21.10.08

बाढ़ के दो महीने बाद सहरसा

सहरसा रेलवे स्‍टेशन से कुछ तस्‍वीरें. काफ़ी कुछ माल है आपसे शेयर करने के लिए, पर थोड़ा वक्‍़त लगेगा.






13.10.08

डीटीपी को सच पसंद नहीं

13 अक्टूबर. शाम लगभग पांच बजे. दफ़्तर से लौट रहा था. पीछे चन्द्रा बैठी थी. बीडी एस्टेजट से थोड़ा पहले ही दिल्ली‍ ट्रैफिक पुलिस की बुलेट पर नज़र पड़ी. दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के नियम के मुताबिक़ मोटर साइकिल की पिछली सीट पर बैठे व्यजक्ति के लिए हेल्मेट पहनना अनिवार्य है. इसी नियम के मुताबिक़ DL-1S 4589 पर नीली-सफ़ेद वर्दी धारण किए महोदय के सिर पर हेलमेट होनी चाहिए थी. न रहा गया. अपनी मोटर साइकिल उनके क़रीब लाकर हल्केह से पूछ लिया, ‘सबके लिए क़ायदा-क़ानून, आपके लिए कुछ नहीं ? ‘ दांत निपोरे और बोले, ‘इमरजेंसी है...’ अचानक उनके मोटर साइकिल की रफ़्तार तेज़ हो गयी.
कुछ दूर बाद याद आया कि मेरे बैग में कैमरा तो है. चन्द्रा़ को कहा, ‘झट से कैमरा निकाल कर एक तस्‍वीर उतार लो सरजी की. चन्‍द्रा ने वैसा किया, पर थोड़ा वक़्त लग गया. और ये सब करते हुए हम तिमारपुर गोल मार्केट के क़रीब पहुंच चुके थे. चन्द्रा ने दो तस्वीरें ली थी. बुलेट के चालक महोदय ने दाईं ओर वाले आइने से यह देख लिया. अपने पीछे से आ रही ब्ल्यू लाइन को आगे न जाने देने के लिए पहली ब्‍ल्‍यू लाइन जैसे आड़े-तिरछे खड़ी हो जाती है, उसी अंदाज़ में उस गोरे-चिट्टे नौजवान ने अब बुलेट हमारे आगे खड़ी कर दी. अचानक ज़ोर से ब्रेक लगाना पड़ा.
पीछे बैठे दिल्‍ली ट्रैफिक पुलिस के सब इंस्‍पेक्‍टर का नाम अब हम पढ़ पा रहे थे. शुरुआती दो अक्षर दो बिंदुओं के साथ मिलकर नाम के अगले हिस्‍से को थामे था, और ‘डोगरा’ के साथ उसका समापन हो रहा था. यानी कोई डोगरा साहब थे वे. गुस्से में तमतमाते डोगरा साहब आये और जिस पुलिसिया अंदाज़ से हम परिचित हैं उसी में हमसे मुख़ातिब हुए. उनके उस उपक्रम को धमकाना भी कह सकते हैं. और वो गोरा, छरहरा जवान पहले कुछ शब्द अपने मुंह में छानता और फुसफुसाहट के अंदाज़ में कुछ मेरे सामने पटकता. पर उसकी लिप सिंकिंग हमें उसकी लगभग हर अभिव्यमक्ति समझा पा रहे थे. गली-मोहल्लों में नौजवान ऐसा बोलते ही रहते हैं. बहरहाल, श्री डोगरा साहब डांटते-धमकाते हुए हमें ये समझाने की कोशिश कर रहे थे कि किसी की इमरजेंसी को हम नहीं समझ पाए. उनकी गाड़ी या कुछ ख़राब है जिसको बनवाने के लिए वे मेकेनिक ले जा रहे हैं अपने साथ. यानी उस गोरे नौजवान को उन्होंने मेकेनिक बताया जिसके मुंह से रह-रह कर महीन बातों (बदलफ़्जों) की बुंदाबांदी हो रही थी. हमारा अंदाज़ है कि वो या तो डोगरा साहब का बेटा था या कोई बेहद रिश्तेदार या परिचित.
