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22.7.08

एक छोटी सी तजवीज़: ‘जहनचोद’

मित्रों ये रहा शुद्धब्रत सेनगुप्ता के लेख अकथ कथन अर्थात ज़ेहन के गुप्त रोग का आखिरी हिस्सा. इसे हिस्से में शुद्धा एक छोटी-सी तजवीज़ पेश करते हैं. क्या है ये तजवीज़ आप ख़ुद ही देख लीजिए. वैसे इस आखिरी हिस्से के साथ मुझे बस एक ही बात कहनी है कि पहले दो किस्तों तक तो पाठकों ने इस लेख पर अपनी राय दी. हालांकि ज़्यादातर फ़ोन पर ही. पर ज़रूरी ये है कि हम इस तरह के शोधपरक लेखों पर भी चर्चा करें.
लेकिन अभी मेरी बात ख़त्म नहीं हुई है। अभी मैं अपनी एक छोटी सी तजवीज़ भी आपके सामने रखना चाहता हूँ। और

मेरी तजवीज़ ये है कि गालियों (जो औरतों से संबंध बनाने तक सीमित रह गई हैं) के इस अति दरिद्र भंडार में इज़ाफ़ा किया जाए और उनमें ऐसी अभिव्यक्तियाँ भी शामिल की जाएँ जो गालियों के तौर पर ज़्यादा मुफ़ीद हों (गाली लाज़िमी तौर पर मारक होनी चाहिए और मारक ही सुनाई भी पड़नी चाहिए, वर्ना तो भला उसका मतलब भी क्या रह जाएगा), उनमें भेदभाव की गुंजाइश कम हो (यानी उनको बोलने वाले के लिए और सुनने वाले के लिए भी इस्तेमाल किया जा सके और जिसके बारे में बात हो रही है उसके बारे में कुछ कहने की तो बात ही छोड़ दीजिए), उनमें माँ-बहनों के साथ इतना ज़िद्दी लगाव न हो, वे ग़ैर-मीसोजेनिस्ट हों, साफ़ तौर पर यौनिक मगर ग़ैर-सेक्सवादी, बल्कि सेक्सवाद विरोधी हों

मेरी तजवीज़ ये है कि गालियों (जो औरतों से संबंध बनाने तक सीमित रह गई हैं) के इस अति दरिद्र भंडार में इज़ाफ़ा किया जाए और उनमें ऐसी अभिव्यक्तियाँ भी शामिल की जाएँ जो गालियों के तौर पर ज़्यादा मुफ़ीद हों (गाली लाज़िमी तौर पर मारक होनी चाहिए और मारक ही सुनाई भी पड़नी चाहिए, वर्ना तो भला उसका मतलब भी क्या रह जाएगा), उनमें भेदभाव की गुंजाइश कम हो (यानी उनको बोलने वाले के लिए और सुनने वाले के लिए भी इस्तेमाल किया जा सके और जिसके बारे में बात हो रही है उसके बारे में कुछ कहने की तो बात ही छोड़ दीजिए), उनमें माँ-बहनों के साथ इतना ज़िद्दी लगाव न हो, वे ग़ैर-मीसोजेनिस्ट हों, साफ़ तौर पर यौनिक मगर ग़ैर-सेक्सवादी, बल्कि सेक्सवाद विरोधी हों और सुनने में सबको मज़ा आए।
इस मुक़ाम पर मैं आपके सामने ऐसा ही एक शब्द उछालने जा रहा हूँ और मुझे उम्मीद ही नहीं बल्कि भरोसा है कि आप में से बहुत सारे लोग इस चुनौती को स्वीकार करेंगे और इससे कहीं ज़्यादा बेहतर शब्द गढ़ेंगे। मुझे यक़ीन है कि समय गुज़रने के साथ आप गालियों का एक भरा-पूरा भंडार इकट्ठा कर लेंगे और उनके सहारे हमारी रोज़ की बातचीत और मसालेदार बन जाएगी। मैं जो शब्द पेश करने जा रहा हूँ वह एक जाने-पहचाने शब्द से हूबहू मिलाता है। इस शब्द के साथ एक विस्फोटक सीत्कार निकलती है जो आवेग से लेकर गुस्सा दाँत भींचने, या उदासीनता, और यहाँ तक कि हैरानी, पस्ती और निराशा के भावों को व्यक्त करती है।
मैंने जो शब्द सोचा है वह ‘जहनचोद’। मैने पहले ही कहा था कि इसका उच्चारण कुछ ऐसे शब्दों से काफ़ी मिलता-जुलता है जिन्हें आपने भी बहुत बार सुना होगा। यह ईश्वर, नियति, औरों, वक़्त, समाज, प्रकृति और ख़ुद उस शख़्स के हाथों

मैंने जो शब्द सोचा है वह ‘जहनचोद’। मैने पहले ही कहा था कि इसका उच्चारण कुछ ऐसे शब्दों से काफ़ी मिलता-जुलता है जिन्हें आपने भी बहुत बार सुना होगा। यह ईश्वर, नियति, औरों, वक़्त, समाज, प्रकृति और ख़ुद उस शख़्स के हाथों चेतना, आत्मा और इसानी ज़ज़्बे के साथ शारीरिक संबंध को व्यकत करता है। यह एक ऐसा शब्द है जो इंसानी हालात में भारी विविधताओं को व्यक्त करता है और दूसरी तरफ़ हर उस ज़ेहन के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता भी दर्शाता है

चेतना, आत्मा और इसानी ज़ज़्बे के साथ शारीरिक संबंध को व्यकत करता है। यह एक ऐसा शब्द है जो इंसानी हालात में भारी विविधताओं को व्यक्त करता है और दूसरी तरफ़ हर उस ज़ेहन के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता भी दर्शाता है जिसकी कथित रूप से चुदाई हुई है। यह लैंगिक गाली नहीं है - इसे आप बेझिझक अपने ऊपर भी इस्तेमाल कर सकते हैं - ‘मेरा ज़हन चोद दिया’। यह गाली उन आधे-अधूरे समानार्थियों के मुक़ाबले भी काफ़ी बेहतर है जो जहाँ-तहाँ अभी भी सुनाई दे जाते हैं। ‘माइंडफ़क’ इसी तरह की एक गाली है। दक्षिण एशियाई भाषाओं में मैंने ‘चोद’ प्रत्यय पर ख़त्म होने वाली सिर्फ़ एक ऐसी गाली सुनी है जो लैंगिक अर्थों से आज़ाद है - ‘बोकाचोदा’ यानी मूर्ख़ चुदाईबाज़। यह एक बड़ी शोख़-सी बंगाली गाली है। मगर हिन्दुस्तानी में बंगाली का सबसे बेहतरीन प्रतिनिधि बनने की संभावना रखने वाले इस बोकाचोदा में भी ज़हनचोद जैसी अस्तित्वादी गहराई या व्यापक चोट करने का दम नहीं है।
अब मीडिया को ही लीजिए। जब भी कभी हम कोई नई हिन्दी फ़िल्म देखने जाते हैं या क्रिकेट मैच अथवा सियासी बहस-मुबाहिसा सुनते हैं तो आप जानते हैं क्या होता है- हम सबका साला ज़हन चुद जाता है। आप में से जो लोग पंजाबी मिज़ाज के हैं और जो अपनी गालियों को संक्षेप में अनुनासिक अंदाज़ में देना चाहते हैं - जिन्हें ‘बैण ... ’कहना ज़्यादा पसंद है, वे लोग अब उतने ही मजे से ‘ज़ैण ... ’ कह सकते हैं। अब मैं अपनी दलील और अपने थके हुए ज़ेहन को राहत देना चाहता हूँ। मुझे उम्मीद है कि आगे से हामारी बातचीत कहीं ज़्यादा अभिव्यक्त होगी और हमारी ज़िन्दगी की नाक़ाबिले बयान चीज़ों को एक बार फिर आवाज़ मिल जाएगी।
साभारः चन्दन शर्मा

