मनः स्थिति का अन्दाज़ा लगाया जा सकता था। मसलन, अगर गाना होता था ‘समाँ है सुहाना’ तो इसका अर्थ होता था, शाम हो रही है सारा दिन तो बर्बाद हो गया अब थोड़ा मेल बढ़ाया जाए। वैसे भी विपिन के आने का समय हो गया चम्पी, जो लुफ़्थांसा (Lufthansa) में मैनेजर था, के आने से मंडली में sophistication की मात्रा बढ़ जाती और गंजे और गुड्डी के रोमांस से थके माहौल में अचानक बातचीत कॉरियर के सवाल के आस-पास झूमने लगती तथा इसी के साथ खान-पान पर किया जाने वाला ख़र्च भी भारत के बजट की तरह बिना बताए बढ़ जाता। इधर कूड़ी ने कुत्ते की भयंकर आवाज़ निकाल कर मंडली को अपने आने की सूचना दी। उसका मंडली को भीड़ भरे स्टेशन पर ढूँढ़ने का यही नुस्ख़ा था। इस कुकरहाव के बाद गंजे और गुड्डी के विषय पर हो रही गहन बातचीत पर विराम-सा लग जाता। वैसे बातचीत का आशय घूम-फिर कर यही था कि - क्या किया जाए? उसको कभी-कभी possessiveness, relationship में freedom तथा प्यार की सार्थकता जैसे विषयों के भार से इस तरह दबाया गया था कि इन शब्दों को सुनते ही लोगों को उल्टी का भय रहता था। कुल मिलाकर प्रेम, चक्कर, falling in love, और lovering में difference इत्यादि विषयों की लीद इस तरह निकाल दी गई थी कि कोई व्यक्ति इनसे बचने के लिए किसी भी हद तक जा सकता था। यहाँ तक कि स्टेशन पर Dumb Charades भी खेल सकता था। और होता भी यही। शाम की थकान व उमस, दिन भर की शारीरिक कसरत के बाद मंडली चाय की शर्त लगाकर स्टेशन पर Dumb Charades खेलना शुरू करती जिससे गिंटी को आपत्ति होने की वजह से उसे टाइम-कीपर बनाया जाता तथा इस चक्कर में शाम की सारी ट्रेन छोड़ दी जाती। आख़िरी ट्रेन से साहिबाबाद पहुँच वहाँ हारी हुई टीम, जो हमेशा इल्ली और गुड्डी की होती, चाय पिलाती और सब लोग यह निश्चय करते हुए विदा लेते कि दौबारा ऐसा दिन नहीं बिताएंगे। इस निश्चय का हश्र चुनावी वादों की तरह होता। फ़र्क़ इतना था कि इसे टूटने में मात्र दो दिन का समय लगता।
अब यह transition ...
मंडली के महत्त्वपूर्ण सदस्य जैसे दीपक, डिम्पी, अमित, नितिन वग़ैरह किताबी ज्ञान से वंचित मार्क्स़वाद से मुक़्त व क्रान्तिकारिता के अभाव में ख़ुद को मंडली के शीर्ष वर्ग की तुलना में तुच्छ पाकर प्रेम से भी अपने को वंचित रखने लगे। वैसे भी platonic love के दुराग्रह उनकी समझ से परे थे। रोमांस के प्रति ऊपर से लादे गए विचारों को हज़म करने में उन्हें अपच तो हुई किन्तु फिर भी वे एक अनकही मर्यादा में बँधे रहे। किन्तु जब भारतीय बाज़ार विदेशी माल के लिए खुलने लगे और साहिबाबाद की सड़कों पर ‘द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’, ‘ड्यूहरिग मतखंडन’ की बजाय Chicken Soup for the Soul और दीपक चौपड़ा इत्यादि दिखाई देने लगे तो ऐसे में साहिबाबाद के मस्तिष्क में भी नए सवाल उठ खड़े हुए। लेकिन जिस प्रकार ग्लासनॉस्त की मार से गोर बाचेव धराशाही हुए उसी तरह प्रेम में खुलेपन को लाने के बाद गंजे, विपिन इत्यादि अपने-अपने प्रेम को न बचा पाए। और इस प्रकार से sexual revolution अपने सपूतों को खा गया। मतलब ये कि मंडली के शीर्ष वरीयता प्राप्त चक्करों में लात पड़ने लगी और बौने सदस्यों ने नई क्रान्ति के बिगुल बजा दिए। चेलों ने गुरुओं की Girlfriends मार ली और गुरू, रोमांस की भाषा में, सड़क पर आ गए। लेकिन इससे बहुत पहले अकेले एक व्यक्ति अमित ने अपने से दुगुनी उम्र की औरतों से चक्कर चलाकार साहिबाबाद में नए युग का आह्नान किया तथा ‘Joy of Sex’ नामक किताब का साहिबाबाद में प्रवेश हो गया। साहिबाबाद की ईंटें चीख़-चीख़ कर कहने लगीं कि intellectual प्यार के दिन लद चुके हैं और नए पिरवेश और भूमंडली करण के दौर में प्यार पर भी मंडली के दिग़्गजों की monopoly नहीं रहेगी।
Sex Revolution ज़िन्दाबाद!
