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11.2.09

क्‍यों ये साधु भिखारी नहीं हैं

वही मेला प्रशासन वाला पंडाल जो हमारे साथियों ने बड़ी दौड़-धूप के बाद तीन दिनों के लिए हासिल किया था, पिछली रात 'असमंजस बाबू' की प्रस्‍तुति के वक्‍़त मेलार्थियों से ठसाठस भर गया था. धरती से जुड़े साधु-सन्‍यासियों की संख्‍या तुलनात्‍मक रूप से ज्‍़यादा थी. ये वो साधु होते हैं जिन्‍हें आप एक किस्‍म का भिखारी कह सकते हैं. हालांकि मेरे लिए भीख मांगने का धंधा कभी भी सकारात्‍मक नहीं रहा, पर न जाने क्‍यों इन साधुओं को मैं नकारात्‍मक श्रेणी में नहीं डाल पा रहा हूं. अगले दो दिनों के दिनों के दौरान मेला का अनुभव और फिर पंडाल में अपने कार्यक्रमों के ज़रिए और स्‍पष्‍ट हो गया क्‍यों ये साधु भिखारी नहीं हैं और एक ख़ास व्‍यवस्‍था के मारे हुए हैं.

अपने पंडाल में लौटने से पहले मैं दो-चार बड़े बाबाओं के पंडालों की ओर आपको ले चलना चाहूंगा. फर्ज कीजिए अभी आप स्‍वामी राकेशदेवजी के पंडाल के मुख्‍य द्वार पर आ पहुंचे हैं. (स्‍पष्‍ट कर लें कि हर पंडाल एक अस्‍थायी घर ही होते हैं, कई तो इतने आलीशान होते हैं कि पांच सितारा भी पीछे रह जाएं) तो स्‍वामी राकेशदेवजी के पंडाल का मुख्‍यद्वार एक तोड़नद्वार-सा है जिस पर आप स्‍वामीजी की प्रवचन मुद्रा वाली तस्‍वीर और कुछ संदेश (मसलन, मानवजीवन अमूल्‍य है, नष्‍ट न होने दो इसे; प्रभुभक्ति ही जीवन का सत्‍य है, इत्‍यादि) युक्‍त फ़्लैक्‍स वाला वृहदाकार पोस्‍टर टंगा पाते हैं. यह सोचते हुए आप अंदर झांक कर देखने की कोशिश करते हैं कि अंदर का नज़ारा क्‍या है. अंदर से एक आदमी आता है आपसे आपके बारे में पूछता है और ये जानने पर कि आप अंदर के बारे में कुछ जानना चाहते हैं आपसे कहता है, 'अभी विश्राम का समय है; शाम 4 बजे से प्रवचन होगा, तब आइएगा'. उस आदमी की कद-काठी और डील-डौल को देखकर आप वहां से चुपचाप आगे बढ़ जाना ही बेहतर समझते हैं.
आगे वाला पंडाल किसी बाबा रमेशजी का पाते हैं. वहां आप कोई प्रवचन हो रहा पाते हैं. थोड़ा ठहर कर सुनते हैं आप, फिर पता चलता है इनकी भक्ति राम से नहीं है इनका इष्‍ट तो कोई मुरलीवाला है. उसकी कारस्‍तानियों को रासलीला कहकर पेश किया जा रहा है. जितनी बातें कही जा रही है उस मुरलीवाले के बारे में, कम से कम आज के 'श्रीराम सेना' वाले तो उसे कब का टांग चुके होते!

आप कुछ मिनट बाद आगे बढ़ जाते हैं. एक घेरे में पहुंचते हैं. दिलचस्‍प नज़ारा दरपेश होता है आपके सामने. कुछ मंचासीन महिलाएं भजन गा रही होती हैं और नीचे बिछे पुआल पर कुछ लोग गर्दन हिला-हिला कर हल्‍की थपडियों के साथ उन साध्वियों के उत्‍साहवर्द्धन में लीन दिखने हैं. क्षण भर वहां विलमने के बाद आप जैसे बाहर निकलने के लिए यू-टर्न लेते हैं, कोने में उन साध्वियों की चेहरों वाली तस्‍वीरों के साथ भजनों की सीडियां बिक्री के लिए उपलब्ध पाते हैं. आपको अपने पंडाल की याद आने लगती है क्‍योंकि बाल-मज़दूरी पर पंजाब से आए साथीसुप्रीत और सैमुएल की नाट्य-प्रस्‍तुति का समय होने ही वाला है.