21.7.08

घर में मां-बहन नहीं है क्या

पेश है शुद्धब्रत सेनगुप्ता के लेख का पांचवा भाग. अब एक भाग और रहता है.
संभवत: शाम तक उसे भी पोस्ट कर दूंगा.
अब दिल्ली की बस में कोई आदमी किसी औरत को टटोलता है तो अक़सर एक ही जवाब आता है - ‘‘घर में माँ-बहन नहीं हैं क्या?’’ हालाँकि इस जवाब से कई बार औरत को वक़्ती राहत मिल जाती है लेकिन इस बात पर सोचना फिर भी ज़रूरी है कि क्या यहमाँ-बहन अवधारणाभी सार्वजनिक स्थान पर यौन-उत्पीड़न को बढ़ावा देने वाला एक अहम कारण नहीं है? यह तर्क़ कुछ इस तरह आगे बढ़ता हैः गुप्त प्रसंगों ने पहले ही तय कर दिया है कि माँ और बहन ( कि पिता और भाई) के भीतर सेक्स का कोई स्रोत नहीं होता, उनको एक स्वायत्त यौन इकाई माना ही नहीं जा सकता। यह एक स्वाभाविक और मानी हुई बात है कि माँ और बहन कभी सेक्स के बारे में बात नहीं करेंगी और ही उनसे सेक्स के बारे में कोई बात करेगा। यह सोच औरतों के साथ बनने वाले तमाम ताल्लुक़ात में एक दोहरी विकृति पैदा कर देती है।

अब दिल्ली की बस में कोई आदमी किसी औरत को टटोलता है तो अक़सर एक ही जवाब आता है - ‘‘घर में माँ-बहन

मेरे ख़याल में दिल्ली की औरतें यौन मुक्ति के दायरे को और फैलाने के लिए तभी दबाव डाल सकती हैं जब वह इस बात के लिए आवाज़ उठाएँ कि उन्हें हर दुराचारी पुरुष की सांकेतिक माँ या बहन न माना जाए। यानी ज़रूरत इस बात की है कि हर हरकरत की स्वतंत्र तौर पर पड़ताल की जाए और उसे गुप्त ज्ञान के रहस्यमयी नियमों के साथ जोड़कर न देखा जाए.

नहीं हैं क्या?’’ हालाँकि इस जवाब से कई बार औरत को वक़्ती राहत मिल जाती है लेकिन इस बात पर सोचना फिर भी ज़रूरी है कि क्या यह ‘माँ-बहन अवधारणा’ भी सार्वजनिक स्थान पर यौन-उत्पीड़न को बढ़ावा देने वाला एक अहम कारण नहीं है? यह तर्क़ कुछ इस तरह आगे बढ़ता हैः गुप्त प्रसंगों ने पहले ही तय कर दिया है कि माँ और बहन (न कि पिता और भाई) के भीतर सेक्स का कोई स्रोत नहीं होता, उनको एक स्वायत्त यौन इकाई माना ही नहीं जा सकता। यह एक स्वाभाविक और मानी हुई बात है कि माँ और बहन कभी सेक्स के बारे में बात नहीं करेंगी और न ही उनसे सेक्स के बारे में कोई बात करेगा। यह सोच औरतों के साथ बनने वाले तमाम ताल्लुक़ात में एक दोहरी विकृति पैदा कर देती है। पहली बात तो यह कि बाक़ी तमाम औरतों (अपनी माँ-बहन के अलावा) को बेइंतेहा यौन आकर्षण का स्वाभाविक निशाना मान लिया जाता है (आख़िर वे तो किसी और की माँ-बहन हैं न)। और दूसरी, क्योंकि उनके साथ किसी भी तरह की नज़दीकी लाज़िमी तौर पर गुप्त प्रसंग के दायरे में ही आती है (क्योंकि किसी औरत के साथ यौन संवाद की प्रत्यक्ष और खुली अभिव्यक्ति असंभव है), इसलिए चोर-उच्चके की तरह हाथ साफ़ करना ही मर्दों के लिए सबसे आसान विकल्प बन जाते हैं। बल्कि गुप्त प्रसंग का ही एक और नतीजा ये भी हो सकता है कि दाब-भींच की शिकार औरत ख़ुद ही इन हरकतों के प्रति एक अनजान की मुद्रा अपनाने लगे।
मेरे ख़याल में दिल्ली की औरतें यौन मुक्ति के दायरे को और फैलाने के लिए तभी दबाव डाल सकती हैं जब वह इस बात के लिए आवाज़ उठाएँ कि उन्हें हर दुराचारी पुरुष की सांकेतिक माँ या बहन न माना जाए। यानी ज़रूरत इस बात की है कि हर हरकरत की स्वतंत्र तौर पर पड़ताल की जाए और उसे गुप्त ज्ञान के रहस्यमयी नियमों के साथ जोड़कर न देखा जाए।
मर्द और औरत अपनी सेक्शुअलिटी का निषेध करके नहीं बल्कि उसका हक़ जताकर ही यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उनके बीच होने वाली हर मुठभेड़ और आदान-प्रदान को सेक्स की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि तब सेक्स दीगर इंसानी

अनुभवों की एक नई ज़बान तभी रची जा सकती है जब इंसानी ज़िस्म और जिस्मानी तजुर्बों के अवमूल्यन को चुनौती देने के लिए हम रोज़-ब-रोज़ की बोलचाल में कामोत्तेजक और खिलंदड़ई का सहारा लेंगे क्योंकि यह ज़बान ज़िस्म का अवमूल्यन नहीं करती। तब जाकर शायद वाणी दीवार पर लिखे अपने संदेश के ज़रिए सेक्स के अलावा और चीज़ों के बारे में सोचेने-विचारने व बात करने के लिए भी न्यौता दे पाएगी।

गतिविधियों की तरह सामान्य हो जाएगा जिनके बारे में खेल, राजनीति, पीने के पानी के इंतज़ाम और एक बेहतर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की तरह आसानी से बात की जा सकती है। अगर ऐसे दायरे गढ़े जाएँ जहाँ अज़नबी एक-दूसरे से मिल सकें और एक-दूसरे में दिलचस्पी का इज़हार कर सकें, अगर यह सुनिश्चित किया जा सके कि वयस्क उम्र की कोई भी महिला (न कि सिर्फ़ ऐसी महिलाएँ जो ज़ाहिरा तौर पर जवान और सम्पन्न दिखाई देती हैं) पुरुषों की तरह और उनसे आज़ाद रहते हुए सामाजिक जीवन जी सकती है, तो शहर के चेहरे पर पड़ा यह नक़ाब हट जाएगा। शहर की सड़कों पर हर किसी को आवाग्मन की सुरक्षित और सस्ती सुविधा उपलब्ध कराने के लिए सड़कों पर बेहतर रोशनी और एक सुविधाजनक परिवाहन व्यवस्था की माँग उठाकर ही सड़कों पर आनंद के नए दायरे रचे और ढूँढ़े जा सकते हैं। या, जैसा कि लेनिन ने कभी एलैक्ज़ेंद्रा कोलंताई से कहा था, मर्दों और औरतों के बीच यारी दोस्ती व सहवास के लायक़ मोहब्बत और जिस्मनी ताल्लुक़ात के नए नीतिशास्त्र का रास्ता लाज़िमी तौर पर ‘आवास के सवाल’ तक जाना चाहिए – आज आप शहर की किसी भी अकेली औरत (या मर्द) से पूछिए कि उसकी निज़ी यौन स्वायत्तता के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट क्या है तो पता चलेगा कि मक़ान मालिकों द्वारा थोपी गई शुचिता/ब्रह्मचर्य या बनावटी शादियों की समस्या उन चीज़ों की फ़ेहरिस्त में काफ़ी ऊपर आएगी, जिनका वे फ़ौरन हल चाहते हैं। अनुभवों की एक नई ज़बान तभी रची जा सकती है जब इंसानी ज़िस्म और जिस्मानी तजुर्बों के अवमूल्यन को चुनौती देने के लिए हम रोज़-ब-रोज़ की बोलचाल में कामोत्तेजक और खिलंदड़ई का सहारा लेंगे क्योंकि यह ज़बान ज़िस्म का अवमूल्यन नहीं करती। तब जाकर शायद वाणी दीवार पर लिखे अपने संदेश के ज़रिए सेक्स के अलावा और चीज़ों के बारे में सोचेने-विचारने व बात करने के लिए भी न्यौता दे पाएगी।

20.7.08

गुप्‍त प्रसंग खुले में ...