साभार: चन्दन शर्मा
9.7.08
योर ऑनर, दिज़ आर माई आर्ग्यूमेंट्स
चन्द्रा निगम पेशे से वकील हैं. दिल्ली में वकालत करती हैं और विभिन्न सामाजिक मसलों पर सक्रिय भी रहती हैं. उनके ब्लॉग से साभार ये पोस्ट साझा कर रहा हूं. कोर्ट-कचहरी की रोज़मर्रा को समझने में शायद ये मददगार हो.
20 अक्टूबर को तीस हज़ारी स्थित मेरे दफ़्तर में एक नोटिस आया. पता चला मुझे आईपीसी 376 यानी बलात्कार के एक मामले में एमिकस क्यूरे नियुक्त किया गया है. आरोपी रामकुमार 13 मई 2007 से तिहाड़ में बंद हैं. 22 अक्टूबर 2007 तक उन्हें कोई वकील नहीं मिला था.
22 अक्टूबर 2007. समय तक़रीबन 11 बजे. रोहिणी जिला अदालत. पहली बार रामकुमार से मिलना था. सेशन जज एस अग्रवाल की अदालत (कमरा नं. 308) पहुंची. एक दुबला-पतला सांवला-सा व्यक्ति, देखकर लगा था जैसे पचपन पार का हो. बाद में पता चला पचास के आसपास का है. डीएपी का एक जवान अपनी दायीं हाथ से रामकुमार की बायीं हाथ पकड़े अदालत में लगी कुर्सियों की आखिरी क़तार में कोने पड़ी एक कुर्सी पर बैठा था और रामकुमार फर्श पर. पीछे गयी और उनसे कहा, ‘रामकुमार घटना के बारे में थोड़ी जानकारी दो’. इतना सुनते ही उनकी आंखें छलक उठी. फफकते रहे, बोले कुछ नहीं. कुछ देर तक बिल्कुल नहीं बोले. बार-बार पूछने पर उन्होंने बस इतना ही कहा, ‘मेरी पत्नी और साढू ने मिलकर मुझे फंसाया है’.
20 अक्टूबर को तीस हज़ारी स्थित मेरे दफ़्तर में एक नोटिस आया. पता चला मुझे आईपीसी 376 यानी बलात्कार के एक मामले में एमिकस क्यूरे नियुक्त किया गया है. आरोपी रामकुमार 13 मई 2007 से तिहाड़ में बंद हैं. 22 अक्टूबर 2007 तक उन्हें कोई वकील नहीं मिला था.
22 अक्टूबर 2007. समय तक़रीबन 11 बजे. रोहिणी जिला अदालत. पहली बार रामकुमार से मिलना था. सेशन जज एस अग्रवाल की अदालत (कमरा नं. 308) पहुंची. एक दुबला-पतला सांवला-सा व्यक्ति, देखकर लगा था जैसे पचपन पार का हो. बाद में पता चला पचास के आसपास का है. डीएपी का एक जवान अपनी दायीं हाथ से रामकुमार की बायीं हाथ पकड़े अदालत में लगी कुर्सियों की आखिरी क़तार में कोने पड़ी एक कुर्सी पर बैठा था और रामकुमार फर्श पर. पीछे गयी और उनसे कहा, ‘रामकुमार घटना के बारे में थोड़ी जानकारी दो’. इतना सुनते ही उनकी आंखें छलक उठी. फफकते रहे, बोले कुछ नहीं. कुछ देर तक बिल्कुल नहीं बोले. बार-बार पूछने पर उन्होंने बस इतना ही कहा, ‘मेरी पत्नी और साढू ने मिलकर मुझे फंसाया है’.