श्रीमान डोगराजी की इस हरकत को क़रीब 50 राहगीर देख रहे. जानने की कोशिश कर रहे थे लोग कि हमेशा आम आदमी की पर्ची काटने वाला ये पुलिसकर्मी आखिर यूं उलझ क्‍यों रहा है इस दंपत्ति से. तभी एक मित्र न जाने कहां से आ धमके. हम कुछ उन्‍हें बता पाते, इससे पहले डोगरा साहब ने लगभग एक सांस में ही ये बता दिया कि हमने कितनी बड़ी ग़लती कर दी है उनकी तस्‍वीर लेकर. साथ में डोगरा साहब ने हमारे मित्र को ये भी 'समझाया' कि हममें इंसानियत है ही नहीं. हमारे मित्र को समझाने का डोगरा साहब का अंदाज़ लगभग वैसा ही था जिस तरह वो हमें 'समझाने' की कोशिश कर रहे थे. उनका ‘मेकेनिक’ अपने ‘मालिक’ की वर्दी और स्थिति को देखते हुए अब फुसफुसाहट से आगे बढ़ चुका था. फुसफुसाहट अब सिसिआहट (धीरे-धीरे सिटी बजाने की आवाज़) का रूप लेने लगी थी. अब उसके कुछ शब्‍द साफ़-साफ़ बाहर आने लगे थे. ‘अच्छा फोटो खिंचा है, देखते हैं .... बताते हैं ....’ उसने मेरी मोटर साइकिल की नंबर प्‍लेट पर भी नज़रें इनायत की. तात्पर्य ये कि श्रीमान डोगरा साहब और उनके मेकेनिक में ये तय कर पाना मुश्किल हो रहा था किसकी धमकी/डांट मेरे लिए ज्‍़यादा समझने और आदर करने योग्‍य है. मैं बार-बार दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के सब इंस्पेक्‍टर श्रीमान डोगराजी से यही अनुरोध करता रहा कि ‘आप अपनी बात कहिए पर इस जनाब को चुप कराइए’. तमतमाहट इतनी थी कि वे मेरी बात सुन नहीं पा रहे थे. कई बार तमतमाहट सुनने में अवरोध उत्‍पन्‍न करने लगता है.
दिल्लीट ट्रैफिक पुलिस के एक सब इंस्पेबक्ट र की उनके ही विभाग द्वारा बनाए और उसी की हिफ़ाज़त में पलने वाले क़ानून की अवहेलना करने की एक मिसाल कैमरे में क़ैद कर लेने का 'जुर्म' हम पर थोपा जा रहा था. मुझे इस बात के लिए खुली सड़क पर हर संभव तरीक़े से ‘समझाया’ जा रहा था कि मैंने कैसे ग़लत किया है. कैसे ये ग़लती मुझे परेशानी में डाल सकती है.
अपने देश में न्याय केवल भांति-भांति के सप्‍ताहों, पखवाड़ों, जयंतियों, पुण्‍यतिथियों, दिवसों तक ही सिमट कर रह गया है? गांधी जयंती गुज़रे एक पखवाड़ा भी नहीं बीता है. अख़बारों का वज़न विज्ञापनों से दोगुना हो गया था उस दिन. शायद ही कोई विभाग बापू की तस्‍वीर के साथ अपना संदेश और विज्ञापन प्रकाशित करने रह गया हो उस दिन. सबने सच की राह पर चलने की नसीहत दी. हर साल देते हैं. एक सच पर अमल क्‍या किया रात भर नींद ही नहीं आयी.
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1.10.08