पेश है शुद्धब्रत सेनगुप्ता के लेख अकथ कथन अर्थात ज़ेहन के गुप्त रोग की चौथी किस्त. इस श्रृंखला के बीच 'मोहनदास' पर बहस आरंभ करने के लिए माफ़ी, पर वो भी ज़रूरी था. आगे ऐसे अवरोध होते रहेंगे.

ऐसी सूरत में ज़िस्म और उसके अहसासात के बारे में बातचीत करना मुश्किल होता चला जाता है। इसीलिए मुझे हैरत है

अगर सेक्शुअलिटी और शारीरिक अभिव्यक्ति की भाषा रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा होते और उन पर खुलकर बात हुआ करती तो लोगों के दिमाग़ में ऐसे अंधेरे कोने ढूँढ़ना मुश्किल हो जाता जहाँ यहाँ-वहाँ हाथ मारने के ये इरादे पैदा होते हैं। उस स्थिति में ‘कमज़ोरी’ और ‘ताक़त’ जैसे साधारण शब्दों के इर्द-गिर्द कोई एक अर्थपूर्ण यौन भाषा रचना मुश्किल हो जाता।

कि वाणी अपने ज़िस्म को आवाज़ देने के लिए इतनी हिम्मत कैसे जुटा लेती है। (अगर आप समकालीन हिन्दी पॉर्न पत्र-पत्रिकाओं, किताबों को पढ़ें तो उनमें शरीर के अंगों को आमतौर पर संस्कृतनिष्ठ भाषा में व्यक्त किया जाता है। इन शब्दों को देखकर मुझे फ़ौरन क़ामिल बुल्के की शरण लेनी पड़ती है और उससे भी काम नहीं चलता तो मैं मोनियर विलियम्स की पनाह में जाता हूँ) मैं सोचता हूँ कि क्या वाणी सचमुच वाणी है, क्या सुख की उसकी शरीरहीन अभिव्यक्ति कुछ आहों-कराहों, फुसफुसाहटों, ख़ामोशियों, सीत्कारों के दौरों और मुट्ठी भर डॉक्टरी प्रेस्क्रिप्शनों से आगे जा पाती होगी? अगर सेक्शुअलिटी ही वह पुल है जो ज़िस्म को ख़यालों से जोड़ता है (क्योंकि यौन संबंधी विचार आमतौर पर ज़िस्म के भीतर-बाहर जिस्मानी तौर पर ही व्यक्त होते हैं) तो जिस शब्दावली के ज़रिए हम अपने ज़िस्म के बारे में बात कर सकते हैं, उसका पतन हमारे काम-विषयक स्वत्व को भी भाषा के दायरे से बाहर कर देता है और हमारे ख़यालों को दरिद्रता की गर्त में जा पटकता है। मेर ख़याल में तो यह ख़ामोशी ही शायद सबसे बड़ा गुप्त रोग है। यौन अधूरेपन के हर अहसास और नपुंसक आक्रोश की हर अभिव्यक्ति की जड़ इसी में है। शरीर क्या महसूस कर रहा है, इस बात को ज़ाहिर कर पाने में नाक़ामी आपसी संवाद को पूरी तरह ध्वस्त कर कर सकती है। और ऐसी मुठभेड़ की हर मिसाल, जिसमें ग़ैर-रज़ामंद सेक्शुअलिटी के तत्व साफ़ दिखाई देते हैं, इसी ध्वंस का उदाहरण है और इन्ही पर ताक़त व वर्चस्व की वह नींव खड़ी होती है जो दूसरे के शरीर पर अपनी छाप छोड़ कर सुकून पाती है। जो संवाद सामान्य रूप से नहीं क़ायम हो सकता या आगे नहीं बढ़ सकता उसे आगे बढ़ाने के लिए ताक़त के अलावा संभवतः और कोई साधन नहीं बचता। शायद इसी कारण दिल्ली पुलिस के साहेबान (जो ‘हमारे लिए हमारे साथ, हमेशा’ रहते हैं) शहर के पार्कों या जंगल-झाड़ियों में हाथ लग जाने वाले समलैंगिक पुरुषों के साथ यौन संबंधों की इच्छा को रोक नहीं पाते। या संभवतः इसीलिए, जब कोई औरत ज़ोर-ज़बर्दस्ती या बलात्कार की शिकायत दर्ज़ कराने पुलिस के पास जाती है तो उसके सामने दोबारा उसी हादसे से गुज़रने की आशंका पैदा हो जाती है। बात ये नहीं है कि पुलिस वालों के हॉर्मोन्स की मिक़दार या बनावट कुछ बेहतर होती है, मामला महज़ इतना है कि ये ऐसे मौक़े होते हैं जब गुप्त प्रसंग खुले में आ जाने की दहलीज़ पर खड़े होते हैं और दमन की बुनियाद पर खड़े माहौल में उनसे निपटने का एकमात्र रास्ता यही बचता है कि हिंसा की एक ख़ुराक दे दी जाए।
अगर कुछ देर के लिए सेक्स की जगह भोजन को रख दिया जाए तो इस परिस्थिति का बेतुकापन स्पष्ट हो जाएगा। माल लीजिए कि भोजन और ख़ाना ख़ाने की क्रिया, ये सब गुप्त प्रसंगों के दायरे में आते हैं। ऐसी सूरत में मिल-बाँटकर खाना ख़तरनाक साबित हो सकता है। तब खाना खुले में नहीं दिखाई देगा और भूख की सार्वजनिक अभिव्यक्ति को बेहद उत्तेजक व्यवहार की श्रेणी में रखा जाएगा। ऐसे हालात में दुष्ट तत्व घर के दरवाज़े तोड़कर खाने पर टूट पड़ेंगे या फिर अपने खाने की सार्वजनिक तौर पर नुमाइश लगाएँगे। ऐसे में भोजन का निषेध या किसी को ज़बरन खाना खिलाना दूसरों की देह पर अपनी ताक़त आज़माने का ज़रिया बन जाएगा। पेटुओं की तरह खाना और अखाद्य पदार्थों से खिलवाड़ कैसी थकेली तृप्ति देगा, हम समझ सकते हैं।
दिल्ली की बसों में दस्तदराज़ी करने वाले लफ़ंगे या रात में अकेले पैदल जा रही औरत का क्वालिस में बैठ पीछा करने वाले इसी गुप्त रोग के लक्षणों से पैदा मौक़ों का फ़यदा उठाते हैं। अगर सेक्शुअलिटी और शारीरिक अभिव्यक्ति की भाषा रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा होते और उन पर खुलकर बात हुआ करती तो लोगों के दिमाग़ में ऐसे अंधेरे कोने ढूँढ़ना मुश्किल हो जाता जहाँ यहाँ-वहाँ हाथ मारने के ये इरादे पैदा होते हैं। उस स्थिति में ‘कमज़ोरी’ और ‘ताक़त’ जैसे साधारण शब्दों के इर्द-गिर्द कोई एक अर्थपूर्ण यौन भाषा रचना मुश्किल हो जाता। दूसरों पर हावी होने के लिए उनकी सेक्शुअलिटी पर सोचा-समझा हमला बोलने की क्रिया भी सत्ता व अतिक्रमण के प्रदर्शन के लिए कामुक उत्तेजना के तत्वों से वंचित होती।