मैंने उनसे पूछा कि अगर मैंने उनकी जमानत की अर्जी लगाई तो कोई उनकी जमानत लेने आ जाएगा? उन्होंने कहा, ‘13 मई से तिहाड़ में हूं, कोई मिलने तक नहीं आया, कैसे कहूं कि कोई जमानत लेने आ जाएगा! मुझे अपनी पत्नी और बेटों से तो कोई उम्मीद नहीं है, पर शायद मेरे बेटी दामाद कुछ कर सकें. लेकिन उन्हें तो पता भी नहीं कि मैं जेल में बंद हूं. लेकिन चलो, मैं चिट्ठी डालूंगा उनके पास.’
रामकुमार की बेटी नीलम और उनकी पत्नी पहली बार 6 नवंबर को मेरे तीस हज़ारी वाले चैंबर में आयीं. मैंने उनसे पूछा कि वे रामकुमार से मिलने क्यों नहीं जाते हैं? नीलम ने कहा, ‘आज हम जेल गए थे और सीधा वहीं से आ रहे हैं. मुझे तो पता ही नहीं था कि मेरे पापा जेल में हैं. मुझे तो तीन-चार दिन पहले ही ये बात मालूम हुई.’ नीलम की मां ने बताया कि वो काम में व्यस्त होने के कारण अपने घरवाले से मिलने नहीं जा सकी. मैंने मुकदमे से संबंधित ज़रूरी दरियाफ़्त के बाद उन लोगों को जाने के लिए कहा. तीन-चार मिनट बाद ही नीलम वापस आयी और रोते हुए बोली, ‘बस मैडम, आप मेरे पापा की जमानत करवा दीजिए. मुझे पता है कि मेरे पापा बेकसूर हैं. मेरी मां, मौसा और संजीरा (जिसने रामकुमार पर बलात्कार का आरोप मढा था) ने मिलकर उन्हें फंसाया है. तीन-चार मिनट बाद ही नीलम वापस आयी और रोते हुए बोली, ‘बस मैडम, आप मेरे पापा की जमानत करवा दीजिए. मुझे पता है कि मेरे पापा बेकसूर हैं. मेरी मां, मौसा और संजीरा (जिसने रामकुमार पर बलात्कार का आरोप मढा था) ने मिलकर उन्हें फंसाया है. उसने आगे बताया, ‘जब से मैंने होश संभाला है मेरी मम्मी हमेशा मौसा के पास ही रहती रही है, हमारे घर तो कभी-कभार ही आती है. तकरीबन आठ-दस मिनट तक उसने मुझसे बातचीत की. पूरी बातचीत के दौरान उसके गालों पर आंसू ढलकते रहे. उसने बताया कि वो जान-बूझकर अपनी मम्मी को छोड़कर वापस आयी है. मम्मी के सामने वो ये बातें नहीं कर सकती थी.’
मैंन उसे ढाढस बंधाया और कहा, ‘चलो, मैं रामकुमार की जमानत की अर्जी कल ही लगा दूंगी’. वो चली गयी. चूंकि ये 376 आइपीसी (बलात्कार) के मामले में मेरी पहली जमानत थी, सो मैंने रामकुमार की फाइल को दो मर्तबा पूरी तरह पढ़ा और अपने सहकर्मी और फौजदारी मामलों के जानकार जतीनजी से भी रायशुमारी की. अगले दिन मैंने रामकुमार की जमानत की अर्जी दाखिल कर दी. बहस के लिए तारीख़ लगी 14 नवंबर 2007. मुकर्रर तारीख़ पर ठीक 2 बजे मैं अदालत पहुंच गयी. भोजनावकाश के बाद जज साहब अपनी कुर्सी पर विराज चुके थे और काम शुरू हो गया था. सवा दो बजे अर्दली ने रामकुमार का नाम पुकारा. सुनते ही मैं जज साहब के सामने खड़ी थी और मेरे हाथ में लगी रामकुमार की फाइल खुल चुकी थी. अदालत-कर्मियों के अलावा समूचा कोर्ट वकीलों, मुवक्किलों और पुलिस वालों से खचाखच भरा था. मेरे और स्टेनो के अलावा ख़ास तरह की मर्दों की दुनिया थी वह. जज साहब बोले, ‘जी वकील साहिबा, बोलिए आपका क्या कहना है इस मामले में?’ मैंने तकरीबन 5-7 मिनट तक जमानत की अर्जी पर अपनी दलील दी. हालांकि कुछ बातें मेरे ज़हन में ही दबी रह गयी. चाहकर भी पता नहीं क्यों नहीं बोलने का हिम्मत नहीं जुटा पायी मैं! इतना ही कह पायी कि ‘योर ऑनर रामकुमार की मेडिकल रिपोर्ट देखें, हमारे खिलाफ़ कुछ भी नहीं है इसमें.’ जज साहब शायद मेरी दलील से सहमत नहीं थे. मुझे भी इसका आभास हो चुका था. उन्होंने मुझसे कहा, ‘वकील साहिबा, आप अर्जी पर ऑर्डर चाहती हैं या विड्रॉ करना चाहती हैं इसे?’ मैंने कहा, ‘यॉर ऑनर, मैंने अर्जी ऑर्डर के लिए ही लगायी है, विड्रॉ करने के लिए नहीं.’ जज साहब ने भौंए तानीं और कहा, ‘तो मैं इसे डिसमिस कर रहा हूं.’ मैंने उनकी बात लगभग काटते हुए कहा, ‘यॉर ऑनर, गिव मी अ शॉट डेट फॉ़र फ़रदर आर्ग्यूमेंट.’ जज साहब ने अपने रजिस्टर के पन्ने पलटे और तारीख़ मुकर्रर की 22 नवंबर 2007. मैं मुंह लटकाए अदालत से बाहर आ गयी. मुंह लटकाकर इसलिए कि मुझे पता था कि ग़लती कहा हुई थी. शायद एहसास था इसीलिए अगली तारीख़ मांग ली थी. ऐसा न होता तो विड्रॉ कर लेती या डिसमिस करवा लेती अगली (उंची) अदालत के लिए. बाहर आते ही जतीनजी को फोन मिलाया, सर नहीं मिली बेल. शायद उन्हें भी एहसास था कि मैं बेल क्यों नहीं ले पायी. लेकिन साथ ही उन्हें मैंने ये भी बताया कि मैंने फ़रदर आर्ग्यूमेंट के लिए एक शॉर्ट डेट ले ली है.
अगली तारीख़. 22 नवंबर 2007. अदालत पहुंची. नज़ारा पिछली तारीख़ जैसा ही. वही मर्दों की दुनिया. मैं और स्टेनो, केवल दो औरतें. भोजनावकाश के बाद फिर से अर्दली की पुकार. रामकुमार का नाम. जज साहब के सामने मैं और हाथ में खुल चुकी फ़ाइल. बेझिझक,पूरे आत्मविश्वास के साथ बहस करने लगी. औरत-मर्द का भेद भुलाकर. इस बार तक़रीबन 20-25 मिनट बहस चली. जो दलीलें पिछली तारीख़ पर मैं नहीं दे पायी थी, हिम्मत बटोर कर पेश की. आगे बढ़ कर और ज़्यादा. वे सारे तथ्य मैंने जज साहब के सामने रख दिए जो पिछली मर्तबा लाज के मारे नहीं रख पायी थी. तमाम दलीलें पेश कर चुकने के बाद मैंने कहा, 'योर ऑनर, दिज़ आर माई आर्ग्यूमेंट्स.
नज़ारा पिछली तारीख़ जैसा ही. वही मर्दों की दुनिया. मैं और स्टेनो, केवल दो औरतें. भोजनावकाश के बाद फिर से अर्दली की पुकार. रामकुमार का नाम. जज साहब के सामने मैं और हाथ में खुल चुकी फ़ाइल. बेझिझक,पूरे आत्मविश्वास के साथ बहस करने लगी. औरत-मर्द का भेद भुलाकर. इस बार तक़रीबन 20-25 मिनट बहस चली. जो दलीलें पिछली तारीख़ पर मैं नहीं दे पायी थी, हिम्मत बटोर कर पेश की. आगे बढ़ कर और ज़्यादा. वे सारे तथ्य मैंने जज साहब के सामने रख दिए जो पिछली मर्तबा लाज के मारे नहीं रख पायी थी. तमाम दलीलें पेश कर चुकने के बाद मैंने कहा, 'योर ऑनर, दिज़ आर माई आर्ग्यूमेंट्स.