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13.9.08

विस्‍फोट के वक्त हम सेंट्रल पार्क के आसपास ही थे

तू जिन्दा है तो जिन्‍दगी की जीत पर यक़ीन कर, अगर कहीं हैं स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर ... गा रहे थे हम लोग. संवेदना मार्च जनपथ मार्केट से गुजर रहा था. हममें से कुछ के हाथों में दान-पात्र थे. लोग हमें कौतूहल भरी नजरों से देख रहे थे और उन्हीं में से कुछ हमारे दान-पात्रों में कुछ डालते जा रहे थे. ये बिहार के बाढ़ पीडितों के लिए राहत के लिए किया जा रहा था. हमारा गाना ख़त्म भी नहीं हुआ था कि दो ज़ोरदार धमाके हुए. साथ चल रही मालविका ने पूछा, 'सर ये किस चीज़ की आवाज़ है ?' कबूतर उड़ाने के लिए किसी ने पटाखे छोड़े हैं शायद, कहकर मैंने मामले को हल्का करना चाहा.
हम गाते हुए जंतर-मंतर की तरफ़ बढ रहे थे. अफ़रातफ़री-सी शुरू हो गयी थी. इसी बीच ग्रीष्मा ने कहा कि उसके पापा ने फोन करके बताया है कि दिल्ली में सिरीयल ब्लास्‍ट हो रहा है. करोलबाग और सेंट्रल पार्क में हो चुके हैं धमाके. यानी जिसे मैंने कबूतर उड़ाने वाला पटाखा कहा था अब वो सचमूच का बम-विस्‍फोट साबित हो चुका था. सेंट्रल पार्क से केवल आधा किलोमीटर दूर थे हम. चारों ओर से पुलिस और एम्बुलेंस उधर ही जा रही थी. हमारे पीछे-पीछे चल रहे एक वायरलेस वाले सिपाही ने हमसे दो-दो के ग्रुप में जल्दी से जल्दी इलाक़ा छोड़ देने की लगभग मिन्नत ही कर रहे थे. आखिरकार, हमें वहां से हटना पड़ा.
कुछ लोग सेंट्रल पार्क जाकर वोलंटियरी भी करना चाह रहे थे. पर देर हो चुकी थी. हमें भगाने वाले लोग हमसे ज़्यादा प्रतिबद्ध निकले. गजब की भीड़ थी मेट्रो में. पहले कभी भी वैसी भीड़ नहीं देखी. तिल रखने की जगह भी नहीं थी. किलकारी और कई अन्य साथियों तो फर्श पर ही बैठ गए. थके थे.
पल भर में ही दिल्ली और बाहर से तमाम दोस्तों के मैसेज आ गए. हालचाल जानना चाह रहे थे वे. दिल्ली के कुछ दोस्तों को मालूम था कि आज बिहार फ़्लड रिलीफ़ नेटवर्क की ओर से संवेदना मार्च निकलने वाला है. कई दोस्तों आशंकित थे. नौ बजे के क़रीब जब फोन चालू हुआ तो सबको बताया कि ठीक हैं हम लोग और मार्च ठीक ठाक रहा. तक़रीबन तीन हज़ार रुपए भी जमा हुए.
पता चला है कि कुछ संगठनों ने जिम्मेदारी ली है इस सिरीयल ब्लास्ट की. मुझे नहीं मालूम कि कैसे लोग हैं ये जो ऐसे विस्‍फोटों के बाद जिम्मा झटकने लगते हैं. इस झटकदारी से अगर कोई किसी मसले को हल कर लेने का मंसूबा रखता है तो भइया एक नहीं हज़ारो-लाखों बार उन्हें पटखनी खानी होगी. कौन सा समाज इस बर्बरता की तरफदारी करेगा. ये निहायत ही खोखला और कायराना काम है.
के शिकार हुए लोगों के प्रति व्यक्त करने का कोई नहीं है मेरे पास. इस क्षति की भरपाई कैसे होगी, नहीं मालूम. हां, आगे न हो इसके लिए समाज में विश्वास का माहौल क़ायम करना बेहद ज़रूरी है. कैसे होगा