18.7.08

अगर मैं झूट बोल्लई होऊँ तो इत्ती की इत्ती मर जाऊँ

पेश है अकथ कथन अर्थात ज़ेहन के गुप्‍त रोग की अगली खेप. शायद अब भी पाठक शुद्धा के इस महत्त्वपूर्ण लेख पर गुप्‍त चर्चा ही कर रहे हैं. बहराल अभी कुछ किस्तें और आएंगी अगले दो-तीन दिनों में.

गुप्त रोग मायूसी की एक अवस्था का लक्षण है। इन रोगों से ये भी पता चलता है कि हमारे शहर की ज़िन्दगी में सेक्शुअलिटी की क्या जगह है।

गुप्त ज्ञान हमारी भाषा परहावी हो चुका है। दिल्ली काऔसत मर्द स्त्री या पुरुष केगुप्त अंगों की चर्चा किए बिनाया पारिवारिक सेक्स के दैवीऔर वर्जित विशेषाधिकार काआवाहन किए बग़ैर कोईसार्थक जुमला मुकम्मल नहींकर पाता। नतीजा, हरबातचीत के इर्द-गिर्दगुप्तशब्दोंका एक काला बवंडर छा जाता है। इन लफ़्जों परकोई ध्यान नहीं देता और ख़ुदबोलने वाले भी इस बात सेअनजान रहते है कि वह क्याबोल रहे हैं। मानो सेक्स सेजुड़े शब्द, जैसे शिश्न/लंड यायोनि/चूत को बयान करनेवाले शब्द दिन--दिन केसोच-व्यवहार और बातचीतके वॉलपेपर हों।

सेक्स का ख़याल भी इतना परेशान करने वाला माना जाता है कि आप उसके बारे में सीधे-सीधे बात नहीं कर सकते। उसके साथ किसी ऐसे विशेषण का होना ज़रूरी है जिससे इस बारे में कोई शुबहा बाक़ी न रह जाए कि इस बारे में किस क़दर लुक-छिप कर बात करना ज़रूरी है। यानी जब आप ‘सेक्स’ कहना चाहें तो उसके आगे-पीछे कहीं ‘गुप्त’ या ऐसा ही कोई शब्द ज़रूर जोड़े। कहने का मतलब ये है कि सेक्स के मुताल्लिक़ कोई भी चीज़ लाज़िमी तौर पर गुप्त होनी चाहिएः गुप्तांग, गुप्त ज्ञान, गुप्त आनंद वग़ैरह। इसका एक मतलब यह भी है कि स्वाभाविक दायरे से बेदख़ल कर दिए जाने पर गुप्त प्रसंग संक्रामक हद तक सर्वव्यापी हो जाते हैं। सड़क के कोनों पर लगे रंग-बिरंगे पर्चों की तरह ये क़िस्से भी हर कहीं मंडराने लगते हैं, बग़ल से गुज़रने वाले मुसाफ़िरों पर झपटने के लिए हर वक़्त तैयार जैसे चौक-चौराहे पर अपनी देह की नुमाइश करने के शौक़ीन लोग।

गुप्त ज्ञान हमारी भाषा पर हावी हो चुका है। दिल्ली का औसत मर्द स्त्री या पुरुष के गुप्त अंगों की चर्चा किए बिना या पारिवारिक सेक्स के दैवी और वर्जित विशेषाधिकार का आवाहन किए बग़ैर कोई सार्थक जुमला मुकम्मल नहीं कर पाता। नतीजा, हर बातचीत के इर्द-गिर्द ‘गुप्त शब्दों’ का एक काला बवंडर छा जाता है। इन लफ़्जों पर कोई ध्यान नहीं देता और ख़ुद बोलने वाले भी इस बात से अनजान रहते है कि वह क्या बोल रहे हैं। मानो सेक्स से जुड़े शब्द, जैसे शिश्न/लंड या योनि/चूत को बयान करने वाले शब्द दिन--दिन के सोच-व्यवहार और बातचीत के वॉलपेपर हों। इसके बावज़ूद जब संजीदगी के साथ शरीर के अलग-अलग हिस्सों का नाम लेने की बारी आती है तो एक अटपटी-सी शर्मिंदगी छा जाती है। मिसाल के तौर पर, टट्टों की बात चलने पर कुछ ऐसा भाव पैदा होता है मानो अंडकोष सिर्फ़ छोटी-छोटी गोलियाँ हों। जैसे कि अंडकोष की गोलियाँ शून्य हों - स्क्रैबल की ख़ाली जगहों की तरह अपने आप में अर्थहीन - अपने आप को छोड़कर हर दूसरी चीज़ की संज्ञा बन जाते हैं।

इस मुक़ाम पर मैं दिल्ली में भाषा के विकासक्रम के बारे में बात करना चाहता हूँ। क्या दिल्ली, हमारा ये शहर, हमेशा से मादरचोद-बहनचोद शहर रहा है या आम चीज़ों के बारे में बात करने के लिए हमारे पास कोई और अभिव्यक्तियाँ भी थी? किसी भी ज़बान में निहित अभिव्यक्तियों की संभावनाओं का का एक पैमाना ये है कि वह भाषा किसी को कोसने के लिए कितने मुमकिन तरीक़े मुहैया करा पाती है। या फिर यह देखा जाए कि घटिया भाषा के रूप में परिभाषित करने के लिए जिस कवच का सहारा लिया गया है वह कितना मोटा है। मेरे ख़याल से अब मैं अपनी बात को थोड़ा और साफ़ तौर पर कह सकता हूँ। मेरा कहना ये है कि शहर की आम भाषा से कथित घटिया भाषा या नीची ज़बान को अलग करने की कोई ज़रूरत नहीं है। बल्कि मैं तो इस बात को लेकर अपनी शिक़ायत दर्ज़ कराना चाहता हूँ कि ये अभिव्यक्तियाँ हमारी महिला रिश्तेदारों (माँ या बहन) के साथ इस मुक़ाम पर मैं दिल्ली में भाषा के विकासक्रम के बारे में बात करना चाहता हूँ। क्या दिल्ली, हमारा ये शहर, हमेशा से मादरचोद-बहनचोद शहर रहा है या आम चीज़ों के बारे में बात करने के लिए हमारे पास कोई और अभिव्यक्तियाँ भी थी? किसी भी ज़बान में निहित अभिव्यक्तियों की संभावनाओं का का एक पैमाना ये है कि वह भाषा किसी को कोसने के लिए कितने मुमकिन तरीक़े मुहैया करा पाती है। या फिर यह देखा जाए कि घटिया भाषा के रूप में परिभाषित करने के लिए जिस कवच का सहारा लिया गया है वह कितना मोटा है।
अपमानजनक यौन संबंधों तक सीमित होकर रह गई है। यानी हमारे पास इन बातों का भण्डार ख़त्म होता जा रहा है और ये अभिव्यक्तियाँ दो ख़ास दायरों तक सीमित होती जा रही है। इसके साथ मैं ये भी अर्ज़ करना चाहता हूँ कि यह तरीक़ा रूखी भाषा के दायरे को मर्दाना और आमतौर पर मीसोगाइनिस्ट तर्ज़ेबयाँ का औज़ार बना देता है। मुझे भाषा में मिसॉजिनी
(औरतों से घृणा) से कोई ऐतराज़ नहीं है बशर्ते मर्दों के ख़िलाफ़ औरतों की अभिव्यक्ति के रास्ते भी उपलब्ध हों।