मैं रोहिणी अदालत परिसर छोड़ चुकी थी. मेट्रो से तीस हज़ारी लौटते वक़्त बार-बार सोचती रही कि आज तो कोई कसर नहीं छोड़ी मैंने. शायद रामकुमार बाहर आ जाए.
अपने चैंबर में आकर दो गिलास पानी पिया. डायरी में अलगे दिन के केसेस देखे. क्लर्क से कहा, ‘कल दोपहर बाद रोहिणी जाकर 308 नं. से रामकुमार वाले केस का ऑर्डर पता कर लेना’. अगली शाम पता चला, रामकुमार को जमानत मिल चुकी थी
8.7.08
विनायक सेन को रिहा करो
विरोध के अधिकार की रक्षा करो
दिसम्बर 2007 को अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस 10 दिसम्बर के रोज़ उच्चतम न्यायालय ने डॉक्टर विनायक सेन को, जो एक डॉक्टर और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, जमानत देने से इनकार कर दिया। राज्य का आरोप यह है कि वे अलग-अलग राज्यों के माओवादी समूहों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। छतीसगढ़ के पुलिस प्रमुख ने भी यह कहा है कि वे ख़ुद माओवादी नहीं हैं पर वे माओवादियों की मदद कर रहे थे और वे उन्हें छूटने नहीं देंगे...अदालत ने बिना वजह बताओ उनकी जमानत की अर्ज़ी नामंजूर कर दी।
इसके कोई आठ महीना पहले डॉक्टर सेन कोलकाता में अपनी माँ से मिल कर छतीसगढ़ तब लौटे थे जब उनके कोलकाता में होते हुए छतीसगढ़ की पुलिस यह अफ़वाह उड़ा रही थी कि वह उनकी खोज़ कर रही है और वे लापता हो गए हैं। यह जानते हुए कि पुलिस उन्हें तलाश रही है और उनके भाई के यह सार्वजनिक रूप से लिख देने के बाद भी कि पुलिस उन्हें गिरफ़्तार कर सकती है, डॉक्टर सेन छतीसगढ़ वापस आए, भागे नहीं और पुलिस के पास यह जानने को गए कि उनकी खोज़ क्यों की जा रही है। वह उनकी आज़ादी का आख़िरी दिन था। मज़ेदार यह है कि पुलिस ने दावा किया कि उसने उन्हे बिलासपुर की किसी सड़क पर धर पकड़ा है। पुलिस और राज्य के झूठ के प्रचार का सिलसिला अभी भी ज़ारी है।

डॉक्टर सेन एक डॉक्टर हैं जिन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की अपने अध्यापन की नौकरी छोड़ कर छतीसगढ़ में आदिवासियों और गाँव वालों के बीच जा कर काम करने का फिसला किया। उनकी बीमारी की जड़ें डॉक्टर सेन को उनकी भयानक गरीबी और उनके शोषण में नज़र आईं। स्वास्थ्य को आम जन का हक बनाने और रोटी को बुनियादी हक की लड़ाई में भी वे लगे। वे राज्य समर्थित स्वास्थ्य कार्यक्रम मितानिन के सलाहकार भी थे। वे पीपुल्स यूनियन ऑफ़ सिविल लिबर्टीज़ के राज्य स्तर के महामंत्री और राष्ट्रीय स्तर के उपाध्यक्ष थे। इस रूप में उन्होंने राज्य के अलग-अलग अंगों के द्वारा किए जाने वाले मानवाधिकार के हनन का अध्ययन किया और उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। मुठभेड़ों की असलियत पर से उन्होंने परदा उठाया। जो बात लेकिन छतीसगढ़ सरकार को सबसे बुरी लगी, वह थी उनके द्वारा सलवा जुड़ूम का विरोध। उन्होंने अपनी रिर्पोटों में बताया कि किस तरह राज्य लोगों को खुले आम हिंसा में प्रशिक्षित कर रहा है और आदिवासियों के बीच गृह युद्ध की स्थिति को लगातार बनाए रखना चाहता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों और देसी पूंजीपतियों के लिए छतीसगढ़ की ज़मीन और उसके भीतर छिपी अपार ख़निज संपदा को लूटने के लिए सरकार ने सलवा जुड़ूम का सहारा लिया है। इसके लिए राज्य जिस तरह से राजकीय रिकॉर्ड को तोड़-मरोड़ रहा था, डॉक्टर सेन उसका भी पर्दाफा़श कर रहे थे। पीपुल्स यूनियन ऑफ़ सिविल लिबर्टीज़ के नेता के रूप में डॉक्टर सेन की ये गतिविधियाँ सरकार के लिए ख़तरनाक थीं और उसके लिए यह ज़रूरी हो गया था कि किसी तरह वह उन्हें निष्क्रिय कर दे।