12.9.08

बिहार बाढ़ पीड़ितों के साथ एकजुटता के लिए सामने आएं

बिहार फ़्लड रिलीफ़ नेटवर्क की ओर से बिहार बाढ़ पीडितों के समर्थन में जारी अपील

प्रिय साथियों
बिहार के शोक के नाम से जानी जानेवाली कोसी नदी ने अपने साथ हुई छेड़छाड़ के प्रति अपना ग़ुस्सा दिखाते हुए तटबंधों को तोड़ दिया है। उत्तर बिहार के 15 ज़िले के लोगों की ज़िंदगी और रोज़गार पानी के धारों के साथ बह चली है। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से राज्य के लगभग 30 लाख लोग अपने घर, रोज़गार और सम्मान से वंचित हो गए हैं। अपनी मेहनत से कमाकर खानेवाले लोग मुट्ठी-भर दाने के लिए मुहताज हो गए हैं। कार्यकर्ता और बचाव और राहत कार्य में जुटे गंभीर विश्लेषकों का मानना है कि मृतकों और प्रभावितों की संख्या का सही आकलन तभी लगाया जा सकता है जब बाढ़ उतर जाए और सारे लोग अपनी जगह पर वापस आ जाएं। इसकी संभावना भी कम ही दिखाई देती है क्योंकि अभी से लोग बड़ी संख्या में पनाह और रोज़गार की तलाश में दिल्ली, पंजाब और दूसरे छोटे-बड़े शहरों की ओर पलायन करने लग गए हैं। एक अख़बार के अनुसार 1 लाख हेक्टेयर या 2.5 लाख एकड़ की खेती तबाह हो गई है। इससे बिहार की पहले से बिगड़ी खाद्य-स्थिति पर और भी बुरा असर पड़ेगा और क्षेत्र की जनसंख्या को पोषित करने की क्षमता में तीव्र गिरावट निश्चित है।

दोस्तो, जैसे-जैसे बाढ़ के पानी के उतरने की ख़बर आ रही है मीडिया के लिए बाढ़ की ख़बर ग़ैर-ज़रूरी होती जा रही है। बिहार सरकार ने मान लिया है कि बचाव का काम पूरा हो चुका है और अब बचाव कार्य की कोई ज़रूरत नहीं रह गई है। सरकार ने यह घोषणा भी कर दी है लेकिन बचाव और राहत कार्य से जुड़े एक प्रोफ़ेसर कार्यकर्ता ने सेना के एक महत्वपूर्ण अफ़सर के हवाले से कहा है कि अभी तक 3/4 लोग यहां-वहां बाढ़ के पानी में फंसे हैं और उनतक राहत का कोई सामान नहीं पहुंच रहा है।

अभी समय की मांग है कि सभी प्रभावित और बाढ़ में फंसे लोगों को बिना और समय गंवाए सुरक्षित जगहों तक पहुंचाया जाए। बाढ़ग्रस्त इलाक़ांे से यह ख़बर आ रही है कि बचाव और राहत कार्य में दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ बड़े स्तर पर भेदभाव किया जा रहा है। हम सभी का यह दायित्व है कि सरकारों और प्रशासन पर यह दबाव बनाया जाए कि वे जाति-धर्म और दूसरी सभी दीवारों को भूलकर सभी प्रभावित लोगों को देश का समान नागरिक मानकर अपनी सेवाएं पहुंचाएं।