अगर आपकी इजाज़त हो तो अब मैं 1961 में हाईडलबर्ग विश्वविद्यालय के साउथ एशिया इंस्टीट्यूट द्वारा शाया एक बेहद दिलचस्प मोनोग्राफ़ के कुछ अंश आपके सामने रखना चाहता हूँ। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज में हिन्दी के प्रोफ़ेसर और भाषा विज्ञान के जाने-माने विद्वान रह चुके हैं। इस मोनोग्राफ़ से मैं ऐसी गालियों का एक छोटा-सा कैटलॉग पेश करना चहाता हूँ जो वक़्त की मार और भाषा की सिकुड़न झेलते-झेलते अब ख़त्म हो चुकी है। इसके ज़रिए मैं नाक़ाबिले बयान चीज़ों के बारे में भाषायी सहनशीलता, बर्दाश्त और संभावनाओं की लुप्त होती परंपरा की तरफ़ संकेत करना चाहता हूँ इसलिए थोड़ा सा धैर्य और रखें।

तुम रहती दुनिया तक जीओ।

दूल्हा के बाबा को पोते-पड़ौते खिलाने नसीब हों।

जवानी की क़सम।

अगर मैं झूट बोल्लई होऊँ तो इत्ती की इत्ती मर जाऊँ

अपने लगमातरों से मिलने गई थी क्या?

अपने घग्गड़ के पास थी क्या?

इस मुए की पड़ौस पै झाडू फिरे।

जवान लाश लौटे

सांडबिजार, साँप के सँपोलिए

छिनाल, हरामज़ादी हैज़े पीटी, हर्राफ़ा, लुच्ची नपूती, साली, भेनचो, सुअरख़नी,

तूझे चार घड़ी का हैज़ा हो।


द डायलेक्ट्स ऑफ़ डेल्ही, पृष्ठ 44-47.


यह एक बड़ी बदक़िस्मती की बात है कि दूसरी परिपक्व और परिष्कृत भाषाओं के विपरीत हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी के विद्वानी ने गंदी या यौन केन्द्रित भाषा का पर्याप्त इकट्ठा नहीं किया है। मैंने अभय दुबे साहब, प्रोफ़ेसर शाहिद अमीन, और रविकान्त व अन्य विद्वान साथियों (और मेरा ख़याल है कि इस फ़ेहरिस्त में मुझे डॉ. आलोक राय का नाम भी शामिल कर लेना चाहिए) से ये पता लगाने की कोशिश की है कि क्या हिन्दी में भी ज़बान पर संजीदगी के साथ विचार किया गया है। अभय जी जैसे कुछ साथियों ने किसी मशहूर लेखक द्वारा लिखे गए एक अप्रकाशित मोनोग्राफ़ का ज़िक्र किया है जिसे धक्के मार-मार कर सार्वजनिक परिक्षेत्र से बाहर निकाल दिया गया। प्रोफ़ेसर अमीन जैसे कुछ अन्य लोगों ने बताया कि शब्दकोश और निघंटुओं की रचना ज्ञानोदय काल की देन रही है और गाली-गलौज़ का ज़िक्र ला कर असल में हम ज्ञानोदय से पहले की एक सामाजिक मौखिक संस्कृति की बात कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि नागरी प्रचारिणी सभा तो ज्ञानोदय काल के बाद की और बाक़ायदा आधुनिक चीज़ रही है और उसने इस सिलसिले में कुछ न कुछ काम ज़रूर किया होगा। रविकांत ने मुझे बताया कि फ़ादर एस.डब्लू. फ़ैलन की हिन्दुस्तानी डिक्शनरी में ऐसी चीज़ों का एक भारी ख़ज़ाना मिलता है। देखने पर पता चला कि उनकी बात वाक़ई काफ़ी हद तक सही थी। यह निघंटु अपने आप में निश्चय ही एक शानदार चीज़ है मगर मेरी राय में यह वक़्त की रफ़्तार में पीछे छूट गया है। सटीकता और सामयिकता की ऐतिहासिक कसौटियों की दृष्टि से देखें तो हमारे यहाँ आमफ़हम ‘सड़कछाप’ भाषा का ऐसा कोई कोश नहीं, जो रेख़्ती की नाज़ुक सरगोषियों से लेकर शहरी नीची ज़बान की धूमधड़ाका पंजाबी या बंबईया गालियों तक को अपने अंक में भर सके। क्योंकि मानक हिन्दी उर्दू कोशों में तो अपवाद के तौर पर नामवाची शब्दों को छोड़कर सम्पूर्ण शरीर के साथ न्याय कर सकने वाले तमाम लफ़्जों को नियमित तौर पर देश निकाला दिया जाता रहा है। आधुनिक भारतीय भाषा व साहित्य में सेंसर की पैठ इतनी गहरी है कि इससे भाषायी दरिद्रता की विंडबनात्मक स्थिति बन जाती है - जिन अश्लीलताओं का उपयोग नहीं होना चाहिए उनका अतिशय उपयोग होता है और दीगर क़िस्म के वाक्ररूपों की घनघोर उपेक्षा होती है। नतीजतन, एक तरफ़ तो मादरचोद-बहनचोद जैसी मुट्ठी भर गालियाँ चारों तरफ़ फैल जाती हैं और दूसरे सिरे पर कई बातों को कहने के लिए लोगों को क़ायदे के शब्द भी नहीं मिल पाते। मिसाल के तौर पर, अगर कोई हिन्दी भाषी महिला किसी डॉक्टर से बात करती है, ख़ासतौर से स्त्री रोग विशेषज्ञ से बात करती है तो उसे अपनी समस्या के बारे में बताते हुए बहुत दिक़्क़त महसूस होती है। इसीलिए हिन्दी साहित्य की ‘काम-विषयक’ अभिव्यक्तियों पर संस्कृत की कोई जमी रहती है। इशारों, द्विअर्थी अभिव्यक्तियों और दुलार-मनुहार के मामले में उर्दू का दामन फिर भी ज़्यादा भरा दिखाई देता है। सआदत हसन मंटो और इस्मत चुग़ताई जैसे कहानीकारों या नून मीम राशिद जैसे शायरों ने काम की बातों को अभिव्यक्त करने के रचनात्मक तरीक़े ईज़ाद किए थे लेकिन, इसमें भी कोई शक़ नहीं कि समकालीन उर्दू अदबीयत यौन विवरण के पूरी तरह ख़िलाफ़ है। अली सरदार जाफ़री ने दीवान--मीर से सारे काम विषयक अशआर छाँट-छाँट कर बाहर निकाल दिए और पूरे अदबी दायरे में कहीं ज़रा सी फुसफुसाहट भी सुनाई नहीं दी। उर्दू और हिन्दुस्तानी के साहित्य भंडार के इस परिशोधन से होता यह है कि जिस्म, सेक्शुअलिटी और ऐसी हर चीज़ के इर्द-गिर्द ख़ामोशी का एक ब्लैकहोल पैदा हो जाता है जिसे ‘नाक़ाबिले बयान’ माना जाता है।

16.7.08

सेहत, स्फूर्ति और जोश का पूरा ख़जाना

पेश है शुद्धब्रत सेनगुप्‍ता के लेख अ‍कथ कथन अर्थात ज़ेहन के गुप्‍त रोग की अगली खेप.पिछली खेप के बाद कल देर रात तक पाठकों के फ़ोन आते रहे. ज़्यादातर लोगों का कहना था कि लेख तो बढिया है पर शीर्षक भ्रामक है. मित्रों अच्छा लगा कि आपने फ़ोन किया, पर इस गंभीर मसले पर बातचीत शुरू हो पाती अगर आप लगे हाथ अपनी प्रतिक्रिया यहीं देते. तो आईए बढ़ते हैं अगली कड़ी की ओर.


