7.10.07

भयानक त्रासदी के भयावह अवशेष

6 अक्टूबर

आंखें मलते हुए जब सुबह उठा तो कम्बल-तकिए वाले ने कहा, 'सर पटना जंक्शन उतरिएगा न ? बस आ गया, सामान तैयार कर लीजिए.' फटाफट अंगौछा बैग में घुसेड़ा और बेसिन पर जाकर आंखों में पानी झोंका. रेल प्लेटफ़ॉर्म पर आ चुकी थी. ग़लती से सामने की तरफ़ निकल गया. बस स्टैंड के लिए ऑटो नहीं मिल रहा था. दो-एक ऑटो वाला राजी भी हुए तो ज़्यादा पैसे की मांग की. आखिरकार एक रिक्शावाले ने बताया, 'इस सामने जो गल्ली देख रहे हैं, उधरे से निकल जाइए. ओ पार ढेर टेम्पु वाला मिलेगा.' वही किया. ऑटो भी मिला और मैं बस स्टैंड आ गया. मधुवनी जयनगर आवाज़ लगाते एक कंडक्टर/हेल्पर ने पूछा, 'कहां? कहां जाना ?' मुज़फ़्फ़रपुर सुनने के बाद उसने कहा, 'आइए-आइए. समुच्चा सीट त खालिए है. बइठिए, बस अब चलने ही बाली है. टाइम हो गया है.' मैं दाखिल हो गया.

थोड़ी देर में एक आदमी आया और मेरे सामने उस बक्से को खोलकर उसने एक सीडी की पन्नी रखी जिसमें टेलीविज़न रखा था. एक-बार बग़ल में रखे रिमोट से कुछ-कुछ करने के बाद उसने कहा, 'कहां है साला सोहना, बहानचोद मोबाइल चार्ज करता है, अब इ सीडी चलिए नहीं रहा है.' चंद सेकेण्ड में ही वो आदमी आ गया और यह जानकारी ले लेने के बाद कि दिक़्क़त क्या है, अपनी उस्तादी करने लगा और सीडी चालू. दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे हाजीपुर तक मैंने भी देखा. बीच-बीच में कभी-कभार ध्यान इधर-उधर गया वर्ना बड़ी तल्लीनता से देखता रहा था. हाजीपुर में दाखिल होते ही बड़ी त्रासदी के अवशेष दिखने लगे. रेलवे क्रॉसिंग के ठीक बग़ल मे जो नवोदय विद्यालय है, उसके हाते में अब भी 3-4 फ़ीट के क़रीब पानी जमा था. आगे बढ़ने पर देखा - जेल और कचहरी परिसर जलमग्न. थाना भी सड़क पर ही. मेज़-कुर्सी लगाकर बैठे दारोगा साहब और उनके अगल-बगल खड़े दो-चार सिपाही. कहीं-कहीं सड़क पार करता पानी का धार.

ये तब की बात है जब लोग कह रहे हैं बाढ़ समाप्त हो गया है. 75-80 किलोमीटर की दूरी तय करने में बस को क़रीब साढे तीन घंटे लगे, और ऐसा भी नहीं कि पूरा रास्ता ख़राब हो. जगह-जगह जाम. सड़क किनारे बसे कुछ टोलों और गांवों को देखकर बेहद हैरानी हुई. पांच फ़ीट से भी ज़्यादा पानी में कुछ खड़े और कुछ लुढ़के टाट-फूस के घर. किसी की छप्पर झुकी हुई तो किसी की पानी में औंधी पड़ी. लोग कहां गए, सीट पर बैठा सोचता रहा. पर जब कहीं-कहीं सड़क किनारे साड़ी, लुंगी और कटी-फटी प्लास्टिक से तनी सिरकियां दिखीं तो लगा जिन्दा हैं लोग शायद. कहीं-कहीं ऐसी सिरकियां रेलवे लाइनों के किनारे भी दिखे. दरअसल, रेलवे लाइन ही सबसे उंची जगह नज़र आ रही थी.

मुज़फ़्फ़रपुर पहुंचने से थोड़ी देर पहले इन दृश्यों को कैमरे में क़ैद करने की बात ध्यान आयी. पर काफ़ी देर हो चुकी थी और कई बार लगा कि मैं उल्टी तरफ़ बैठा हूं. फिर भी एक-आध तस्वीरें ले पाया, जो इस पोस्ट के साथ लगा रहा हूं.

क्रमश:

5.10.07

ये तो फ़ौजी डिब्बा है!

‘एक्सक्यूज़ मी सर, यहाँ बैठ सकते हैं?’ टीटी (ई) साहब मुख़ातिब हो रहे थे। नॉर्थ ईस्ट एक्सप्रेस, सैकेंड एसी कंपार्टमेंट, नितांत अकेला, जनसत्ता लग-भग चाट चुका था। छूटते ही कहा, ‘हाँ-हाँ, क्यों नहीं, अकेला इतनी जगह में थोड़े ही बैठूँगा!’ महाशय ने खिड़की की तरफ़ से सामने वाली सीट ली और उनके साथ अन्य चार काले कोट वाले सज्जन आमने-सामने की सीटों पर बँट गए। मेरे बगल वाले सज्जन ने सफ़ाई-सी दी, ‘‘ऐसा है सर कि लाँग रूट की गाड़ी में कई बार सवारी परेशान हो जाती है। और फिर ये तो सैकेंड एसी है, इसमें तो बैठते ही बड़े-बड़े लोग हैं...।’ बात समाप्त भी नहीं हुई थी कि सामने वाली सीट पर रिज़र्वेशन चार्ट में चश्मे समेत नज़र धँसाए एक महानुभाव ने कहा, ‘अरे ओ श्रीवास्तव जी याद नहीं है उ प्रयागराज वाली घटना जब मिश्रा पर लुबध गया था एसी थ्री का सवारी सब कानपुर में। बताइए साहब, जब जगहिया खाली है तो बइठने में का दिक्कत है। टीटी सब तभ सवारिए लोग के न लाई के लिए न है। लेकिन इभबात सब सवारी नहीं समझती है। ख़ास करके एसी-वेसी वाले तो एकदमे नहीं।’

बातचीत रफ़्तार पकड़ने लगी थी। क़रीब आधे घंटे बाद एक नौजवान आया, ‘एक्सक्यूज़ मी’ उच्चारित किया और टीटी साहब से बोल पड़ा, ‘सर मैं आपको खोजते-खोजते यहाँ आया हूँ।’ अचानक उसका अंदाज़ गिरगराऊ हो गया, ‘सर उस लड़की का बर्थ कनफ़र्म कर दीजिए न। उसको कुचबिहार तक जाना है, वो अकेली है, और सफ़र लंबा है सर।’ एक कुटिल मुस्कान टीटी साहब के चेहरे पर आकर ...चली गई। उन्होंने अपनी भंगिमा बदली, कंधे से कोट उतारा और कहा, ‘अकेली कहाँ है, तुम लोग जैसे नौजवान के रहते कौनो लड़की भला अकेली रह सकती है!’ तेज़ी के साथ उन्होंने अपनी गर्दन सहकर्मियों की तरफ़ मोड़ी। ‘एक लड़की है बाईस-चौबीस साल की एस एट में। आठ बज़े से कम से कम दस लड़के आ चुके मेरे पास उसका बर्थ कंफ़र्म करवाने। ये जनाब ग्यारहवें हैं’’ कहकर गर्दन उचका कर उस नौजवान से पूछा, ‘हाँ भाई, तुम बताओ, तुम कैसे जानते हो उस लड़की को? घंटा भर पहले तो नहीं थे तुम वहाँ?’ इससे पहले कि वो कोई जवाब दे पाता, एक टीटी महोदय ने कहा, ‘तुम भी एस एटे में हो न? जाओ, अपनी सीट पर बैठो। थोड़ी देर में वहीं आ रहे हैं हम।’ लड़का कुप्पी से बाहर गया भी नहीं था कि टीटी समूह में एक हल्की-सी फुसफुसाहट हुई और ज़ोरदार ठहाका गुँजा। ‘साला, जवान लड़की देख के सब सटना चाहता है उससे। देखने में त सुंदर है! का जाने कैसी है!’ देश की इस ‘गंभीर’ समस्या पर काफ़ी देर तक बातचीत चलती रही। उनका सुनाने का अंदाज़ निराला था।