दोस्तो, बाढ़ प्रभावित इलाक़ों में राहत सामग्रियों की बेहद कमी है। कई सामाजिक संस्थाओं, राज्यों की सरकारों और दूसरे समूहों ने अपनी इस ज़िम्मेदारी को समझते हुए बाढ़ पीड़ितों के साथ अपनी एकजुटता का परिचय दिया है और राहत के कामों में जुटी हैं। लेकिन इस बाढ़ से जिस स्तर की तबाही आई है उससे लड़ने के लिए इतना सहयोग काफ़ी नहीं है। बिहार की सरकार द्वारा कोसी नदी तटबंध के टूटने के पहले और बाद में जिस तरह की लापरवाहियां बरती गई हैं वे जगज़ाहिर हैं। बचाव और राहत कार्यों को पूरा करने में भी सरकार ने अपनी अक्षमता का खुलकर प्रदर्शन किया है। इन कारणों से सरकारी पुनर्निर्माण की संभावनाएं भी शक के घेरे में आ जाती हैं। इसलिए जागरूक नागरिकों की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि बचाव और राहत कार्यों पर कड़ी नज़र रखें और राहत सामग्री सही हक़दारों तक पहुंचे इसकी भी गारंटी करें।

दोस्तो, इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि बाढ़ का पानी जैसे-जैसे उतरेगा मानवीय अपील के कारण होने वाले राहत कार्य भी शिथिल पड़ते जाएंगे। पीड़ित लोगों की यादों में बाक़ी रह जाएंगी अपने अपनों, घर और रोज़गार की तबाही की तस्वीरें और एक ऐसा निराशाजनक भविष्य जो किसी का भी दिल दहला दे। इसलिए हमारी यह भी मांग होनी चाहिए कि सभी प्रभिावित लोगों का पूरा पुनस्र्थापन हो। जीवन और मानवता के पुनर्निर्माण के इस काम में हमें अपनी भूमिका भी तय करनी होगी। अगर हम इस काम में असमर्थ रहते हैं तो पलायन का एक ऐसा दौर चलेगा जो ग़रीबों के जीवन को और भी कठिन बना देगा और मानवाधिकारों की सभी लड़ाइयों को कमज़ोर कर देगा।

दिल्ली के सजग नागरिकों, कार्यकर्ताओं और सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने मिलकर बिहार फ़्लड रिलीफ़ नेटवर्क नाम से एक मोर्चा बनाया है जो बाढ़ पीड़ितों के अधिकारों के लिए काम करनेवाले लोगों और संस्थाओं के कामों में अपना सहयोग दे रहा है। आप भी इस मोर्चे से जुड़ें और बिहार के बाढ़ पीड़ितों के जीवन के पुनर्निर्माण के काम में अपना सहयोग सुनिश्चित करें।

ज़्यादा जानकारी के लिए संपर्क करें
राकेश सिंह फ़ोनः 9811972872 ईमेलः rakeshjee@gmail.com
विनय सिंह फ़ोनः 9810361918 ईमेलः kumarvinaysingh@gmail.com
इश्तियाक़ अहमद फ़ोनः 9968329198 ईमेलः muktigami@gmail.com

26.8.08

उनहत्तर वर्षीय शिशु राजेन्द्र यादव

राजेन्द्र यादव पर अब चर्चा को आगे बढ़ा रहे हैं अभिषेक कश्यप. समकालीन कथाप्रेमियों के लिए अभिषेक कश्‍यप नए नहीं हैं. आम जीवन के बेहद आम कोनों में जाकर झांकना तथा महीन से महीन अनुभवों पर उतनी ही बारीक दृष्टि अभिषेक की कहानियों की ख़ासियतें हैं. अभिषेक को कुछ हद तक राजेन्द्र यादव के कहानी कारख़ाने का प्रॉडक्ट भी कह सकते हैं. ढाई साल तक भारतीय ज्ञानपीठ की मासिक पत्रिका 'नया ज्ञानोदय' में सहायक संपादक रहे अभिषेक ने हंस के खबरिया चैनलों पर केंद्रित बहुचर्चित अंक में अतिथि सहायक संपादक की जिम्मेदारी भी निभाई. पिछले साल उनकी पहली किताब खेल (कहानी संग्रह) छप कर आयी. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियां प्रकाशित होती रही हैं. फिलहाल वे युवा रचनाशीलता पर केंद्रित अनियतकालिक पत्रिका 'हमारा भारत' का संपादन कर रहे हैं. अभिषेक को और ज़्यादा जानने के लिए गल्पायन पहुंचें. तो पढिए उनहत्तर वर्षीय शिशु राजेन्द्र यादव ...