‘‘ख़ुशहाल वैवाहिक जीवनः गुप्त रोग से छुटकारे के लिए ख़ुद आकर मिलें या निज़ी तौर पर ख़त लिखें’’ - इन शब्दों से उसके प्रोग्राम का पता चलता था। एक आम सात साल के लड़के की तरह कुछ समय के लिए मुझे इस बात का पूरा यक़ीन होने लगा था कि बदक़िस्मती से फख़रूद्दीन अली अहमद नहीं बल्कि यही आदमी भारत का राष्ट्रपति है, मेरे आसपास की दुनिया का सबसे बुलंद शख़्स।

‘सेक्स’ - ज़िन्दगी में पहली बार यह शब्द मैंने एक विशालकाय इश्तहार पर पढ़ा था। उस वक़्त मेरी उम्र सात साल रही होगी। मेरे स्कूल जाने के रास्ते में सड़क किनारे एक बड़ा सा इश्तहार लगा हुआ था जिस पर एक निहायत अहम से दिखने वाले शख़्स की तस्वीर बनी थी। उसकी लंबी ऐंठदार बेहद नुकीली मूँछें थी। उसने एक सूट और टाई पहनी हुई थी। होठों को देख कर तो ऐसा लगता था मानो उसने लिपस्टिक भी लगा रखी हो। उस तस्वीर की सबसे दिलचस्प बात उस आदमी की पगड़ी थी जो क़रीब-क़रीब उसके चेहरे जितनी ही बड़ी थी और पठानी शैली में सिर पर मुड़े हुए पंखे की तरह बंधी थी। ये ख़ानदानी शफ़ाख़ना वाले हक़ीम हरकिशन लाल (‘‘हमारी कोई ब्रांच नहीं’’, ‘‘हक़ीम जी की नक़ली तस्वीरों के झाँसे में न आएँ’’ वाले हक़ीम साहब) की तस्वीर थी।
और क्या तस्वीर थी! उसका क़द पाँच फुट भी नहीं रहा होगा मगर फिर भी मेरे लड़कपन में दिल्ली के आसमान पर उसी का राज था। रूरीटेराई तानाशाहों की तरह उसकी तस्वीर मुझे मानो शहर के हर चौराहे पर लटकी दिखाई देती थी। ‘‘विश्व प्रसिद्ध सेक्स स्पेशलिस्ट’’ - ये शब्द उसके मिशन का बयान करते थे और ‘‘ख़ुशहाल वैवाहिक जीवनः गुप्त रोग से छुटकारे के लिए ख़ुद आकर मिलें या निज़ी तौर पर ख़त लिखें’’ - इन शब्दों से उसके प्रोग्राम का पता चलता था। एक आम सात साल के लड़के की तरह कुछ समय के लिए मुझे इस बात का पूरा यक़ीन होने लगा था कि बदक़िस्मती से फख़रूद्दीन अली अहमद नहीं बल्कि यही आदमी भारत का राष्ट्रपति है, मेरे आसपास की दुनिया का सबसे बुलंद शख़्स।
अफ़सोस अब हक़ीम जी हमारे बीच नहीं रहे। मगर अब शहर के ज़्यादातर चौराहों पर उनके जैसे सेक्स विशेषज्ञों की एक लंबी-चौड़ी गारद ने उनकी जगह ले ली है। इन सबके इश्तहारों पर मूँछों से लैस या सफ़ाचट, मगर लाज़िमी तौर पर सूट-बूट में सजा एक गबरू आदमी ज़रूर दिखाई देता है। इन इश्ताहरों को देखकर ऐसा लगता है कि आपातकाल के दिनों में चलाए गए नसबन्दी अभियान के दौरान दिल्ली के मर्दों में नामर्दी का जो ख़ौफ़ पैदा हुआ था, उसने हमारे शहर की दीवारों पर एक अमिट निशान छोड़ दिया है।
इन हकीमजियों के पास नामर्दी, संतान प्राप्ति में दिक़्क़त और शुक्राणुओं की कमी (निल शुक्राणु) के जादुई व फ़ौरी असर करने वाले इलाज मौज़ूद हैं। उनके पास ‘‘सेहत, स्फूर्ति और जोश’’ का पूरा ख़जाना है।
अख़बारी इश्ताहारों और सार्वजनिक पेशाबघरों की शोभा बढ़ाने वाले स्टिकरों से उनके चेहरे हैं। शौचालयों की दीवारों पर उन्हें इतनी ऊँचाई पर लगाया जाता है जहाँ से वह सीधे हमारी नज़र के दायरे में आ जाते हैं। उनके इर्द-गिर्द कुछ जिस्मानी

‘‘क्या आप अपने सामान के आकार से चिंतित हैं? क्या आपको कमज़ोरी की वजह से बार-बार शर्मिंदगी होती है? क्या आप शर्तिया लड़का पैदा करना चाहते है? वैवाहिक जीवन का आनंद लेना चाहते हैं? क्या स्वप्नदोष ने आपकी नींद हराम कर रखी है? क्या आपको गैस, मोटापा, भगंदर या बवासीर की शिकायत है? हमारे यहाँ इन गुप्त रोगों की तमाम गुप्त परेशानियों को पूरी तरह गुप्त तौर पर हल किया जाता है।’’

हिस्सों की शौक़िया चित्रकारी भी दिखाई देती है जो गुफ़ाओं में की जाने वाली चित्रकारी की ख़त्म हो चुकी प्राचीन विधा का एकमात्र समकालीन अवशेष मालूम पड़ती है। तस्वीरों का मक़सद ऐकांतिक चिन्तन की प्रेरणा देना है।
गुफ़ाचित्रों की तर्ज़ पर बनाए गए ये चित्र भी हमारी कल्पनाओं के साथ मिल कर एक जादुई असर पैदा करते हैं। इन चित्रों के कलाकारों को संभोगरत जोड़ों की अर्द्ध-यथार्थवादी तस्वीरें बनाने में ख़ासा मज़ा आता है। मगर आमतौर पर इन चित्रों के रचनाकार वृत, त्रिकोण, शंकु और अंडाकार ज्यामितीय रूपकों से ही काम चला लेते हैं। वैसे भी, इंसानी ज़िस्म के बहुत सारे अंगों को जब वह इन्हीं बिम्बों के सहारे अभिव्यक्‍त कर सकते हैं तो और ज़्यादा दक्षता की उन्हें ज़रूरत ही क्या है। ये चित्रकार अपने चित्र के ऊपर दो-चार लाईन की कविता भी पेल देते हैं जिससे पता चलता है कि वह आदमी क्या चाहता है (जी हाँ, फ़ोन बूथ के पास बने संदेशों के लेखकों के विपरीत इन चित्रों का चित्रकार कोई मर्द ही होता है), वह कहाँ क़ामयाब रहा है और कहाँ नाक़ामयाब हुआ है। इन कविताओं में मेरी पसन्दीदा कविता वह है जो मैंने लाजपत नगर की एक सार्वजनिक मूतरी में देखी थी। कविता कुछ इस तरह थीः
चूतिया चोदा चौदह साल, आशिक़ दीवाना बेमिसाल गुप्त रोग का रोगी रोया, दिल्ली के सब कुछ खोया।।
‘गुप्त रोगों’ के शहीदों को दी गई इस श्रद्धाजंलि से पता चलता है कि शहीद का कामुक करतबों से भरा जीवन बड़े त्रासद ढंग से ख़त्म हुआ था। संभव है कि जहाँ यह कविता थी वहाँ उसे परोपकार की भावना से किसी ने ‘जनहित में’ चिपकाया हो। इसके बग़ल में ही एक स्टिकर लगा हुआ है जिस पर गुप्त रोगों का जादुई इलाज करने वाले डॉ. रोशन का विज्ञापन छपा है। बुधवार और शुक्रवार को घंटाघर के पास अपने मरीजों का इलाज करने वाले डॉ. रोशन का यह विज्ञापन गागर में सागर से कम नहीं है।‘‘क्या आप अपने सामान के आकार से चिंतित हैं? क्या आपको कमज़ोरी की वजह से बार-बार शर्मिंदगी होती है? क्या आप शर्तिया लड़का पैदा करना चाहते है? वैवाहिक जीवन का आनंद लेना चाहते हैं? क्या स्वप्नदोष ने आपकी नींद हराम कर रखी है? क्या आपको गैस, मोटापा, भगंदर या बवासीर की शिकायत है? हमारे यहाँ इन गुप्त रोगों की तमाम गुप्त परेशानियों को पूरी तरह गुप्त तौर पर हल किया जाता है।’’
पढ़ने वाले को एक बार फिर आगाह किया जाता है कि वह ख़ुफ़िया तौर पर ही हक़ीम जी को ख़त लिखे या ख़ुद आकर मिलें ताकि उसकी समस्या पर ‘‘ख़ास तवज्ज़ो दी जा सके।’’
क्रमश:

