उत्तर बिहार के तरियानी छपरा की पैदाइश. पन्द्रह बरस से दिल्ली में. कॉलेज के पहले साल में मैनेजमेंट को कॅरियर बनाना सोचा था. दूसरे साल तक आते-आते छात्र-आंदोलन का हिस्सा बन गया. धीरे-धीरे वृहत्तर सामाजिक प्रश्नों को भी जाना-समझा. फ़्रीलांस जर्नलिस्ट बनने की नियत से लिखना-उखना शुरू किया पर चेक इतनी देर से आते थे कि टीबी का मरीज़ हो गया. इलाज मां-बाप को ही करवाना पड़ा. अस्पताल से लौटकर अनुवाद आज़माया. कमरे का किराया तक नहीं निकाल सका. फिर आया शोध की दुनिया में. रम गया. मीडिया, बाजार, शहर और श्रम पर थोड़ी-बहुत समझ बनाने की कोशिश कर रहा है. अब तक तीन 'मीडियानगर' का संपादन कर चुका है. सामाजिक सरोकार बरकरार है. यार-दोस्तों और बीवी-बच्चे के साथ मिलकर गली-मोहल्लों और गांव-घर में कुछ-कुछ करता रहता है. सामुदायिक मीडिया में दिलचस्पी है. छिटपुट प्रयोग करता रहता है. हरदम सहयोगियों की तलश रहती है.
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