उनका बहुचर्चित उपन्यास 'सारा आकाश' हिन्दी की बेस्टसेलर पुस्तकों की सूची में शामिल है जिसकी अब तक दस लाख प्रतियां बिक चुकी हैं. वे मीडिया में सबसे ज़्यादा छाए रहने वाले साहित्यकार हैं. संभोग से समाधि तक हर विषय पर माने हुए सूरमाओं से लेकर हर ऐरे-ग़ैरे नत्थू खैरे तक को इंटरव्यू देने को तैयार रहते हैं. शायद इसलिए अशोक वाजपेयी कहते हैं - ''यादवजी ने जान-बूझ कर हिन्दी के सार्वजनिक बुद्धिजीवी की भूमिका अख्तियार कर ली है.

वे 28 अगस्त को 79 साल के हो जाएँगे मगर जब आप उन्हें बुढापे की याद दिलाएंगे तो वे ज़ोरदार ठहाका लगायंगे - "अपने बुढापे की बात कर रहे हो क्या? मै तो अभी शिशु हूँ." और वाकई सारा जीवन उन्होंने एक शिशु की तरह ही बिताया है. परिवार की जिम्मेदारियों और घर-गृहस्थी की चिंताओं से मुक्त. विवादों, बहसों और अलोचनाओं के बीच वे हमेशा ठहाके लगाते मिल जाएँगे. अंसारी रोड, दरियागंज स्थित उनकी मासिक पत्रिका 'हंस' का दफ़्तर दिल्ली में शायद बौद्धिक अड्डेबाजी की सबसे मुफ़ीद जगह है .
वे हिन्दी के शायद सबसे चर्चित (और विवादित भी) लेखक-संपादक हैं, जिनके लिखे और कहे पर अकसर हंगामा मच जाता है और रामझरोखे बैठ कर वे इन हंगामों का ख़ूब मज़ा लेते हैं. अपने अद्भुत प्रबंध कौशल के बूते अत्यन्त सीमित संसाधनों के बावजूद वे पिछले 22 सालों से 'हंस' जैसे लोकतान्त्रिक मंच को बचाय हुए हैं. 'हंस' के ज़रिए एक तरफ़ आत्मप्रचार से बचकर उन्होंने उत्कृष्ट कथाकारों-गद्यकारों की कई पीढियाँ तैयार की तो दूसरी तरफ़ दलित और स्त्री के सवाल को हाशिए से उठा कर मुख्यधारा में ला दिया.
वे अकसर बताते हैं - "मेरी साठ किताबें हैं और मुझे हर साल पौने दो, सवा दो लाख की रोयल्टी मिलती है." शक की गुंजाईश नहीं, क्योंकि उनका बहुचर्चित उपन्यास 'सारा आकाश' हिन्दी की बेस्टसेलर पुस्तकों की सूची में शामिल है जिसकी अब तक दस लाख प्रतियां बिक चुकी हैं. वे मीडिया में सबसे ज़्यादा छाए रहने वाले साहित्यकार हैं. संभोग से समाधि तक हर विषय पर माने हुए सूरमाओं से लेकर हर ऐरे-ग़ैरे नत्थू खैरे तक को इंटरव्यू देने को तैयार रहते हैं. शायद इसलिए अशोक वाजपेयी कहते हैं - ''यादवजी ने जान-बूझ कर हिन्दी के सार्वजनिक बुद्धिजीवी की भूमिका अख्तियार कर ली है. रामविलास शर्मा पर 'हंस' में लिखे सम्पदाकीय में उन्होंने लिखा - 'रामविलास की जेब में हाथ डालने की आदत नहीं थी. बाद में नामवर सिंह ने इस कला का चरम विकास किया.' मज़े की बात है कि उन्हें भी जेब में हाथ डालने की आदत नहीं. एक-एक रुपया बहुत सोच-समझ कर ख़र्च करते हैं. उनके चाहने वालों की कोई कमी नहीं. हर साल उन्हें थोक में उपहार मिलते हैं - कुरते, घडियां, महँगी स्कॉच-वाइन की बोतलें, इम्पोर्टेड सिगरेट, किताबें, मोबाइल...मगर वे किसी को क्या उपहार देते हैं यह शोध का विषय है. अरसे पहले मन्नू जी ने 'हंस' में प्रकाशित अपने आत्मकथ्य में नई कहानी आन्दोलन को याद करते हुए लिखा था - 'उन दिनों राजेंद्र बोलने में बहुत पिलपिले थे.' वे आज भी ऐसे ही हैं. 'हंस' के दफ़्तर की महफिलों में सबकी बोलती बंद करने वाले राजेंद्रजी मंच पर पिलपिले ही नज़र आते हैं. नामवर या कमलेश्वर की तरह मंच लूटने का कौशल उन्हें कभी नहीं आया. लालू यादव से लखटकिया पुरस्कार लेने के अपवाद को छोड़ दें तो पुरस्कारों के मामले में उनका दामन बेदाग़ ही रहा है. छोटे-बड़े दर्जनों पुरस्कार उन्होंने ठुकराएँ हैं और अपने मित्र स्वर्गीय कमलेश्वर की तरह राजनेताओं के साथ मंच पर बैठने से परहेज करते हैं. हाँ, नामवर सिंह के साथ वे मंच पर हों तो श्रोताओं को किसी दिलचस्प कॉमेडी फ़िल्म का मनोरंजन उपलब्ध हो जाता है. ये हैं राजेंद्र यादव. हिन्दी साहित्य के इस गॉदफ़ादर के लिए लम्बी उम्र की दुआ कौन नहीं मांगना चाहेगा?