मेला प्रशासन का पंडाल. दिल्‍ली से आए ख़ुर्शीद भाई इलाहाबाद के कुछ नौजवानों के साथ 'साझापन' पर बातचीत कर रहे हैं. बीच-बीच में उत्‍पला, अंशु तथा इंसाफ़ के दो अन्‍य साथी भी ख़ुर्शीद भाई की मदद कर रहे हैं. सुबह ग्‍यारह बजे जब वर्कशॉप आरंभ हुई थी उस वक्‍़त कम से कम पांच-छ सहभागियों ने किसी धर्म या संप्रदाय विशेष के प्रति अपनी कट्टर आस्‍था व्‍यक्‍त की थी. उनकी तबीयत अज़ीब तरह के राष्‍ट्रवाद के बोझ तले दबी थी; दो बजते-बजते लगभग सब इस बात पर सहमत हो गए थे कि 'हम जितने लोग इस कार्यशाला में आए हैं उनमें काफ़ी हद तक समानता है और जो नहीं है वहां हम साझा करने को तैयार हैं'. है न मज़ेदार बात! यक़ीन मानिए हमेशा मुफ़्त में बंटती खिचड़ी खाकर पंडाल में पटाए रहने वाले साधुओं की एक भारी तादाद भी दूर से इस वर्कशॉप का हिस्‍सा बने रहे. पूरे कार्यशाला तक कुछ न बोले. पर 'सौ सोनार के और एक लोहार का' वाले तर्ज पर उनके छोटे-मोटे हस्‍तक्षेप ही यह साबित कर गए कि सधुअई के धंधे में भी सब हरा-हरा नहीं है. वंचनाओं, वर्जनाओं, और भेदभावों से लदी-फदी है सधुअई.

प्‍लास्टिक शीट और कंबल को स्‍लीपिंग बैग की तरह चिपकाए टहलने वाली साधुओं की वह जमात कम-से-कम कट्टर नहीं दिखी. वह धर्म-कर्म के धंधे में फैले सोपान-व्‍यवस्‍‍था की मारी हुई लगी. किसी भी वृहदाकार पंडाल में ऐसे किसी धरतीपकड़ बाबा को गर्दन हिला-हिलाकर भक्तिरस में विभोर होते नहीं पाया. वहां तो बाबाजी के शरणागतों में ज्यादातर गृहस्‍थ जीवन से दिखे जिनका डील-डौल भारतीय मध्‍यवर्ग से काफ़ी हद तक मिलता-जुलता लगा. शायद बातचीत के क्रम में कुछ कारण्‍ा उभर कर सामने आए.

(जारी)

10.2.09

माघ मेला: मालती के बच्‍चे को सर्दी लग गई

जितने तंबु उतने मंत्र और उतने हज़ार, दस हज़ार गुना मंत्रोच्चार! आवाज़ों की मारकाट! मिसरी, बताशे की तरह चूसे और चाटे जा रहे मंत्र! किसी तंबु में पचास, किसी में सौ, किसी में दो सौ, किसी में चार सौ सिर. किसी-किसी में छह-सात बजे के आसपास भी चार-पांच भक्‍तजन इस उम्‍मीद से भजनरूप में निकल रहे बाबा उवाचों को गला फाड़-फाड़ कर दोहराते कि मजमा जमेगा क्‍यों नहीं! काश ऐसा हो पाता!

सुना होगा आपने भी कि 'फलां ने घर में घुसकर चिलां को ठोक दिया'. लगभग ऐसा ही किया हमारे इलाहाबादी मित्रों ने इस माघ मेले में. और नहीं तो क्‍या! कहां तो तंबुओं और कनातों से अंटा मेला, भांति-भांति के अखाड़ों में
अलग-अलग शेड्स के केसरिया में लिपटे साधुओं का जत्‍था, तंबुओं में अनवरत चलते प्रवचनों के दौर , तिथिवार बंटते ब्रह्मचर्य की धर्म-दीक्षाओं, रामलीलाओं, रासलीलाओं, शिवमहिमाओं ..., संगम में एक सा लगती हज़ारों डुबकियों, धार्मिक भजनों और मुफ़्त बंटते प्रसादों के बीच ही शहरी ग़रीबी संघर्ष मोर्चा, इंस्‍टीट्यूट फ़ॉर सोशल डेमोक्रेसी, विज्ञान फ़ाउंडेशन, इतिहासबोध मंच और मुहिम से जुड़े मित्रों ने मनाया साझी संस्‍कृति और साझी विरासत का महोत्‍सव सिरजन.