मिज़ाज से मैं मूलतः शनयान श्रेणी का यात्री हूँ जिसे बोलचाल में स्लीपर कहते है। मौक़ा विशेष पर या फिर मज़बूरी में यदा-कदा वातानुकुलित श्रेणी में भी सफ़र कर लेता हूँ जैसा कि बीते अप्रैल में हुआ। जौनपुर से एक मित्र का फ़ोन आया। कहा, ‘पिछले पाँच बरस से हमारी संस्था जौनपुर और आसपास के इलाक़े में काम कर रही है, लेकिन एक भी बार हमारा इवेल्यूएशन नहीं हुआ है। प्लीज तुम आ जाओ एक सप्ताह के लिए। सारा काम देख-समझ के अपना फ़ीडबैक दे देना।’ उन्होंने पता-ठिकाना बताने के बाद कहा, ‘देखो, एसी टू से आना, इस मद में संस्था के पास पैसे हैं, रिइंबर्समेंट हो जाएगा।’ मन नहीं मन कहा, रिइंबर्समेंट तो हो जाएगा लेकिन इन्वेस्टमेंट तो अपना ही करना पड़ेगा पहले।

तो मित्रों, उस एसी टू के डिब्बे में पाँव रखते ही तरह-तरह के ख़याल मेरे मन में आने लगे थे। मेरी पहली यात्रा थी वह। एक ख़ास क़िस्म का कौतूहल लिए मैं अपनी जगह पर पहुँचा था। मैं पहला यात्री था उस कंपार्टमेंट में। सोचा अभी पन्द्रह-बीस मिनट समय है गाड़ी चलने में, लोग आ जाएँगे। मेरा साचना ग़लत सिद्ध हुआ। गाड़ी चल पड़ी। अकेला, यह कैसा सफ़र होगा, सोचकर कुलबुला गया था। ढाई घंटे में केवल एक बार मानुष दर्शन हुआ था। गाड़ी नई दिल्ली स्टेशन से छुटने के थोड़ी देर बार एक आदमी तकिया, कंबल और चादरों की एक पैकेट फैंक गया था सीट पर। उस भयावह मुर्दाशांति के कारण कई बार घबरा भी जाता था। अपने-आप को कोसने की भी लगता था। ‘भगुतो, एसी टू की यात्रा। क्या मिला! चुप्पी, अकेलापन! नज़रबंदी ऐसी ही होती होगी?’ एक-डेढ़ घंटे के दौरान न कोई चाय वाला, न पेपर सॉप वाला, न जंज़ीर वाला, और न ही कर्र-कर्र करता बच्चों को ललचाता एभ के सैंतालिस वाला। कहने को एक-आध बार परदा सरका कर बाहर का नज़ारा भी देख लेता था लेकिन खिड़की से जन्म-जन्मांतर के लिए फ़िक्सड काँच के कारण थोड़ा बदरंग दिख रहा था। आख़िरकार स्वीकरार करना पड़ा, ‘बेटा तुम्हें अकेला ही सफ़र तय करना है।’ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से ख़रीदा जनसत्ता खोल लिया था।

टीटी समुदाय का आघमन एक बार तो मुझे रेगिस्तान में पानी मिलना जैसा लगा था। उन्होंने बातचीत के जिस सिलसिले को आग़ाज़ किया था, लगा था सफ़र कट जाएगा इत्मीनान से। लेकिन जल्दी ही मैंने अपने आप को उस दायरे से बाहर पाय। निर्जन था मैं, रेल के उस डिब्बे में।

सोचने लगा, पिछली मर्तबा लखनऊ से लौटते वक़्त शताब्दी एक्सप्रेस में तो ख़ूब चहल-पहल थी। वर्ल्ड सोशल फ़ोरम, मुंबई से लौटते वक्त राजधानी के एसी थ्री डिब्बे में थे हम लोग। ज़्यादातर यात्री हम जैसे ही थे जो स्लीपर में भी सफ़र करते हैं और एसी थ्री में भी। तब भी एक हद-तक गहमा-गहमी थी डिब्बे में। पिछली बैंगलोर यात्रा के दौरान हमारे सामने की सीटों पर बैठा परिवार छुट्टियाँ मनाने जा रहा था। सामने वाले कंपार्टमेंट में बिंदास युवा लड़के-लड़कियों की एक टोली थी। रह-रह कर उनके बीच से ज़ोरदार ठहाका फूट पड़ता था। बीच-बीच में वे गाने लगते थे। सामने बैठी महिला से रहा न गया था। झल्ला पड़ी थी, ‘कितना शोर कर रहे हैं ये लोग। बिल्कुल स्लीपर बना दिया है। इनकी वजह से हमारा एसी का मज़ा ख़राब हो रहा है। पता नहीं कहाँ तक जाएँगे ...’

टीटी समूह के ख़ास गप-शप के कारण हाशिये पर धकेला गया मैं कुप्पी में बैठे-बैठे नवरूपांतरित मध्यवर्ग का रेखाचित्र खींच ही रहा था कि अचानाक एक पुरानी रेल यात्रा याद आ गई।

दूसरी या तीसरी मर्तबा दिल्ली आ रहा था। दो-तीन में ही वापसी यात्रा तय हुई थी, लिहाज़ा रिज़र्वेशन नहीं मिल पाया था। मुज़फ़्फ़रपुर से जैसे-तैसे वैशाली एक्सप्रेस के एक डिब्बे में लद गया। तिल रखने की भी जगह नहीं थी। कंधे पर एक थैला था। गिरते-उठते एक कुप्पी में पहुँचा। गेट और रास्ते के मुक़ाबले थोड़ी कम भीड़ थी। धीरे-धीरे सरक कर खिड़की के क़रीब गया। एक बच्चे को खिसका कर अपने-आप को उसके बगल में लग-भग कोंचने में कामयाब हो गया। इतने में फ़ौजी वर्दी धारण किए एक अधेड़ ने छलांग लगाई और दाहड़ पड़ा, ‘‘तेरे को दिखता नहीं कि यह फ़ौजी कंपार्टमेंट है। तूने इस बच्चे को खिसका कैसे दिया? चल जल्दी से खिसक यहाँ से ...।’ ख़ैर कहिए कि झूठ का एक टुकड़ा कहीं से मेरे दिमाग़ में आ गया। मैंने भी अपने-आप को एयर फ़ोर्स का इंटर्न बता दिया। उसके बाद मुझसे कोई पूछताछ नहीं हुई। मुझसे संतुष्ट होने के बाद सैनिक महोदय ने कंपार्टमेंट में व्यवस्था बनाने की ज़िम्मेदारी अपने कंधे पर ले ली और यात्रियों से पूछताछ करनी आरंभ कर दी। कहने लगे, ‘... पता नहीं है ये आर्मी बॉगी है कैसे चढ़ गए तुम लोग? साले सब को बेल्ट निकाल कर दो-दो लगाएँगे तब सब उतर कर भागेगा।’ क़रीब चालीस मिनट तक वे इस काम में व्यस्त रहे। उसके बाद उन्होंने मेरे सामने वाली बर्थ पर से एक बच्चे को गोद में लिया और खुद उस स्थान पर टिक गए। उसके बाद पानी पीया और मेरे बगल में बैठी अपनी पत्नी से कहा, ‘कनी हौंकु न यो।’’

इधर मेरी असली परीक्षा अब होने वीली थी। ख़ुद को उस खाँचे में बनाए रखना वाक़ई तपस्या लगने लगा था जो मैंने उस बच्चे को खिसका कर बनाया था। हिलना-डुलना तक मुमकिन नहीं था। कछ-मछ करने के सिवाय कोई चारा नहीं था। इस उहापोह में गाड़ी कब गोरखपुर पहुँच गयी, पता ही नहीं चला, बीच में लोगों ने खाना भी खाया। पर मेरे लिए अपने थैले से वो रोटी और करैले की भुजिया निकालना भी मुश्किल था जो मेरी बुआजी ने माता जी की अनुपस्थिति में पैक किया था। शायद इस बीच एक बार ‘चाय गरम’ ली थी। गोरखपुर में गाड़ी आधा घंटा रुकती है। सामने प्लेटफ़ॉर्म पर अंडा वाले की रेहड़ी पर लोगों को पत्तल पर अंडा-ब्रेड खाते देख कई बार मेरा भी जी मचला लेकिन स्थिति ऐसी नहीं थी कि मैं उतर कर वहाँ जा पाऊँ। उतरने की जितनी फ़िक्र नहीं थी उससे ज़्यादा चिंता थी कि वापस अपनी जगह पर सही-सलामत पहुँचने की।