25.8.08

अस्सीवें साल में दाखिल हो रहे राजेन्द्र यादव


राजेन्द्र यादव हिन्दुस्तान या हिन्दी-साहित्य के कौन हैं कौन नहीं हैं, काफ़ी कुछ कहा गया है और कहा जाता रहेगा. मैंने इस सख़्स को सबसे पहले 'कांटे की बात' के ज़रिए जाना. ऐसा कांटा कि एक बार हल्का भी चुभ जाए तो टीस गहरी होती है और सबसबाती देर तक है. जुलाई-अगस्त 1990 में मंडल विरोधी 'आंदोलन' पर कांटे की बात में राजेन्द्र यादव की एक बात अकसर याद आ जाती है कि दिल्ली की लड़कियां हाथों में तख्तियां लिए सड़कों पर उतर आयी थीं, जिन पर चिंता ज़ाहिर की गयी थी कि आरक्षण के कारण अब उनकी शादी नहीं हो पाएगी क्योंकि उनके माता-पिता को नौकरीशुदा दुल्हे नहीं मिल रहे हैं(असल उद्धरण नहीं, अपनीस्मृति से). संघ का अयोध्या कांड रहा हो या तालिबान का बामियान कांड, कांटा सबने चुभोया. ऐसे कितने सवाल/मसले कांटे की बात में उठाए राजेन्द्र यादव ने. सब पर कलमदराज़ी की. रोशनाई बनकर हंस पर टपके उनके गुस्सैल आंसुओं ने किसकी संवेदना को नहीं झकझोरा. मैं हर बार राजी होता रहा. मतभेद कम रहा या रहा ही नहीं.
कांटों से बिंध जाने के बाद मन हुआ श्रव्यसुख पाने का. 97-98 की बात होगी. दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोगेसिव स्टूडेंट्स युनियन का हिस्सा था. संघ-संप्रदाय के संगठनों से गुत्थम-गुत्थी रोज़मर्रा का हिस्सा-सा बन गयी थी. नागपुर और रानी झांसी रोड से उनके पुरोधा आते थे और अगलगुला उगल कर चले जाते थे. उसके बाद परिसर में राष्ट्रगीत का मुखड़ा चीख़ और चुहल की गिरफ़्तारी में छटपटाने लगते थे. ऐसे में अमनपसंदों को अकसर हंस दफ़्तर की याद आती और राजेन्द्र यादव कैंपस आते. कभी 22 नंबर में तो कभी 56 नंबर में. कभी उन्होंने ये नहीं पूछा कि कितने लोग आ जाएंगे, या किस सभागार में होगी चर्चा. अब यह सोचता हूं कि आखिर ऐसा क्यों था. एक-आध बार दिल्ली विश्वविद्यालय से ही जब किसी चर्चित निरपेक्ष व्यक्तित्व को बुलाने की कोशिश की तो उन्होंने