मेला के बांध के अंदर वाले हिस्से में दाखिल होते ही मेला प्रशासन का बड़ा-सा पंडाल; 29 जनवरी को निराला, नज़ीर, कबीर, कैलाश गौतम, पाश, इत्‍यादि की कविताओं और गीतों से बने बड़े-बड़े पोस्‍टरों से सज़कर नितांत नया नज़ारा पेश कर रहा था. उस पंडाल के लिए उत्‍पला, अंशु, ज़फ़र, जितेन्‍द्र, राकेश, अवनीश तथा कुछ अन्‍य साथियों को बहुत दौड़-भाग करनी पड़ी थी.

उसी पंडाल में कानपुर से आए एकलव्‍य के साथी अब्‍दुल ने जब इलाहाबाद शहर की झोपड़पट्टियों से आए सौ से भी ज्‍़यादा बच्‍चों के बीच 'मालती के बच्‍चे को सर्दी लग गयी, हम उसकी गर्म तेल से मालिश करेंगे ...' गा-गा कर सुनाना सुनाना शुरू किया तब अपने-आप वर्कशॉप जमने लगी. उसके बाद अब्‍दुल भाई ने खे-खेल में रोज़मर्रा के बेहद महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर विमर्श पेश किए. ऐं गजब! एक-एक बच्‍चा अब्‍दुल भाई के इशारे पर मस्‍त! एक खेल था 'बात का बतंगड़'. अब्‍दुल भाई ने बच्‍चों को एक बड़े से गोल दायरे में बिठाया और किसी एक की कान में कुछ कहा. और उससे कहा कि अब उसने जो सुना उसे अपनी दायीं ओर वाले बच्चे की कान में कह दे और यह प्रक्रिया अंतिम बच्‍चे के कान तक उस बात के पहुंचने तक चलती रहे. यही हुआ. अब अब्‍दुल भाई ने उस बच्‍ची को बुलाया जिसने सबसे आखिर में बात सुनी थी कि वो सबके सामने बताए कि उसने क्‍या सुना. उस बच्‍ची ने बताया 'मिरची'. अब्‍दुल भाई ने अब उस बच्‍चे को बुलाया जिसके कान में उन्‍होंने कुछ कहा था, और पूछा 'तुमने क्‍या सुना था?' बच्‍चे ने कहा, 'माघ मेला'. ज़ोरदार ठहाका पड़ा. लेकिन हम सब जानते हैं बातें जब इस प्रकार सफ़र तय करती है तो अकसर बदल जाती है. और भी कई रोचक खेल खेलाए अब्‍दुल भाई ने.

उसके बाद सिरजन का औपचारिक उद्घाटन करते हुए इलाहाबाद के प्रख्‍यात सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता जिया भाई ने गंगा-जमुनी तहज़ीब के बारे में बताया‍ और इस बात पर ज़ोर दिया कि युद्ध और वैमनस्‍य किसी भी दौर में लोकप्रिय नहीं रहे हैं. हमने हमेशा ही अपने सामने वाले का सम्‍मान किया है. जब तक हमारा व्‍यवहार ऐसा बना रहेगा हमारी एकता पर आंच नहीं आ सकता. प्रख्‍यात इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता श्री लालबहादुर वर्मा ने उस मौक़े पर नज़ीर और निराला को याद करते हुए कहा कि 'हमारे पास नज़ीर और निराला जैसी परंपरा है जिससे हम साझापन सीखते हैं'. उस मौक़े पर कुछ सांस्‍कृतिक पर्चे भी जारी किए गए.
शाम ढलते ही इलाहाबाद के स्‍कूली बच्‍चों ने सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी भाइचारे पर नृत्य और गीत के कई कार्यक्रम पेश किए. और देर रात अनिल भौमिक के निर्देशन में 'असमंजस बाबू' नामक एक नाटक पेश किया गया. हज़ार-बारह सौ की क्षमता वाले उस पंडाल में आम मेलार्थियों का रेला लगा रहा. लोग आते रहे और कार्यक्रम में मग्‍न होते रहे. इस तरह सिरजन का पहला दिन समाप्‍त हुआ.
(...जारी)

3.2.09

माघ मेले की झलकी

केवल सुना ही था माघ मेला के बारे में, अब‍की देखने का मौक़ा मिला. आज सुबह ही लौटा हूं इलाहाबा से. हालांकि बहुत कुछ नहीं जानता मेला के बारे में, बस इतना जान पाया कि गंगा-यमुना के मिलानस्‍थल का बड़ा धार्मिक महत्त्व है. माघ में मकर संक्रान्ति से लेकर वसंतपंचमी तक दो-चार 'संगम-स्‍नान' बड़ा महत्त्वपूर्ण माना जाता है. समूचे माघ भर 'संगम-सेवन' (संगम-प्रवास) का संबं भी पुण्‍य-कर्मों से जोड़कर बताया जाता है. 'कल्‍पवास' के तौर पर जाने जाने वाले इस प्रवास के लिए हज़ारों की तादाद में लोग देश के विभिन्‍न हिस्‍सों से वहां पहुंचते हैं.