बस मैं खिड़की से इधर-उधर टुकुर-टुकुर ताक रहा था। इसी बीच एक दिलचस्प नज़ारा दरपेश हुआ। हमारे बगल वाले डिब्बे के दरवाज़े पर लोग बेतरतीब लटके पड़े थे। एक दुबला-पतला लड़का बार-बार लोगों को धकियाते हुए डिब्बे में चढ़ता था और दो मिनट में फिर उतर जाता था। इस क्रम में उसने कुछ जेबतराशियाँ भी की। शायद उसे अपने मिशन में सफलता मिल गयी थी क्योंकि थोड़ी ही देर में वह प्लेटफ़ॉर्म पर चहलक़दमी करने लगा था। एक बार हमारी नज़रें मिल गयीं। मैंने इशारे से उसे अपने क़रीब बुलाया। बड़े भोलेपन से वो मेरे पास आ गया।

मैंने पूछा, ‘और भाईजान, कितना बन गया।’ शायद उसे मेरा सवाल समझ नहीं आया या फिर उसने न समझने का नाटक किया। गर्दन उचका कर मेरे सवाल का मतलब पूछा। मैंने कहा, ‘कितनी जेबें तलाश लीं इतनी देर में जो इत्मीनान से टहल रहे हो?’ इतना कहना था कि वह गूँगा-बहरा हो गया! क्षणभर में ही कहाँ विलीन हो गया पता ही नहीं चला। थोड़ी देर में रेलवे का एक सिपाही डंडा पटकता सामने से गुज़रा। मैंने संक्षेप में उसे जेबतराशी की घटना बतायी और उस लड़के का हुलिया भी। ‘अभी पकड़ते हैं साले को’ कहकर वह चला गया। सहयात्री फ़ौजी महाशय को बाद में मैंने पूरा क़िस्सा सुनाया।

छह बजे गोरखपुर स्टेशन से गाड़ी चल पड़ी थी। स्टेशन से दो-चार और फ़ौजी अपने बाल-बच्चों के साथ डिब्बे में आ चुके थे। लिहाज़ा हमारे फ़ौजी महोदय पर एक बार फिर व्यवस्था बनाने की स्वाभाविक ज़िम्मेदारी आ गयी थी। इस बार तो उन्होंने बाक़ायदा नये सवारियों का आइडेंटिटी कार्ड चेक किया। उनके मापदंड के हिसाब से इस बार कोई भी सवारी अवांछित नहीं थी। चुपचाप अपनी जगह पर वापस आ गए। जब-जब उनका ग़ैरफ़ौजी तलाशी मुहिम शुरू होता था मेरे मन में कँपकँपी होने लगती थी। सोचने लगता था अगर एयर फ़ोर्स के बारे में कुछ पूछ दिया तो क्या बताऊँगा, यहाँ तो ‘फ़ोर्स’ के बारे में भी बल से ज़्यादा कुछ नहीं मालूम है। इसलिए जब भी मौक़ा मिलता था या वो मुझसे मुख़ातिब होते थे, मैं जान-बूझकर उनको इधर-उधर की बातों में उलझाए रखने की कोशिश करता था या फिर फ़ौज की प्रशंसा। मिशाल के तौर पर ‘हिन्दुस्तानी फ़ौज वाक़ई दुर्गम स्थानों पर रहती है, बहुत बड़ी कुर्बानी देते हैं फ़ौजी अपने देश के लिए, हिन्दुस्तानी फ़ौज का जवाब नहीं, यह दुनिया में नंबर एक है, कैंटीन में चीज़ें कितनी सस्ती मिलती है, मेरे घर में पहला प्रेशर कूकर आर्मी से आया था’। फिर क्या था, महोदय फुले नहीं सामते थे और अपनी जाबाजियों के एक-आध टूकड़ा उछाल देते थे। मैं ऐसे विषय छेड़ने के बाद एक अनुशासित श्रोता की मुद्रा धारण कर लेता था।

बस्ती के आसपास गाड़ी में बत्ती जली। पता चला कि हवलदार साहब के सामने रखे एक बोरे पर कोई तरल पदार्थ गिरा हुआ है। उन्होंने झुक कर जायज़ा लिया। पाया, समस्तीपुर से जिस डब्बे में डेढ़ किलो घी ले कर वो चले थे, लुढ़का पड़ा है। बोरे के कोने से उतर कर उनके जूते और बच्चों की चप्पलों पर पर्याप्त चिकनाई बिखेर देने के बाद घी सीट के नीचे फ़र्श पर अपनी जगह बना चुका था। चेहरे का भाव बदला और जुबाँन के शब्द भी। ख़ास मिलिट्री स्टाइल की हिन्दी में पत्नी से कहा, ‘तेरे से कहा था न कि पकड़ के रखना। तेरे समझ में मेरी बात नहीं आती है?’ बात जारी रही उनकी लेकिन शायद सहयात्रियों को हक़ीक़त से अवगत कराना चाह रहे थे, ‘... डेढ़ किलो घी था। एकदम शुठ्ठ। मेरे को मालूम था कि इस भीड़-भाड़ में कुछ-न-कुछ तो होगा।’ और भी बहुत कुछ कहा उन्होंने। साथ में कुछ बिल्कुल मौलिक और मारक गालियाँ भी बरसाई। उनकी ज़ोरदार चीख सुनकर उनकी पत्नी की गोद में खेल रहे साल-डेढ़ साल के बच्चे की पेशाब निकल गयी और जा छलकी औंधे पड़े घी के डिब्बे के कोर पर। अब तो बचे-खुचे घी को सँभालने का बहाना भी जाता रहा। उनसे रहा न गया। एक ज़ोरदार तमाचा रसीद दिया उस बच्चे की गाल पर। एक बार तो लगा जैसे उसका दम ही निकल गया। क्षणभर बाद उसके मुँह से चीख निकली और फिर देर डिब्बे में उसका क्रंदन चलता रहा।

इधर मुज़फ़्फ़रपुर में घर से निकलने के पहले याद था कि चलते वक़्त लघुशंका से निवष्त हो लूँगा लेकिन जल्दीबाज़ी में यह ज़रूरी काम रहे गया था। स्टेशन पहुँचने पर याद तो आया कि निपट लिया जाए लेकिन रिज़र्वेशन की आख़िरी कोशिश के चक्कर में एक बार फिर रह गए। सोचा, ‘चलो, गाड़ी में आराम से निपटेंगे।’ गाड़ी में सवार होने से लेकर जगह बनाने तक, इतनी मशक्कत करनी पड़ी कि दो-तीन घंटे तक कुछ सूझा ही नहीं। बाद में एक-आध बार महसूस हुआ तो शौचालय तक पहुँचने और फिर वापस आने की चिंता के कारण जाघे दबा कर रह जाना पड़ा। लेकिन बच्चे के पेशाब छलकने के बाद तो क्षणभर भी रोक पाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था। उधर हवलदार साहब को रह-रह कर घी-बर्बादी की टिस आ रही थी। कभी बीबी तो कभी बच्चों को कुछ सुना डालते थे। गाड़ी लखनऊ पहुँचने ही वाली थी। आख़िरकार मैंने अपने पाँव सीधे किये। आगे बढ़ने के लिए क़दम बढ़ाया ही था की सामने से फ़ौजी महोदय बोल पड़े, ‘कहाँ चले। यहाँ आफ़त आई हुई है और आपको टहलने का सूझ रहा है।’ मैंने कहा, ‘बस अभी आया टॉयलेट से’। उन्होंने कहा, ‘रास्ता कहाँ है वहाँ तक पहुँचने का। अच्छा एक काम कीजिए, नीचे से जाइएगा तो नहीं पहुँच पाइएगा। ऊपर-ऊपर से जाइए। नहीं समझे? अरे साहब एक बर्थ से दूसरे बर्थ, दूसरे बर्थ से तीसे बर्थ इसके सिवाय कोई उपाय नहीं है।’ उक्ति अच्छी लगी। पहुँच गया शौचालय के दरवाज़े तक। दरवाज़ा अन्दर से बन्द था। दस्तक दिया।