14.7.08

अकथ कथन अर्थात ज़ेहन के गुप्त रोग

जाने-माने मीडिया विशेषज्ञ, कलाकार, फिल्‍म निर्माता, पत्रकार व लेखक तथा सराय और रक्स मीडिया कलेक्टिव के संस्थापकों में से एक शुद्धब्रत सेनगुप्ता फिलहाल सराय मीडिया लैब में इंटर-मीडिया एवं डिजिटल कल्चर पर शोध कर रहे हैं. हफ़्तावार के पाठकों के लिए पेश है दीवन-ए-सराय 02: शहरनामा में प्रकाशित शुद्धब्रत सेनगुप्ता के लेख अकथ कथन अर्थात ज़ेहन के गुप्त रोग की पहली किस्त. जल्दी ही शेष किस्तें भी पाठकों के लिए उपलब्ध होंगी. इसके लिए लेखक, अनुवाद, संपादक द्वय एवं प्रकाशक एवं विशेष सहयोगी चन्‍दन शर्मा का आभार. चाहें तो आप shudha@sarai.net पर लिख कर सीधे लेखक तक अपनी राय भेज सकते हैं.

‘‘एक रोज़ शायद ... लोग ये सवाल पूछेंगे कि अपनी सबसे पुरशोर कारस्तानियों पर
छयी चुप्पी को बनाए रखने पर हम इतने आमादा क्यों हैं।’’
मिशेल फूको, द हिस्ट्री ऑफ़ सेक्शुऑलिटी, खंड I