अपने इलाहाबादी मित्र अंशु और उत्‍पला के कारण हमें भी ढलते मघ-मेला का सहभागी होने का मौक़ा मिला. 29 जनवरी को हम सपरिवार मेला पहुंचे. आगे बढ़ने से पहले ये बता देना अच्‍छा रहेगा कि मेला का अनुभव इतना व्‍यापक और सघन है कि एक-या दो पोस्‍ट में साझा करना मुश्किल होगा. कम-से-कम तीन किस्तें तो लिखनी ही पड़ेंगी. प्रस्तुत पोस्‍ट भूमिका भर बन जाए तो भला जानें.

मेला-स्‍थल केवल गंगा-यमुना (संगम में चप्‍पू चलाने वाले केवट और गंगा यमुना सरस्‍वती फिल्‍म के हिसाब से सरस्‍वती का संगम ही नहीं है, य अपने दमदार लोकतांत्रिक समाज और साझी विरात की एक जबरदस्‍त मिसाल भी है. माथे पर अपने वज़न के बराबर बोझा लादे चलते चले जाने वाले हों या लग्‍ज़री कार वाले: जब गंगा नहाने की बात होती है तो घाट एक ही होता है. एक ही पंडा एक ही पुजारी नाई और केवट भी एक ही. लाखों की भीड़, और एक भी लफ़ड़ा-रगड़ा नहीं. सीखने के लिए काफ़ी कुछ था मेले में. पर कुछ चीज़ें ऐसी भी दिखीं, मन खिन्‍न हो गया. धर्मान्‍धता और धरम की आड़ में फलने वाले व्‍यवसाय भी दिखे. कोशिश रहेगी तीन-चार दिनों के दौरान देखे-भोगे को आपसे जल्‍दी ही साझा करूं. तब तक कुछ प्रतिनिधि तस्‍वीरें.

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ

21.1.09

'व' की जगह हम 'ब' या 'भ' से ही काम चला लेंगे ....

हिन्‍दी ही चलती है हमारे प्रदेश में भी. घर में चाहे बज्जिका बोलते हों या भोजपुरी या मैथिली या फिर अंगिका; घर से निकलते ही सब हिन्‍दी में तब्‍दील हो जाती है. पर इस बदली हुई हिन्‍दी पर घर के अंदर बोली जाने वाली बोली का वर्चस्‍व होता ही है, स्‍थापित नहीं करना पड़ता है. फिलहाल मैं उस बहस में नहीं पड़ना चाहता कि घर के अंदर बोली जाने वाली बोली भाषा विज्ञान की दृष्टि से ठीक होती है या बेठीक. इतना ज़रूर है कि उसे बोलने - बरतने में बड़ा मज़ा आता है. पर यही हिन्‍दी बनकर जब जबान से बाहर आती है कि उसमें एक अटपटापन होता है.
दादी कहती थीं, 'चल रे लडिका सS, महाबीरी धजा पूजे; सब कोने के पेरा देबउ'. बालपन की बात को याद करके आज भी बड़ा सामान्‍य लगता है दादी का हम सब बच्‍चों को उस तरह कहना. पर वही बात जब छुट्टियों के बाद वापस हॉस्‍टल लौट कर दोस्‍तों से कुछ इस तरह कहते थे :
'एक दिन अपनी दादी के साथ महाबीरी धाजा के पूजा में गये थे हम'
तो बिल्‍कुल ठीक-ठीक तो नहीं ही लगता था.
एक बोली के तौर पर घरों के अंदर बोली जाने वाली और घर से बाहर इस्‍तेमाल की जाने वाली हिंदी में से किसी की महत्ता को कम करके नहीं आंक रहा हूं. दोनों की अपनी जगह है. कई मर्तबे दोनों एक-दूसरे को समृद्ध बनाते हैं. पर यही लगता है कि दोनों के अंदाज़ को अगर अक्षुण्‍ण रखा जा सके तो क्‍या ही बढिया होगा.
ऐसा कहते वक्त मैं आम तौर पर बिहार में बरते जाने वाली हिन्‍दी को ज़रूर रेखांकित करना चाहूंगा. यह कहना कि हिंदी की वर्णमाला से बिहार में यदि 'व' निकाल भी लिया जाए तो वहां संप्रेषण की समस्‍या नहीं आएगी, ग़लत और अतिशयोक्ति नहीं मानी जानी चाहिए. लोग इस 'व' की जगह कहीं 'ब' से तो कहीं 'भ' से काम चला लेते हैं. धड़ल्‍ले से चल रहा है. मजाल है कि स्‍कूल या कॉलेज में मास्‍साहब टोक दें कि पट्ठा ग़लत बोल रहा है.