जवाब नहीं आया। दूसरे दरवाज़े पर दस्तक दिया। फिर कोई जवाब नहीं आया। सोचा, शायद लोग दीर्घशंका से निपट रहे हैं। रह-रह कर बारी-बारी से दोनों दरवाज़ों पर दस्तक देता रहा। दो-तीन मिनट बाद जब कोई दरवाज़ा नहीं खुला तो ज़ोर से लात मारी एक दरवाज़े पर। खुला। देखा, तीन-चार जने अन्दर खड़े हैं। हाथ पकड़-पकड़कर उन्हें बाहर निकाला। दरवाज़ा बंद किया औऱ अपनी शंका का समाधान भी। बाहर निकल कर बेसिन की तरफ़ बढ़ा दादी माँ के बक्से में ठुँसी गट्ठरों की तरह महिलाएँ अटी पड़ी थीं बेसिन के अगल-बगल। किसी तरह चेहरे पर पानी मारा और एक बार फिर ऊपरी मार्ग से अपने स्थान की ओर बढ़ा। आज भी उस वाक़ए को याद करके बदन में सिहरन पैदा हो जाती है। शायद किसी छोटे-मोटे रिकॉड बुक में दर्ज कराने लायक़ उपलब्धि तो रही ही होगी।

क़रीब बारह बजे रात को गाड़ी कानपुर पहुँची। हमसफ़र फ़ौजी महोदय बीबी-बच्चों समेत उतरने लगे। उतरते वक़्त उनसे दुआ-सलाम भी हुई। उन यात्रियों के चेहरों पर राहत की रेखाएँ उभर आयी थीं जो अब तब खड़े थे और जिन्होंने फ़ौजी परिवार का स्थान ग्रहण किया था। कानपुर से गाड़ी चलने के बाद कभी-कभी जलती बीड़ी की गँध ने परेशान ज़रूर किया, पर कोई आवाज़ सुनने को नहीं मिली। अब तक की सबसे किफ़ायती यात्रा थी वह। केवल एक रुपया चाय में ख़र्च हुआ था। जेनरल डिब्बे की ऐसी मज़ेदार यात्रा का फिर दुबारे मौक़ा नहीं मिला।

इस वृतांत के आरंभ में टीटी महोदय की जिस शालीनता से मैंने आपकी मुलाक़ात करवायी आम तौर पर ऐसा नहीं दिखता है। राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस जैसी गाड़ियों के टीटीयों को अपवाद मानें। कभी-कभी साधारण शयनायन श्रेणी में बिना रिज़र्वेशन सफ़र कर रहे सवारियों से जुर्माना वसूली का उनका अंदाज़ हैरतेगेज़ होता है।

एक बार की बात है। मैं और श्रीमति जी मुज़फ़्फ़रपुर से सप्तक्रांति एक्सप्रेस से आ रहे थे। टिकट चेक करते हुए टीटी महोदय हमारे पास आए। हमने अपनी टिकट उनकी तरफ़ बढ़ा दी। कलम से एक लकीर खींच कर उन्होंने हमें टिकट वापस दे दी। अब सामने वाले यात्री ने टिकट बढ़ाई। टिकट हाथ में लेकर अपनी चार्ट से उसका मिलान करते हुए दो-तीन बार उन्होंने उस सवारी को ग़ौर से देखा। पूछा, ‘कहाँ से लिया है ये टिकट?’ ‘अस्टेशन से’ उसने कहा। ‘अच्छा, अभी आते हैं’ कहकर टीटी साहब आगे बढ़ गए। क़रीब एक घंटे बाद जब लौटे तो उनके साथ दो और टीटी अभी थे। एक ने पहले वाले टीटी से पूछा, ‘हाँ, कौन है?’ उन्होंने उस सीधे-सीधे आदमी की ओर इशारा किया। नए टीटी ने उससे पूछा, ‘हाँ रे, सच-सच बता कहाँ से लिहले ही टिकटवा? सच-सच बता न त जेहले जेंगे अभी तुमको। साला नक़ली टिकट लेकर ऐश कर रहा है।’ एक मिनट के लिए हमें भी हैरानी हुई। माज़रा समझ नहीं आ रहा था। टीटियों ने उससे कहा, ‘आओ हमारे साथ, चलो सुप्रीटेंडेंट के केबिन में।’ आगे-आगे तीनों टीटी और पीछे-पीछे वो आदमी, चल पड़े। लगा, सचमूच कुछ गड़बड़ है। अचानक उसके रोने की आवाज़ आयी। आगे बढ़ा, देखा तीनों शौचालय के पास उसे घेरे खड़े थे, साथ में एक रेलवे पुलिस का जवान भी था। थोड़ा क़रीब गया और खड़ा होकर सुनने लगा उनकी बातचीत। उन्हें उस आदमी की कमर में खुंसा बटुआ हाथ लग गया था। वो आदमी अपना बटुआ वापस माँग रहा था। हैरत की बात है कि बगल वाली कुप्पी में बैठे किसी भी यात्री ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि एक आदमी जो अच्छा-भला इनके पीछे चलकर आया था, क्यों रो रहा है। मैंने उनके बीच में हस्तक्षेप किया, ‘क्या बात है?’ उनमें से एक बोल पड़ा, ‘अरे जाइए न भाई साहब, काहेइ पचड़ा में पड़ रहे हैं। साला ग़लत टिकट पर ट्रेवल कर रहा है।’ मैंने कहा, ‘ठीक है तो जो भी क़ानूनी कार्रवाई हो सकती है वो कीजिए। बताइए तो मैं भी मदद करूँ। पर इसके साथ ज़ोर-जबरदस्ती क्यों कर रहे हैं?’ इतना बोलना था कि वे मेरे ऊपर चढ़ने लगे, ‘जाइए न, ढेर क़ाबिल न बनिए, बहुत देखे हैं आप जैसे। चुपचाप अपने जगह पर जाकर बइठ जाइए।’ मेरी अभी आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गयी। इतने में कुछ और सवारियाँ आ गईं। अंत में टीटी और रेलवे का सिपाही उसका बटुआ और टिकट उसे थमाकर वहाँ से दफ़ा हो गए। वापस लौटकर उसने बताया, ‘उ लोग कह रहा था कि मेरा टिकट जनानी टिकट है। तीनगुना जुर्माना माँग रहा था हमसे । हमरा बटुआ भी छीन लिया था।’ बाद में यात्रियों ने टीटियों के क़िस्से सुनाने शुरू किए। एक ने बताया कि एक बार स्टेशन पर पंजाब से लौटते हुए एक यात्री को टीटी ने यह कह कर रोक लिया था कि उसके पास बक्से का तो टिकट ही नहीं है।




2.10.07

हजारी

तीन भाइयों के बीच
अकेली थी हजारी.
रमपुरा काकी कहती है
कि उसके जनमने पर उसके बाप ने
रेवाज के उल्टा
टोले भर में लड्डू बांटा था
इतरा कर बोला था कि
अपनी लछमी की शादी में
खूब लछमी खरचेंगे.
पांच साल की भी नहीं हुई थी वह
कि उसकी मतारी
कपड़ा-लत्ता, गहना-गु‍डिया, सांठ-सनेश
सब जोड़ने-चितने लगी थी.
काकी कहती है कि
रूप और गुण के आगर
हजारी के बियाह में
बूशट-पाइंट पहिन-पहिन के
बरातियों ने खूब डेंस किया था.
उसके बाप ने
पचास हजार नगद और फटफटिया
और मामा ने सिमेना देखने वाला टिबियो दिया था.
काकी कहती है
माघ में बियाह हुआ

जेठ तक सब ठीके चला

अषाढ़ में हजारी की एक चिट्ठी आयी

बाप से पांच हजार और मंगवाया था.

सावन में राखी के दिन

बड़का भैया तीन हजार दे आए

और कहे

कि बाकि नन्हकू लेके आएगा भादो पुरनेमा तक

बड़का भैया के आए हुए

दस दिन भी नहीं हुए

कि आज अखबार में

हजारी का बियाह वाला फोटो छपा है

और लिखा है

दो हजार के लिए उसके पति ने

उसके दोनों आंख निकाल लिए.

माथ पीट-पीट के काकी कहती है
अबकी अगहन में हजारी सोलह की हो जाती.

