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Saturday, October 20, 2007

रामजी आए !

(मित्रों कुछ बरस पहले का यह रेखाचित्र अपने तजुर्बे पर आधारित है. शायद मज़ा आए पढ़कर. साभार: चंदन)

नवरात्रे के पावन अवसर पर एक बार फिर श्री रामचन्द्र इस पुण्यभूमिपर अवतरित हुए। घोर कलियुग में धरती हुई। महानगरवासियों ने उनके दर्शन और उनकी लीलाओं का सुख लिया। सच, श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं! क्या ऊँच क्या नीच, क्या अमीर क्या ग़रीब सबके साथ इंसाफ़ किया। नुक्कड़-चौराहों से लेकर पॉश कॉलोनियों तक रामलीला भयीं। बात अलग है कि कहीं उनका दरबार बड़ा था तो कहीं छोटा, कहीं उनकी पोषाक डिज़ाइनर्स थी तो कहीं देसी, कहीं इन्ट्री फ़्री थी तो कहीं जुगाड़ का पास, कहीं सुरक्षा में कमांडो थे तो कहीं बिल्कुल निरीह-निहत्थे।

इसी बीच मित्रों ने नुक्कड़ नाटक तमाशातैयार कर लिया। कहा, रामलीला में दिखाएँगे। भई, सियावर ऐरे-ग़ैरे हैं जो रामलीला में तमाशा करोगे?’ हठधर्मी नहीं माने। चलो, इसी बहाने श्री राम के दर्शन हो जाएँगे, मौका मिलने पर एक इंटरव्यू भी ले लूँगा - सोचकर नुक्कड़ मंडली का ताम-तोबड़ा थाम लिया। पहला पड़ाव पड़ोस की एक रामलीला स्थली। पूछताछ के बाद आयोजको ने हरी झंडी दी। डुगडुगी बजाई। तमाशा दिखाया। तालियाँ बटोरीं। चल पड़े। रास्ते में एक ने कहा, ‘मंच पर सोमरसमहक रहा था।विश्वास न होना था। न हुआ। बस उनसे एक छोटे रोल का निवेदन किया। सहानुभूतिपूर्वक मंजूर हुआ। अगली मर्तबा समय से पहले बुला लिए गए। पर्दे की आड़ में स्तंभवत हुए बालि-बध देखना पड़ा। अग्रज़ के गदे के प्रहार पर अनुज़ की दहाड़पूर्वक कराह और कल्ले में गुटखा दबाए बालि पर वाण चलाने को उतावले श्रीराम। वाण चल पड़ा। जा लगा पीठ में। बारी थी तारा-विलाप की। नेपथ्य-लीलाचरमोत्कर्ष पर थी। छिड़ चुकी तारा का विलापऔर विद्रोह जायज़ था। किसी तरह प्राणनाथ के विलाप के लिए स्टेज पर ठेली गई। छाती पर लोटी भी नहीं थी, साड़ी पैर में उलझ गई। पतलून दर्शकों के सामने थी। पर्दा गिरा। तमाशाशुरू।

अगला पड़ाव रोहिणी। लक्ष्मणजी मूर्च्छित पड़े थे। अचानक भगदड़ मची। संजीवनी बूटी लेकर पवनपुत्र हेलीकॉप्टर से लौटे हैं। मंडली तमाशाे फिराक में लगी रही। बात नहीं बनी। गली-मोहल्ले की लीला थोड़े ही थी! राय बनी ऐन रावण-वध के दिन तमाशा होगा। साज-बाज लेकर श्री राम-दरबार की ओर चल पड़े। आवाज़ आई - राम और रावण में घमासान ज़ारी है, थोड़ी देर में मेघनाथ, कुंभकरण सहित दुष्ट रावण का पुतला दहन होगा।पुतला दहन! तपाक से एक कानफाड़ आवाज़ - अब एक और बड़े हास्य कवि मंच पर आ रहे हैं, तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत कीजिए।श्री राम दरबार क़रीब था। लाउडस्पीकर फिर बोला - इस दशहरे के आयोजन उनका नया प्रॉडक्ट ख़ुशबू प्लस-प्लस भी आज़माएँ।भोंपू से निकला- गुप्ताजी हमारे क्षेत्र के पूर्व विध गायक हैं। अपने कार्यकाल में इन्होंने बहुत काम किया है। अब ये ग़रीबों के लिए भी कुछ करना चाहते हैं, इसलिए इन्होंने नया शक्ति मंचबनाया है ...’तभी एक ज़ोरदार धमाका, आकाश में सतरंगी आकृति और लाउडस्पीकर की चीख - अभी जो आतिश बाज़ी आपने देखी, वह लव-कुश रामलीला कमेटी के मुक़ाबले की है और इसके लिए हम सिंहानियाजी के शुक्रगुज़ार हैं।मंडली मायूस भई। एक ने पूछा, लीला रास नहीं आ रही?’दूसरा बोला, लेकिन तमाशा कब दिखाएँगे?’फूट पड़ गई। कुछ ने कहा - पुतला दहन के बाद यहीं सड़क पर, तो कुछ ने -ऐसा ठीक न होगा। धर्मसंकट। रामजी आए! लीला दिखा दी! ुतला भी फूँक दिया! पर बीते दिनों हुए बलात्कार, पुलिस हिरासत में मौत, झुग्गी-झोपड़ियों के सफ़ाए, रसोई गैस और बिजली की किल्लत जैसी जन साधारण की समस्याओं पर मौन रहे? तमाशाके जम्हुरे ने झकझोरा, कहाँ खो गया?’अपनी समस्या उसे बताई। बोल पड़ा,‘भाई देख, जिनकी श्रीराम से नज़दीकी है वो तो ऐसी लीलाएँ करवाकर ख़ूब शुभ-लाभ कमाएँगे और स्वास्तिक बनाएँगे। इनकी तो मति मारी गई है, रामभक्ति के नाम पर आए जा रहे हैं। इसीलिए तो अपना तमाशा ज़रूरी है।