13.10.08

डीटीपी को सच पसंद नहीं

13 अक्टूबर. शाम लगभग पांच बजे. दफ़्तर से लौट रहा था. पीछे चन्द्रा बैठी थी. बीडी एस्टेजट से थोड़ा पहले ही दिल्लीट्रैफिक पुलिस की बुलेट पर नज़र पड़ी. दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के नियम के मुताबिक़ मोटर साइकिल की पिछली सीट पर बैठे व्यजक्ति के लिए हेल्मेट पहनना अनिवार्य है. इसी नियम के मुताबिक़ DL-1S 4589 पर नीली-सफ़ेद वर्दी धारण किए महोदय के सिर पर हेलमेट होनी चाहिए थी. रहा गया. अपनी मोटर साइकिल उनके क़रीब लाकर हल्केह से पूछ लिया, ‘सबके लिए क़ायदा-क़ानून, आपके लिए कुछ नहीं ? ‘ दांत निपोरे और बोले, ‘इमरजेंसी है...’ अचानक उनके मोटर साइकिल की रफ़्तार तेज़ हो गयी.
कुछ दूर बाद याद आया कि मेरे बैग में कैमरा तो है. चन्द्रा़ को कहा, ‘झट से कैमरा निकाल कर एक तस्‍वीर उतार लो सरजी की. चन्‍द्रा ने वैसा किया, पर थोड़ा वक़्त लग गया. और ये सब करते हुए हम तिमारपुर गोल मार्केट के क़रीब पहुंच चुके थे. चन्द्रा ने दो तस्वीरें ली थी. बुलेट के चालक महोदय ने दाईं ओर वाले आइने से यह देख लिया. अपने पीछे से रही ब्ल्यू लाइन को आगे जाने देने के लिए पहली ब्‍ल्‍यू लाइन जैसे आड़े-तिरछे खड़ी हो जाती है, उसी अंदाज़ में उस गोरे-चिट्टे नौजवान ने अब बुलेट हमारे आगे खड़ी कर दी. अचानक ज़ोर से ब्रेक लगाना पड़ा.
पीछे बैठे दिल्‍ली ट्रैफिक पुलिस के सब इंस्‍पेक्‍टर का नाम अब हम पढ़ पा रहे थे. शुरुआती दो अक्षर दो बिंदुओं के साथ मिलकर नाम के अगले हिस्‍से को थामे था, औरडोगराके साथ उसका समापन हो रहा था. यानी कोई डोगरा साहब थे वे. गुस्से में तमतमाते डोगरा साहब आये और जिस पुलिसिया अंदाज़ से हम परिचित हैं उसी में हमसे मुख़ातिब हुए. उनके उस उपक्रम को धमकाना भी कह सकते हैं. और वो गोरा, छरहरा जवान पहले कुछ शब्द अपने मुंह में छानता और फुसफुसाहट के अंदाज़ में कुछ मेरे सामने पटकता. पर उसकी लिप सिंकिंग हमें उसकी लगभग हर अभिव्यमक्ति समझा पा रहे थे. गली-मोहल्लों में नौजवान ऐसा बोलते ही रहते हैं. बहरहाल, श्री डोगरा साहब डांटते-धमकाते हुए हमें ये समझाने की कोशिश कर रहे थे कि किसी की इमरजेंसी को हम नहीं समझ पाए. उनकी गाड़ी या कुछ ख़राब है जिसको बनवाने के लिए वे मेकेनिक ले जा रहे हैं अपने साथ. यानी उस गोरे नौजवान को उन्होंने मेकेनिक बताया जिसके मुंह से रह-रह कर महीन बातों (बदलफ़्जों) की बुंदाबांदी हो रही थी. हमारा अंदाज़ है कि वो या तो डोगरा साहब का बेटा था या कोई बेहद रिश्तेदार या परिचित.