30.9.07

ब्रह्मा, विष्णु और महेश के नए अवतार

भारत के राजस्थान प्रांत के जोधपुर नगर में कुछ लोगों ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश की नयी तस्वीर जारी की है. ये तस्वीरें एक तरह से तीन महत्तवपूर्ण हिन्दू देवताओं के नए अवतार की घोषणा और नए युग के उद्घोष की कोशिश है. एक हिन्दी ख़बरिया चैनल पर भरोसा करें तो इन देवताओं की तस्वीरों से सुसज्जित कैलेंडर धड़ल्ले से बांटे जा रहे हैं.

ख़बर और उसके साथ की झलकी देखकर बंदे को कुछ ठेस- सी लगी. होश संभालने के बाद अब तक ब्रह्मा, विष्णु और महेश की जितनी भी तस्वीरें बंदे ने देखी है, ये वाली उन सबसे अलग थीं. पहले की तस्वीरों में ये त्रिदेव बड़े सौम्य और निरपेक्ष लग रहे थे. कल वाली तो बिल्कुल अलग थी. एक अज़ीब किस्म की पक्षधरता थी उसमें. चेहरा भी सामान्य नहीं लग रहा था. और तो और पहले की जो तस्वीरें बंदे को याद हैं उनमें वे इतने उम्रदराज़ भी नहीं लगते थे. कल वाले तो साठ पार के दिख रहे थे, बल्कि ब्रह्मा और महेश तो सत्तर से भी ज़्यादा के नज़र आ रहे थे.

नए अवतरित इस त्रिदेव को बंदे ने पहले भी कई मौक़ों पर देखा है. या कहें कि सभा, संसद, सम्मेलन, यात्राओं, जलसों इत्यादि में ये अलग-अलग भूमिकाओं में दिखते रहे हैं. हो सकता है ये वे न हों, या फिर वे ही हों, या अपने पुण्य प्रताप और चमत्कारिक शक्ति के बल पर इन्होंने उनकी शक्ल धारण कर ली हो. पर बंदे ने जब ये शक्ल उस तस्वीर में देखी तो कई बातें, घटनाएं और दुर्घटनाएं उसके ज़हन को झकझोर गयीं. जैसे कि तस्वीर वाले ब्रह्माजी की शक्ल कुछ साल पहले भारत के उपप्रधानमंत्री सह गृहमंत्री और अब भारतीय संसद में विपक्ष के नेता से हू-ब-हू मिलती है. उसी तरह विष्णु वाली शक्ल आठ-दस बरस पहले तक हिन्दुस्तान के सबसे बड़े राज्य के एक पूर्व, पूर्व मुख्यमंत्री, जिनके बाद अब तक उनकी पार्टी को सत्ता में आने का मौक़ा नहीं मिल पाया है – से पूरी तरह मेल खाती थी. और महेश यानी बाबा भोले भंडारी की शक्ल देखकर तो बंदे को ‘हार नहीं मानूंगा/रार नहीं ठानूंगा/काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं/गीत नया गाता हूं’ याद आ गया. इन पंक्तियों के रच‍यिता तो कुछ साल पहले तक भारतीय गणतंत्र के प्रधानमंत्री थे. बंदे ने सुना है अपने प्रधानमंत्रित्व काल के अंतिम दिनों में इंडिया शाइनिंग अर्थात भारत उदय नामक प्रचार-अभियान पर इन्होंने कर-दाताओं के पैसों को जमकर बहाया था. तो महेशजी की शक्ल उसी इंडिया शाइनिंग के प्रणेता से मिलती-जुलती लगी.

वैसे बंदे को कोई ख़ास दिक़्क़त नहीं है. बस ये लगता है कि अगर देवताओं को अवतरित होना ही था तो कम से कम इन शक्लों को न धारण करते. क्योंकि तस्वीर में जो ब्रह्मा है उससे मिलते-जुलते एक शख्सियत पर तो कई आरोप हैं. कुछ तो बेहद गंभीर हैं. अगर भारत के किसी आम नागरित पर ये आरोप लगे होते तो उस पर एक साथ दर्जन भर मुकदमे यहां की कच‍हरियों में चल रहे होते. अब देखिए न, नए ब्रह्मा वाली शक्ल के इस शख्स पर दिसंबर 1990 में उत्तर प्रदेश की एक प्राचीन नगरी में एक मस्जिद-ध्वंस के षड्यंत्र का आरोप है, जिसके चलते इन पर मुकमदा भी चल रहा है, और एक बहुत पुराने आयोग के सामने कभी-कभार सशरीर पेश होकर इन्हें सफ़ाई भी देनी पड़ती है. पर ये भी कम चालाक नहीं हैं, जैसा कि अदालतों में आम तौर पर देखा जाता है कि आरोपी और गवाह होस्टाइल हो जाते हैं – ये जनाब भी कुछ ऐसे ही हो जाते हैं. आरोप यह भी है एक बार 1989-90 में इस जनाब ने एक यात्रा निकाली थी और भड़काउु भाषण दिए थे जिसके चलते जगह-जगह दंगे भड़के और जान-माल की क्षति भी हुई. 2002 में गुजरात में इनकी पार्टी के शासन में एक ख़ास धर्म के लोगों का जमकर क़त्लेआम हुआ. कई स्वतंत्र जांच समितियों की रपट के मुताबिक़ चुन-चुन कर लोगों को जलाया गया था, गर्भवती महिलाओं के पेटों में तलवारें भोंक कर भ्रूण तक का ख़ून किया गया था. जान और अस्मत बचाकर भाग रही युवतियों को सिर पर केसरिया पट्टी बांधे ‘मर्दों’ ने खदेड़-खदेड़ कर पहले तो सामूहिक हवस का शिकार बनाया और फिर हमेशा-हमेशा के लिए उन्हें सुला दिया था. इतिहास बताता है कि तब ये सख्श उपप्रधानमंत्री तो थे ही गृहमंत्री भी थे, पर इन्होंने इंसानियत के खिलाफ़ उस जघन्य अपराध की भर्त्सना भी नहीं की थी, कार्रवाई की बात तो दूर. और भी मौक़े आए जब इन्हें बोलना चाहिए था, न बोले. हालांकि मितव्ययी तो नहीं हैं. उडि़सा में कुष्ठरोगियों का इलाज करने वाले डॉ. ग्राहम स्टेंस और उनके दो बच्चों को जब जिन्दा जला दिया गया तब भी कैलेंडर वाले ब्रह्मा से मिलते-जुलते शक्ल वाले इस शख्स ने कुछ ख़ास प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी.

विष्णु से मिलते-जुलते शक्ल वाले का कहना ही क्या. ऐसा शासन चलाया कि आज तक उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी की वापसी नहीं हुई. अब तो सुना है कि बड़ा बवाल मचा है पार्टी में और उनके हेडक्वार्टर में भी. अकाल में अपनी पार्टी के अध्यक्ष बनाए गए. जानकारों को मानना है कि इनकी चाल और इनका चरित्र तस्वीर वाले ब्रह्मा के शक्ल से मिलते-जुलते शख्स के चाल और चरित्र से अंतिम हद तक मेल खाता है. सिर्फ़ चेहरे में अंतर है. अध्यक्षासीन होते ही इन्होंने भी एक-आध यात्राएं निकालीं पर ज़्यादा माहौल न बिगाड़ पाए. कुछ अख़बारों ने तो टांय-टांय फिस्स ही कह दिया था.