कनॉट प्लेस के आउटर सर्कल के गलियारे में बने मोड़ के पास एक छोटा सा कोना। इसी कोने की फुटपाथ पर एक आदमी पॉर्न साहित्य बेच रहा है। पास ही में एक लड़का दिल की शक़्ल वाले रजतरंगी गुब्बारे बेच रहा है। दोनों के पीछे की दीवार पर मीरा नायर की कामसूत्र का एक बदरंग हो गया पोस्टर लगा हुआ है। पोस्टर के पास ही सिक्के से चलने वाला एक फ़ोन है जो अब चलता नहीं है। जल्दबाज़ी में ही सही लेकिन बहुत सारे लोगों ने उस दीवार पर अपने-अपने दिल की बात कह डाली है। इस ग़रज़ से कि किसी की लापरवाह नज़र से वह चूक न जाएँ, तक़रीबन सभी ने अपने संदेशों के कुछ ख़ास हिस्सों को पूरी एहितयात के साथ रेखांकित भी कर दिया है। इन पैग़ामों में लोगों ने अपने नाम और फ़ोन नंबर दिए हैं और पढ़ने वालों को बात करने का खुला न्यौता भी। ज़्यादातर लोगों ने रात के एक ख़ास वक़्फ़े में बात करने की इच्छा ज़ाहिर की है।
वाणी थक कर चूर हो जाने की हद तक सेक्स के बारे में बात करने को तैयार है बशर्ते बात करने वाला शख्स 18 से 25 साल के बीच हो. मनोज को ऐसे मर्दों से बात करने में दिलच्स्पी है जो मर्दों से बात करने में दिलचस्पी रखते हैं। अनीता सिर्फ़ एसएमएस के ज़रिए ताल्लुक क़ायम करना चाहती है। वह अपने फ़ोन पर नहीं बल्कि एक पेजर पर एसएमएस मंगवा रही है। उसका वादा है कि अगर उसे आपका संदेश अच्छा लगा तो वह भी यक़ीनन जवाबी एसएमएस भेजेगी।
इन लघुकथाओं के लेखक कौन है? आउटर सर्कल की एक पपड़ाई सी दीवार के पास कुछ लम्हा ठहरने वाले ये लोग मच्छरों से कुश्ती लड़कर अजनबियों को अपने जिस्मानी अहसासात के बारे में बताते हुए पूरी रात जागकर क्यों गुज़ार देना चाहते हैं? इसमें लेन-देन या पैसे का कोई चक्कर नहीं है। ये वैसे दिलकश इश्तहारी बोर्ड नहीं जिनके ज़रिए आपको एंटीगुआ के किसी नंबर पर बात करने की दावत दी जाती है और, किसी कोने में आहिस्ते से ये जानकारी भी दे दी जाती है कि आपकी कॉल पर आईएसडी दरें लागू होंगी। ये इश्तहार आपको लाइव चैट की दावत देते हैं। पर ये चैट न तो जीवंत होती है और न ही चटपटी। ऊपर हमने जिन पैग़ामों का ज़िक्र किया है उनको लिखने वाले लोग एस्कॉर्ट कारोबार या मसाज-मालिश के धंधे में लगे ख़वातीनो-हज़रात भी नहीं हैं जो अपने ऑनलाईन इश्तहार और रेट कार्डों के ज़रिए मुक़म्मल ज़ेहनी और जिस्मानी संतुष्टि का यक़ीन दिलाते हैं। शायद यह स्कूली बच्चों की शरारत हो। अगर ऐसा है भी तो उनके ये संदेश अतीत की यादगार के तौर पर अगले मौसम की पुताई तक इस दीवार पर बने रहेंगे - एक बड़े, उदास शहर में वाबस्तगी की गुज़ारिशों की तरह। जिन्होंने इन दीवारों पर ये पैग़ाम लिखे हैं, उसके बारे में क्या कहा जाए? ये लोग ऐसी कौन सी बेजान हवा में साँस लेते हैं कि उन्होंने ज़िन्दगी से मुँह मोड़ शाँति और सुकून के लिए इस दीवार और टेलीफ़ोन का सहारा ले लिया और इस बचे-खुचे आनंद में ही ज़िन्दगी का समूचापन ढूँढ़ने लगे हैं।
इस कराहती दीवार को मैने अपनी एक ख़ास तलाश के दौरान देखा था। उस वक़्त मैं दिल्ली में प्यार, वासना और चाहत के निशान खोज़ रहा था। मैं शहर की सड़कों और उसे जोड़े रखने वाले छोटे चौराहों पर चाहत, इज़ाहर व इक़रार की कहानियों और नृत्य-कथाओं को पढ़ना चाहता था। अब तक की दिल्लियों, यानी रसख़ान की दिल्ली, मीर और ग़ालिब की दिल्ली इन सबके भीतर रहा-बाट की बोल-चाल में काम-कला की साज-सज़ावट ख़ूब दिखाई देती है। दिल्ली की इन पुरानी शक़्लों ने मेरी सोच और चेतना पर एक गहरी परछाई छोड़ी है। अब मैं यही देखना चाहता था कि आज के दौर की तेज़ रोशनी में ये परछाईं कितनी टिक पाती है। मैं प्राचीन और आधुनिक दिल्ली की कामेच्छा का नक़्शा बनाना चाहता था। और इस काम के लिए ज़रूरी कुछ उपयोगी किंवदंतियाँ, सबूत और ऐसी ही कुछ दूसरी चीज़ें जुटानी चाहता था। मैं बस अड्डों, मक़बरों, सिनेमाघर की बालकनी में लगी सीटों, कॉफ़ी हाउसों में कोने पर रखी टेबलों की तरफ़ ग़ौर से देखने की ज़ुरूरत या गुंजाइश को दर्ज़ करना चाहता था। मैं चाहता था कि सार्वजनिक पार्कों के झाड़-झंखाड़ और शौचालयों से ख़ुद इन स्थानों को जो कामोद्दीपक हैसियत मिलती है, उसको जाना-बूझा जाए। शुरुआत में मैं बहुत दूर तक नहीं जा पाया। किसी बदतमीज़ वीडियो गेम के पहले ही दौर में ख़राब चाल चल कर लड़खड़ा जाने के नतीज़ों की तरह, आड़ी-टेढ़ी लिखावटों वाली यह दीवार मेरे रास्ते में आकर खड़ी हो गई। अपनी ख़ास भाषा या अल्फ़ाज़ा के कारण, या उनकी कमी से एक ख़ास हैसियत अख़्तियार कर चुकी इस दीवार, इस रुकावट ने मुझे मेरी खोज़ पर आगे बढ़ने से रोक दिया। अपनी खोज़ के लिए मुझे इस दीवार से आगे जाना ज़रूरी था और इसी कोशिश में मैं वहाँ जा पहुँचा जिसका ज़िक्र में करने जा रहा हूँ।
मैंने वाणी को फ़ोन घुमा दिया। रात के ग्यारह बज चुके थे। मैंने उससे जानना चाहा कि क्या मैं उसी वाणी से बात कर रहा हूँ जिसने कनॉट प्लेस के आउटर सर्कल में एक दीवार पर अपना फ़ोन नंबर लिख छोड़ा था।
‘‘यहाँ कोई वाणी नहीं रहती’’, एक थकी हुई सी आवाज़ आई। आवाज़ से लगता था कि वह किसी औरत की है और उसकी उम्र पच्चीस से सैंतीस साल के बीच होगी। ऐसा लगा कि आवज़ तो वाणी की है लेकिन जैसे वह अपने नाम की पहचान से भाग रही है।
मैं लगा रहता हूँ। अपनी इच्छा बताते हुए मैं उसे इस बात का भरोसा दिलाता हूँ कि मैंने होश गँवा देने की हद तक सेक्स के बारे में बात करने के लिए फ़ोन नहीं किया है, बल्कि मैं तो इस बारे में बात करना चाहता हूँ कि लोग दीवारों पर इस तरह के संदेश क्यों छोड़तें हैं। मैंने उससे कहा कि अब भी अगर वह चाहे तो फ़ोन काट सकती है। उसने फ़ोन नहीं काटा। अब उसने मुझसे एक सीधा सवाल किया - क्या मैं जेबोनेयर या फैंटेसी के लिए क़िस्से-कहानियाँ ढूँढ़ रहा हूँ। मैंने कहा कि मैं लिखता तो हूँ मगर मैं पत्रकार नहीं हूँ और अब तक डेबोनेयर या फैंटेसी में छपने का सौभाग्य नहीं मिला है। फिर पूछता हूँ कि क्या वह अब भी बात करने को तैयार है।
‘‘सेक्स’’, वह कुछ इस तरह बोलती है मानो बतियाने का मुद्दा खोल रही हो। कहा ‘‘अगर हम सेक्स के बारे में बात नहीं कर सकते तो फिर बात करने का क्या तुक है?’’
मेरे हाव-भाव में एहतियात का पुट है, आवाज़ बंद हो जाती है। मैं एक फ़ासला बनाए रखने की कोशिश कर रहा हूँ मुझे लगता है कि फ़ोन करके मैं बेमतलब ही इस झमेले में फँस गया हूँ। तभी उसने मेरी मुश्किल थोड़ी आसान कर दी। उसकी आवाज़ आयी, ‘‘क्या आपको कोई समस्या है? निजी ज़िन्दगी की कोई परेशानी? कोई गुप्त रोग?’’
‘‘तुम ये काम क्यों करती हो?’’ मैं पूछता हूँ।
उसने कहा, ‘‘तुमने ये फ़ोन क्यों किया?’’ और फ़ोन काट दिया। मैं इस अहसास के साथ फ़ोन के सामने बैठा रह जाता हूँ कि जवाबी सवाल पूछ कर उसने मेरे सवाल का जवाब ही तो दिया है। इस बात का आग्रह करके कि मैं संपर्क साधने की अपनी इस औचक कोशिश पर ज़रा ठहरकर सोचूँ। बड़ी महीन चतुराई से उसने ज़ाहिर कर दिया कि जिस तरह मैं उसे दीवार के पर्दे से खींचकर उससे बात कर सकता हूँ उसी सहजता से वह मेरे अस्तित्व को स्वीकार या नकार सकती है। किसी फ़ोन नेटवर्क के आउटर सर्कल पर हुआ यह संक्षिप्त साक्षात्कार जैसे रूहानी अंतरंगता का क्षण रहा हो।
मैं वाणी के बारे में सोचने लगता हूँ। एक ऐसी औरत जिसका नाम ‘ध्वनि’ या ‘शब्द’ का संस्कृत पर्यायवाची है। एक ऐसी औरत जो देह से ज़्यादा एक आवाज़ है - एक ऐसी आवाज़ जो किसी के भी कानों में गूँज सकती है। एक ऐसी औरत जो जिस्मानी तौर पर हो या न हो, मगर टेलीफ़ोन के तारों में क़ैद किसी भूत की तरह कहीं न कहीं है। सोचते -सोचते मुझे बचपन में सुनी एक कहानी याद आ गई जो अभी भी उस वक़्त मुझे पल भर के लिए चिंता में डाल देती है जब रात-बिरात अचानक फ़ोन की घंटी बज उठती है। मैं सोचने लगता हूँ कि अगर ऐसा ही है तो मर चुकी या क़ैद इच्छाओं के न जाने कितने भूत और जिन्न मेरे शहर की हवा में डोल रहे होंगे। निज़ामुद्दीन दरगाह की चारदीवारी के भीतर बनी छोटी-छोटी खोहों में ऐसे कई माहिर बैठे हैं जो ‘ऊपरी हवा’ में मौज़ूद जिन्न के सताये हुओं का इलाज करते हैं। क्या उन्होंने कभी मेरे शहर में कामना की सँकरी गलियों में भटकते भूतों पर ध्यान दिया है? क्या शहर की ख़त्म हो चुकी कामेच्छा में दोबारा जान आने के संकेत दिखाई देते हैं?