कोई-न-कोई बहाना बना कर टाल दिया. याद नहीं है कि यादवजी ने कभी बहानेबाज़ी की हो. हद से हद यही कहा 'किसी को भेज देना मुझे लेने के लिए, समय बच जाएगा'. यानी मेरे लिए यादवजी कभी न कॉम्प्रोमाइज़ करने वाले योद्धा ठहरे. यही कारण है कि उनकी ठनी भी ख़ूब: व्यक्तियों से लेकर संस्थाओं तक से. प्रसारभारती को तो उन्होंने प्रचारभारती कहा ही.
साहित्य मेरा बेहद कमज़ोर है. बहुत कम पढ़ाई-लिखाई की है. पर जो भी मोटी समझ है उसके आधार पर यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि यादवजी ने हमेशा साहित्य का एजेंडा तय किया है. कोई भी विमर्श ले लें, हंस नामक मंच से ही उसकी शुरुआत हुई है. एक ही अंक में धूर-विरोधी मत और फिर उस पर चलती बहसों की श्रृंखला: हंस के अलावा नहीं दिखा कभी. पाठकों ने जो खिंचाई की वो अलग. राजेन्द्र न डमगाए. कभी न डगमगाए. ज़रूरत पड़ने पर सफ़ाई दी पर पोजिशन न बदली. हंसीय हलचल का असर भारतीय राजनीति पर भी दिखा. विशेषकर दलित और स्त्री अगर आज भारतीय राजनीति के केंद्र में है तो इसका श्रेय हंस को जाता है, राजेन्द्र यादव को जाता है. हंस के ज़रिए बौद्धिक जगत में जो भी सुगबुहाट हुई, भारतीय राजनीति को उसने बार-बार आइना दिखाया. और आइने में इस राजनीति ने अपने काले चेहरे को देख उसको साफ़ करने की कई बार दिखाउ ही सही, पर कोशिश ज़रूर की और आज भी कर रहे हैं.
नए रचनाकर्मियों के लिए राजेन्द्रजी से बड़ा प्रोत्साहक और कौन होगा. पोल्हा कर, डांट कर, और तो और गरिया कर उन्होंने नौजवानों से लिखवाया और लिखवा रहे हैं.
दो दिन बाद यानी 26 अगस्त 2008 को राजेन्द्र यादव अस्सीवें साल में दाखिल हो रहे हैं. हफ़्तावार की ओर से उन्हें इस मौक़े पर ढेर सारी बधाइयां और उनके इस सफ़र के और मानीख़ेज और लंबा होने के लिए सहश्र शुभकामनाएं. इस अवसर पर हफ़्तावार राजेन्द्र यादव के जीवन-कर्म पर एक चर्चा आरंभ कर रहा है. निजी संस्मरण हो तो और बढिया, अन्यथा आपकी हर राय और प्रतिक्रिया का स्वागत है.