महेशजी, तस्वीर में छपे महेशजी से मिलते-जुलते शख्स के बारे में एक बड़े हिस्से में यह भ्रांति है कि वे आदमी -अच्छे हैं पर उनकी पार्टी ग़लत है. बंदे को नहीं मालूम वे कैसे हैं और उनकी पार्टी कैसी है, पर ये लगता है कि ग़लत पार्टी तो दूर की बाद ग़लत समूह में भी अच्छा आदमी दो पल से ज़्यादा नहीं टिक सकता है. कैलेंडर वाले महेशजी से मिलते-जुलते शक्ल वाले महानुभाव ने लगभग अपनी पूरी उम्र उस पार्टी में गुज़ार दी. यानी बंदे का कहने का मतलब ये कि ग़लत या सही पार्टी और व्यक्ति एक जैसे ही हैं. और ग़लत या सही क्यों, दोनों ही ग़लत क्यों नहीं? जोधपुर में बंट रहे कैलेंडर में छपे महेशजी से मिलते-जुलते चेहरे वाले व्यक्ति इस देश के प्रधानमंत्री थे तब मरे हुए गाय के नाम पर कुछ दलितों को खदेड़-खदेड़ कर पीटा गया था और मार दिया गया था. खुले आम कुछ खिचड़ी दाढ़ी वाले बाबाओं ने गाय को इंसान से ज़यादा क़ीमती बताया था, तब एक बार भी महेशजी से मिलते-जुलते मुंह-कान वाले व्यक्ति ने उसका प्रतिवाद नहीं किया था. असल में, उनके बारे में बंदे की यही राय है कि पार्टी-वार्टी जो है सो है ही, तस्वीर वाले महेशजी जैसे दिखने वाले इंसान का व्यक्तित्व काफ़ी उथला रहा है. अपने शासनकाल में इस इंसान ने इंसानविरोधी कामों के लिए ख़ास व्यवस्था की थी, ख़ास तरह के लोगों को ख़ास-ख़ास मंत्रालय का जिम्मा दिया था. शिक्षा के साथ जो हुआ वो तो जगजाहिर ही है. अंधविश्वास, पुरोहिती और कर्मकांड को ऑफि़सियल बना दिया गया, विज्ञान-प्रदर्शनियों के उदघाटन के मौक़े पर देवी वंदना और नारियल फोडू कार्यक्रम होने लगे (हालांकि बाद वाले कभी-कभार पहले भी होते थे). काफ़ी हद तक इस इंसान के बारे में यह भी सच है कि जनहित की बातों को मसखरी में उड़ा देना इसकी प्रवृत्ति रही है. अब भी इस सख्स का नाम कभी-कभार कुछ अनाड़ी उत्साहित पार्टी कार्यकर्ता अगले प्रधानमंत्री के रूप में उछाल देते हैं.

बंदा तो तहे दिल से यही चाहता है कि ईश्वर की कृपा से उसने ग़लत तस्वीर देख ली हो या ख़बर ही प्लांटेड हो. बाई चांस ईश्वर की कृपा से दोनों में से कुछ नहीं हुआ तो बंदे की भावना को गहरी ठेस लगी है. इसके हज़ारों-हज़ार साल की मान्यता धुल गयी है.

22.9.07

बिल्‍ले का बवाल

कवना नंबर पर चल के बा?

’चार पर’

कवन गाड़ी? ‍

‘ग़रीब र‍थ.’

हं चलिए न. इ समान है, दु आदमी से जाई. अस्‍सी रूपइय्या लागि‍.

‘अच्‍छा चलि‍ए’

बंदा सामान उठाने में उनकी मदद करने लगा. अचानक बाजुओं पर निगाह पड़ी. कहा, ‘एक मि‍नट रुकि‍ए, आपका बैज कहां है?’

‘का पूछ रहे हैं आप?’ अधेड़ कुली ने अचरज से पूछा.

‘बिल्‍ला.’

’नहीं बान्‍हते हैं, कवनो बड़का हाकिम आता है तबे बिल्‍ला बान्‍हते हैं हमलोग’ दूर खड़े कुलियों की ओर इशारा करते हुए उन्‍होंने कहा, ‘देखिए, है कौनो के बांह में?’

‘कोई बात नहीं, हम और कुली देख लेते हैं’ कहकर बंदा स्‍टेशन छोड़ने आए अपने माता-पिता और बीवी-बच्‍चे से ‘थोड़ी देर रुकिए यहीं’ कहकर कुलियों के दूसरे झूंड की ओर चल पड़ा. दस-बारह झूंडों के पास गया. नाकामयाब रहा. आखिरकार बंदा बग़ल के रेलवे थाने में दाखिल हुआ.

पहले दरवाज़े पर लाल-नीली पट्टी पर किसी साहब का नाम और ओहदा दर्ज था. साहब नदारद थे. थाने के हाते में था, लिहाज़ा बंदा सहम भी रहा था. दूसरे कमरे में आमने-सामने मेज़ें लगी थीं और उनके चारो तरफ़ कुर्सियां. अलग-अलग मुद्राओं में तीन सज्‍जन इतनी ही कुर्सियों पर विराजमान थे. दो ‘बर्दीधारी’ और एक गुलाबी बुश्‍शट में. गुलाबी बुश्‍शट वाले जनाब के दाएं गाल में पान की गिलौरी थी. बयीं तरफ़, सज्‍जन गिलौरी दबा चुकने के बाद कागज पर से दायीं हाथ के अंगूठे की नाखून से चूना खरोंच रहे थे और तीसरे साहब ख़ैनी की रगड़ाई.

‘ग़लत जगह तो नहीं आ गया?’, बंदे ने बाहर पट्टी देखा – शायद ‘ड्युटी रूम’ ही था.

अंदर पहुंचा भी नहीं था कि ‘केकरो खोज रहा है का?’ गुलाबी कमीजधारी के मुंह से पिक के साथ छलका. ‘नहीं, शिकायत लिखाने आया हूं कुलियों के खिलाफ़.’ कहकर बंदे ने कमरे का एक संक्षिप्‍त-सा मुआयना किया. कमर के नीचे कमरे में बैठने वालों द्वारा उगले पान, गुटखे और तम्‍बाकू और इन्‍हीं के पिक, थूक, इत्‍यादि का निरंतर सेवन करती अलमारी माफिक कोई आकार दीन-हीन अवस्‍था में पीछे खड़ी थी, जिसके सिर पर डोरियों में लिपटे दो-चार टॉर्च रखे थे. दीवार पर लक्ष्‍मी माई की तस्‍वीर वाला कैलेंडर चिपका था जिस पर किसी साड़ी शो रूम का नाम दर्ज था, और बंदे के ठीक सामने, दीवार पर चिर-परिचित मुस्‍कुराहट वाली राष्‍ट्रपिता की तस्‍वीर टंगी थी जिस पर ख़ूब सारा गर्द जमा था और नीचे जाले भी थे.

‘गुलबदनजी’ ने फिर उगला, ‘का बात है, कउ ची के शिकायत लिखाना है?’ बंदे ने कहा, ‘कुलियों का.’ गर्दन पीछे मोड़ी, पिच्‍च मारी, फिर मुख़ातिब हुए, ‘बेसी पइसा मांग रहा है?’ बंदे ने कहा, ‘पैसा तो ज्‍यादा मांग ही रहे हैं, उनकी बाजुओं पर बिल्‍ला भी नहीं बंधा है. बता सकते हैं तो प्‍लीज़ बताएं, किधर लिखी जाएगी शिकायत?’ ज़ायका ख़राब हो जाने का डर था. न बोले. दांतों को पान की कतराई में भिड़ा दिया.

‘काहे का नागरिक, कौन-सी नागरिक सेवा. शिकायत नहीं लिखना है, न लिखो, क़ायदे से पेश तो आओ. थोड़े-बहुत पढ़े-लिखों के साथ ऐसे पेश आ रहे हो तो अनपढ़ भोले-भाले ग़रीबों की तो रेल बना देते होगे’ सोचते हुए बंदा अब तक खैनी की खेल में मस्‍त ‘बर्दीधारी’ से पूछ बैठा, ‘लगता है आप यहीं के स्‍टाफ़ हैं, इतनी देर से ये जनाब मुझसे किस हैसियत से उलझ रहे हैं? खैनी फांक कर अपनी हथेलियों को रगड़ते हुए उन्‍होंने जवाब उछाला, ‘हूं, का कष्‍ट हव?’

‘आप यहीं तो बैठे हैं. कितनी बार मैं यहां आने का मक़सद बता चुका हूं’, बंदे ने थोड़े और धैर्य के साथ कहा. ‘सुनले रहतीं तो काहे कष्‍ट देतीं तोहरा के हम. जिन गुस्‍सीया अब, दोहरा द.’ इस उबाच के साथ उनके जूते जडित पांव मेज पर पसर गए.

यह अपमान की पराकाष्‍ठा थी. ‘इसी ढिठाई, बदतमीज़ी, और कामचोरी के लिए ये ‘जनसेवक’ हमारे ख़र्चे पर पाले जाते हैं’ सोचते हुए बंदे ने कहा, ‘देखने में आप ठीक-ठाक लग रहे हैं, फिर भी नहीं सुन पाए तो आपके लिए एक बार फिर कहानी दुहरा देता हूं – देखिए, पंद्रह मिनट तो मुझे इस कमरे में हो गए, इससे पहले क़रीब आधे घंटे से बाहर मैं कुली ढूंढ रहा हूं. एक भी कुली बिल्‍ले में नहीं है, पूछने पर कहता है, बिल्‍ला नहीं बांधते. उन्‍हीं की शिकायत दर्ज कराने आया हूं.?’