सरकार की मदद के लिए छतीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा क़ानून काफ़ी उपयोगी साबित हुआ। बल्कि इस क़ानून के तहत उनकी गिरफ़्तारी एक तरह से इस क़ानून की प्रभावकारिता की जांच भी है, इसलिए राज्य और पुलिस हर तरह से डॉक्टर सेन को आरोपों से लाद देना चाहते हैं। इस क़ानून के मुताबिक किसी व्यक्ति पर इसका संदेह होना काफ़ी है कि वह राज्य विरोधी विचार रखता है भले ही वह सक्रिय रूप से उसके लिए प्रचार भी न कर रहा हो। राज्य किसे राष्ट्रीय हित माने यह उसका अधिकार बन जाता है। इस हिसाब से अगर आप बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए सरकार के ज़मीन लेने के क़दम के ख़िलाफ़ कहीं कुछ लिखें या बोलें, या ऐसा कोई साहित्य आपके पास से मिले तो आप ग़ैरक़ानूनी या आपराधिक गतिविधियों में संलग्न माने जाएँगे और आप गिरफ़्तार किए जा सकते हैं। डॉक्टर सेन को यह कह कर गिरफ़्तार किया गया की वे माओवादियों से सहानुभूति रखते हैं, माओवादियों की तरह सलवा जुड़ूम के विरोधी है और वे नारायण सान्याल जैसे नक्सलवादी नेताओं की मदद कर रहे थे। सच यह है कि एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में डॉक्टर सेन को हर तरह के व्यक्ति से मिलना ही होता। वे अधिकारियों की इजाज़त से नारायण सान्याल से मिलने जेल जाते रहे क्योंकि सान्याल काफ़ी बीमार और बुजुर्ग हैं। यह डॉक्टर सेन के कर्तव्य के दायरे में आता है। सरकारें मानवाधिकार कार्यकर्ता समूहों की मद से अतिवादी, हिंसक आंदोलनों से बातचीत करती रही हैं। अगर वे यह कहती है कि मानवाधिकार समूह सिर्फ़ उनकी मदद के लिए काम करें और उन्के अत्याचारों पर कुछ न बोलें तो क्या इसे कबूल किया जा सकता है?

छतीसगढ़ की संपदा पर देसी विदेशी पूँजी की आँख गड़ी है। जन आंदोलनों को हर तरह से कुचल देने और निष्क्रिय कर देने में राज्य उनके लठैत की तरह काम कर रहा है। यह हो रहा है छतीसगढ़ में, बंगाल में, उड़ीसा में, महाराष्ट्र में, हरियाणा में... लगभग हर दल इसमें एक साथ हैं। इस हिसाब से भी मानवाधिकार समूहों की अहमियत बढ़ जाती है क्योंकि वे ही बच जाते है आम आदिवासी, साधारण ग्रामीण, छोटे किसीन या छोटे व्यापारियों, खोमचे वालों, रेड़ीवालों की और से बोलने वाले। इसलिए अब सरकारें डॉक्टर सेन, हिमांशु भाई, शमीम, जानू, रोमा जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को माओवादी कह कर ठंड़ा कर देना चाहती हैं। क्या हम जनता की इन आख़िरी आवाजों को भी खमोश हो जाने देंगे? डॉक्टर सेन कि रिहाई की लड़ाई इसी बात का इम्तहान है। उनकी रिहाई का मतलब है छतीसगढ़ जन सुरक्षा क़ानून जैसे क़ानून का विरोध। क्या हम इस काम में ढिलाई बारात सकते हैं? यह सवाल सिर्फ़ डॉक्टर सेन कि आज़ादी का नहीं, हिन्दुस्तान की जनता के अपने ढंग से जीने का रास्ता चुनने, अपने सोचने का तरीका तय करने कि आज़ादी का भी है।
डॉ. विनायक सेन की रिहाई के लिए नागरिक समिति, 125, शाहपुर जाट, नई दिल्ली-110049 की ओर से प्रकाशित