‘अग्रेज़ी छांट रहा है? मुजफ्फ़रपुर स्‍टेशन पर तुमको कुलिए नहीं मिल रहा है? दुनिया भर के लोग आ-जा रहा है किसी को तुम्‍हारा जैसा प्राब्‍लम नहीं हुआ. जाओ इहां से दिमाग़ न चाटो’, ‍अब तक चुपचाप पान घुला रहे दूसरे ‘बर्दीधारी’ झल्‍लाए, जैसे किसी ने कच्‍ची नींद में झकझोर दिया हो. बंदे से रहा नहीं गया, उबल पड़ा, ‘माफ़ी चाहूंगा आपकी नींद में खलल डालने के लिए, नहीं मालूम था कि ये आपके सोने का वक्‍त़ है और जगह भी. जग ही गए तो ये बताने की कृपा करें कि शिकायत दर्ज करना यहां किनका काम है? लगे हाथ आप अपना-अपना नाम और ओहदा भी बता दीजिए. ज़रूरत पड़ी तो आपके साहब से नालिश कर सकूंगा.

गुलबदनजी ने चुप्‍पी तोड़ी, ‘आच्‍छा, त अब नामोपाता चाहिं, एसे पहिले कि धोआ जा इहवां, निकल ल.’ सुनते ही बंदे का ख़ून खौल उठा. धैर्य-वैर्य फेंक पड़ा, ‘थाना ही है न ये? फिर ये गुण्‍डागर्दी कैसी? बिल्‍ला न बांधे जाने की शिकायत लाकर मैंने अपराध कर दिया? भीड़ में कोई सामान हेरफेर हो जाए, कुली से बिछुड़ जाएं तो क्‍या उपाय रह जाएगा? ‘बिना बिल्‍ला वाले कुली से अपना सामान न ढुलवाएं और ऐसे कुलियों की शिकायत रेल पुलिस अथवा स्‍टेशन अधी‍क्षक से अवश्‍य करें’. सुनते तो होंगे ये अनाउंसमेंट? सूरत, लुधियाना, दिल्‍ली, पता नहीं किस-किस शहर से लोग यहां पहुंच जाते हैं, लेकिन नशा खिलाकर, सुंधाकर यहां उनका सामान लूट लिया जाता है. आज का ‘हिन्‍दुस्‍तान’ देखा है? इस स्‍टेशन पर ऐसे डेढ दर्जन मामलों की ख़बर तस्‍वीर के साथ छपी है. क्‍या जाने, कुछ कुली भी इस अपराध में शामिल हों. ठीक है, न कीजिए मेरी शिकायत दर्ज, मत बताइए अपना नाम. अधिकारियों को ये तो बता ही सकता हूं कि 18 मई को शाम 5.30 से 6.30 के बीच दो वर्दीधारी और एक गुलाबी कमीज़ वाले साहब ने रेलवे थाने के उस कमरे में मेरे साथ ऐसा सलूक किया था.’

हेठी का नायाब नमूना था वह. ‘त आप चाहते हैं कि हम कुलीअन से लड़ाई करे जाएं? अइसन होगा त हम दिन भर लड़ते रहेंगे,’ ख़ैनी के साथ सिपाहीजी ने थूका. ‘ना भइया, ये उम्‍मीद से रउआ पास ना आइल रहिं, बाकी जब मूड बनाइए लेले बानि त कवनो बात ना अब स्‍टेशने सुप्रीटेंडेंट के लगे होखि सुनवाई,’ कहकर बंदा फ्रीज हो गया.

‘आच्‍छा चलिए, बताइए किधर है उ कुली?’ दूसरे सिपाहीजी सुगबुगाए. पहले वाले ने हाथ से इशारा किया, कुर्सी पीछे धकेली और बोल पड़े, ‘रुकिए आप, हम जा रहे हैं, देखते हैं कवन माधरचोद है बिल्‍ला नहीं बान्‍हे वाला, सउंसे डंटा नूं पेल देंगे. चलिए भाई साहेब.’ कांख में बेंत दबाए वे बंदे के साथ हो लिए. इधर बंदे को देर होता देख रिश्‍तेदारों को चिंता होने लगी थी. तभी बिटिया की नज़र पड़ी, खिलखिला पड़ी, ‘पापा आ गए.’

अपनी बायीं ओर पर्याप्‍त मात्रा में थूक फेंक लेने के बाद ‘आपहीं का लड़की है, केतना सुन्‍दर है’ कहकर उन्‍होंने एक प्रवचन-सा पिलाया, ‘देखिए, आज कवनो ईमनदार है इ भारत देस में? कवनो नेता, कवनो मंत्री, कवनो हाकिम? जे विभाग में जाइए ओनहिं चोर, बईमान, भरष्‍ट भरल है. हमरा-आपका जइसन आदमी ईमनदारी के फेर में झुठ्ठे टाइम जियान करता है.’ अचानक किसी कुली को देखकर उनके तेवर बदले, ‘का रे? तोहार बैचवा कहां है? जेबी में? जेबी में रखे के लिए है? माधरचोद. शिकायत हो गया त जेहले में संड़ जाएगा. जमानतो नहीं होगा. जाओ, भाई साहेब का समान पहुंचाओ.’ डंडा घुमाते हुए बंदे से मुख़ातिब हुआ, ‘आच्‍छा, भाई साहेब ख़ुश हैं न. आउर कवनो सेबा.’

19.9.07

राम सेतू, हेतु किसके ?

अपने भाई गिरिन्द्र ने अपने ब्लॉग पर पिछले हफ्ते का एक तजुर्बा शेयर किया था. वही रामसेतू के रखवालों? द्वारा किए गए जाम के बारे में दो-चार पंक्तियों में अपनी बात कहकर उन्होंने बीबीसी से साभार ख़बर का एक टुकड़ा भी लगाया था. उस पर कुछ 'राष्ट्रीय' प्रतीकों' के चौकीदारों (दावा तो यही करते हैं) ने अपनी प्रतिक्रियाएं दागी. दागीं इसलिए कह रहा हूं कि वे गोलियों से कम न मारक न थे. बचते-बचाते मैंने भी आत्मरक्षार्थ एक गोला तैयार किया. वैसे तो गिरिन्द्र भाई ने पहले ही इसे ब्लॉगल-विचरकों के लिए 'अनुभव' पर लगा दिया था. तरमीम के साथ मैं फिर एक आर आपके हवाले:

गिरीन्द्र, चलिए आपने बीबीसी से साभार एक ऐसा टुकड़ा अपने ब्लॉग पर लगा दिया कि हमारे रामभक्तों को लगने लगा कि उनके राम की छुट्टी की जा रही है। संजीवजी या हमारे ऐसे जितने मित्र हैं उनसे अनुरोध है कि इतने सशंकित न हों. राम को अपनी हिफ़ाजत के लिए कम से कम आप या भाई तोगडिया या उन जैसे लोगों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. आपकी सहुलियत के लिए बता दूं कि जब हम अभिवादन में राम-राम करते हैं तो उसका मतलब ये नहीं होता है कि हम आपके एजेंडे में शरीक हो रहे हैं, उसके वाहक हो रहे हैं.

भाई हमारा राम जो है, बड़ा भला इंसान है. वो यहां के हज़ारों-लाखों के दिलों में है. वो लड़ाकू तो बिल्कुल ही नहीं है. RSS Pt. Ltd. ने तो उसको गुंडा-मवाली टाइप बना दिया है. उससे ज़मीन क़ब्ज़ा करवाते हैं.‍ जहां-तहां हुड़दंग करवाते हैं. हमारा राम सीधा-साधा था. पता नहीं किस चक्कर में पड़ के समाज-विरोधी गतिविधियों में शामिल हो गया. मुझे लगता है वो ख़ुद ऐसी हरकत करता नहीं होगा, उसे ज़रूर कुछ गुण्डे उठा ले गए होंगे, या फिर किसी उसकी कनपटी में कट्टा लगा दिया होगा या गले में रामपुरी.

वैसे भी हमारे समाज में अपनी काया और अपने मेहनत पर भरोसा करने वाले अल्पसंख्यक हैं, बेचारे टाईप. जिन्हें अपनी काया और मेहनत पर यक़ीन नहीं है वे ही लोग ब्राह्मणवाद, देवी-देवता, ओझा-भगत, डाइन-जोगिन, भूत-पिशात, छूत-अछूत ... में भारी यक़ीन करते हैं, और दुसरों को ऐसा करने के लिए उकसाते हैं. अब तो तरह-तरह से मजबूर भी करने लगे हैं. हैरत देखिए कि जब कोई इनका भेद खोलने की कोशिश करता है तो ये उसके पूर्जे खोलने के चक्कर में लग जाते हैं. पूर्जा खोलना माने, अस्थि - पंजर छिटकाना. इसकी कई तरक़ीब हैं उनके पास जिसके बारे में खुलासा कभी और करेंगे.

असल में राम वैसे तो था बड़ा सीधा-साधा लेकिन राजगद्दी के चक्कर में उसने भी कम दाव-पेंच नहीं खेले. क्या है कि राजनीति में तो ये सब करना पड़ता है. गद्दी सामने देखकर लोग राजधर्म के नाम पर कभी-कभी ग़लती भी कर जाते हैं. तो अपना राम भी एक बार बताया कि भइया हमारे बारे में ग्रंथ वग़ैरह में काफ़ी कुछ फ़िक्शन भी लिखा है. इतना बड़ा मैं था नहीं लेकिन कुछ लोग तब भी मेरे नाम पर रोटी सेंकने की फिराक में था. मुझे पुरुषोत्तम बना दिया. भइया, मैंने स्त्री विरोध का काम भी ख़ूब किया, नहीं? सबसे बड़ा प्रमाण गर्भवती पत्नी सीता को जंगल भेज दिया. बाल-बच्च भी साधु के जिम्मे ही रहे. जब तक चाहा भाइयों को भी नचाया. ज्यादा से ज्यादा सेनापति वगैरह की जिम्मेदारी दी उन्हें, और शंबूक वाला प्रकरण तो तुम जानते ही हो, करना पड़ा.

तो क्या है कि आज भी रातोंरात रातोंरात अमीर, दबंग, प्रतिष्ठित, प्रभावशाली, वर्चस्वशाली बनने के लिए हमारे आस-पास के लोग कुछ भी छल-प्रपंच रच लेते हैं. आप ही बताइए जिसको कुछ लोग राम सेतू कह रहे हैं, अगर अपने रामजी ही बनवाए थे वानरों के लंका प्रवेश के लिए तो ठीक ही किया होगा. लेकिन देखिए, राम कितने कमज़ोर विवेक वाले राजा निकले. काम हो गया, सीताजी को ले आए, साथ में रावणजी का घर भी तोड़ दिया, उनके भाई को अपने में मिला लिया - उसके बाद तो उस ब्रिज को तो तोड़ देना चाहिए था न। नहीं किए, क्यों? सोचा होगा बाद में फिर कोई लफ़डा होगा? असल में उस समय का प्रोपर्टी डीलर, ठेकेदार वगैरह भारी पड़ गया होगा. मुझे तो ऐसा ही लगता है. देखिए न, आज भी यही हो रहा है न. अब उस दिन जो रामसेतू के नाम पर उधम-कूद मची दिल्ली में, क्या लगता है आपको सब जायज था?

इतने सारे पुल टूट रहे हैं या तोड़े जा रहे हैं - उसके खिलाफ़ देशभक्तों के मुंह से कभी बकार नहीं निकलती है. और तो और मंदिरों को बांध-वांध के चक्कर में डूबोया जा रहा है. गुजरात में ही ऐसा हुआ है. सरेआम मंदिरों और मजारों को ध्वस्त किया गया. महानायकों और ईश्वरों की पीढियों का हिसाब-किताब रखने वाली कंपनी का कोई कमांडर तक नहीं बोला कभी.

'अनुभव' पर अपने कुछ ऐसे ही भाइयों ने जिक्र किया था कि कुतुब मी‍नार के कारण मेट्रो का रास्ता बदल दिया गया, ताजमहल की सफ़ाई के नाम पर जनता के जुल्म हो रहा है उधर आगरा में, लेकिन उस पर 'अनुभव' वाले भाई या इन जैसे लोग कुछ नहीं लिखते हैं. मेरा उन भाइयों से कहना है कि मेट्रो की चपेट में कितने घर, कितने परिवार, कितने लोग आए - आपने सोचा नहीं होगा. सोचा भी होगा तो उस पर कभी बोलने की नहीं सोची होगी. जहां तक कुतुबर मीनार के कारण मेट्रो का रास्ता मोड़ने की बात है, तो मेरा कोई ख़ास आग्रह नहीं है रास्ता आपके सुझाए रखने के खिलाफ या जो हो रहा है उसके खिलाफ. भई, मुझे तो यही लग रहा है कि देसी-विदेशी लोग आते हैं - सरकारी कोष में कुछ पैसा चढ़ा जाते हैं. कुल मिला कर कुछ फायदा, अगर आप ख़ुद को भी देश का हिस्सा मानते हैं तो, हमारे नाम भी आ जाता है. ये अलग बात है कि जिस तरह उसे ख़र्च होना चाहिए था - वो नहीं हो पा रहा है. रही ताजमहल वाली बात, तो भइया, वहां भी यही बात लागू होती है. लेकिन वहां ताजमहल के गंदा होने के नाम पर कल-कारखाने हटाए जाते हैं या लोगों को परेशान किया जाता है, तो तकलीफ वाली बात तो है ही. पर इससे भी दुख की बात ये है कि RSS & Party को कभी इस बात से ऐतराज हुई हो और उसने कभी अपने सांसदो, विधायकों, या सभासदों को इस्तीफ़ा देने के लिए एक बार भी कहा हो - कहीं पढ़ने या सुनने को नहीं मिला.

तो अपने परिचित, मित्र, और कार्यकर्ता के तौर पर मैं संजीव जी (अनुभव पर प्रतिक्रिया देने वाले) या ऐसे भाइयों की बहुत इज़्ज़त करता हूं, पर आप और आप जैसे मुट्ठी भर बंधुओं (क्योंकि ज्यादातर को तो इन फूसफास में यकीन ही नहीं है) की भावनाओं का कद्र कर पाने में ख़ुद को असमर्थ पाता हूं क्योंकि आपकी भावनाएं बेहद कमज़ोर हैं. बात-बात में आहत हो जाती हैं. कभी पुल से, कभी पेंटिंग से, कभी भोजन से, कभी ड्रेस से, कभी किताब से तो कभी वेलेंटाइन से. फिल्म और संगीत से तो अकसर आप जैसे मित्रों की भावनाएं ठेस खा जाती हैं. हर ठेस के बाद ऐसे ही कभी आप जैसे लोग जाम करते हैं, कभी पुतला फूंकते हैं (चाहते तो हैं वैसे आप पुतले के असली रूप को ही फूंकना), कभी लाठी चला देते हैं, कभी गोली चला देते हैं, कभी आग लगा देते हैं, कभी दंगा भड़का देते हैं. कभी-कभी तो आप जैसे कुछ मित्र सामूहिक बलात्कार भी कर लेते हैं महिलाओं के साथ. गिरिन्द्र भाई आपके माध्यम से मैं भाई संजीव और उन जैसे और भाइयों को यह सलाह देना चाहता हूं कि कृपया किसी अच्छे अस्पताल में अच्छे डॉक्टर से वे अपनी भावनाओं का इलाज कराएं. क्योंकि देखने में आया कि है कि पिछले कुछ सालों में दुनिया भर में और ख़ासकर के हिन्दुस्तान के कुछ ख़ास हिस्सों में कुछ ख़ास तरह के लोगों में यह रोग तेज़ी से फैलाया जा रहा है. ख़बर ये भी है कि इस रोग को फैलाने में गुजरात प्रांत में एक अंग्रेजी पद्ध्‍ति से इलाज करने वाले एक डॉक्टर की बड़ी भूमिका है. बिना टैबलेट और इंजेक्शन के डॉक्टर साहब इस रोग का किटाणु दुनिया भर में फैला रहे हैं. सुना है कि उनकी वाणि विषैली है और यह अदृश्य किटाणु उनकी जिह्वा पर निवास करता है। अब तो ये भी सुनने में आया है कि डॉक्टर साहब हथियार भी बांटने लगे हैं. बताया जाता है कि तीन नोंक वाले इस हथियार से किटाणु की रक्षा होती है, और जो लोग इस किटाणु से बचने का उपाय करते हैं उनको