श्रीमान डोगराजी की इस हरकत को क़रीब 50 राहगीर देख रहे. जानने की कोशिश कर रहे थे लोग कि हमेशा आम आदमी की पर्ची काटने वाला ये पुलिसकर्मी आखिर यूं उलझ क्‍यों रहा है इस दंपत्ति से. तभी एक मित्र जाने कहां से धमके. हम कुछ उन्‍हें बता पाते, इससे पहले डोगरा साहब ने लगभग एक सांस में ही ये बता दिया कि हमने कितनी बड़ी ग़लती कर दी है उनकी तस्‍वीर लेकर. साथ में डोगरा साहब ने हमारे मित्र को ये भी 'समझाया' कि हममें इंसानियत है ही नहीं. हमारे मित्र को समझाने का डोगरा साहब का अंदाज़ लगभग वैसा ही था जिस तरह वो हमें 'समझाने' की कोशिश कर रहे थे. उनकामेकेनिकअपनेमालिककी वर्दी और स्थिति को देखते हुए अब फुसफुसाहट से आगे बढ़ चुका था. फुसफुसाहट अब सिसिआहट (धीरे-धीरे सिटी बजाने की आवाज़) का रूप लेने लगी थी. अब उसके कुछ शब्‍द साफ़-साफ़ बाहर आने लगे थे. ‘अच्छा फोटो खिंचा है, देखते हैं .... बताते हैं ....’ उसने मेरी मोटर साइकिल की नंबर प्‍लेट पर भी नज़रें इनायत की. तात्पर्य ये कि श्रीमान डोगरा साहब और उनके मेकेनिक में ये तय कर पाना मुश्किल हो रहा था किसकी धमकी/डांट मेरे लिए ज्‍़यादा समझने और आदर करने योग्‍य है. मैं बार-बार दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के सब इंस्पेक्‍टर श्रीमान डोगराजी से यही अनुरोध करता रहा किआप अपनी बात कहिए पर इस जनाब को चुप कराइए’. तमतमाहट इतनी थी कि वे मेरी बात सुन नहीं पा रहे थे. कई बार तमतमाहट सुनने में अवरोध उत्‍पन्‍न करने लगता है.
दिल्लीट ट्रैफिक पुलिस के एक सब इंस्पेबक्ट की उनके ही विभाग द्वारा बनाए और उसी की हिफ़ाज़त में पलने वाले क़ानून की अवहेलना करने की एक मिसाल कैमरे में क़ैद कर लेने का 'जुर्म' हम पर थोपा जा रहा था. मुझे इस बात के लिए खुली सड़क पर हर संभव तरीक़े सेसमझायाजा रहा था कि मैंने कैसे ग़लत किया है. कैसे ये ग़लती मुझे परेशानी में डाल सकती है.
अपने देश में न्या केवल भांति-भांति के सप्‍ताहों, पखवाड़ों, जयंतियों, पुण्‍यतिथियों, दिवसों तक ही सिमट कर रह गया है? गांधी जयंती गुज़रे एक पखवाड़ा भी नहीं बीता है. अख़बारों का वज़न विज्ञापनों से दोगुना हो गया था उस दिन. शायद ही कोई विभाग बापू की तस्‍वीर के साथ अपना संदेश और विज्ञापन प्रकाशित करने रह गया हो उस दिन. सबने सच की राह पर चलने की नसीहत दी. हर साल देते हैं. एक सच पर अमल क्‍या किया रात भर नींद ही नहीं आयी.
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20.10.07

रामजी आए !

(मित्रों कुछ बरस पहले का यह रेखाचित्र अपने तजुर्बे पर आधारित है. शायद मज़ा आए पढ़कर. साभार: चंदन)

नवरात्रे के पावन अवसर पर एक बार फिर श्री रामचन्द्र इस पुण्यभूमिपर अवतरित हुए। घोर कलियुग में धरती हुई। महानगरवासियों ने उनके दर्शन और उनकी लीलाओं का सुख लिया। सच, श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं! क्या ऊँच क्या नीच, क्या अमीर क्या ग़रीब सबके साथ इंसाफ़ किया। नुक्कड़-चौराहों से लेकर पॉश कॉलोनियों तक रामलीला भयीं। बात अलग है कि कहीं उनका दरबार बड़ा था तो कहीं छोटा, कहीं उनकी पोषाक डिज़ाइनर्स थी तो कहीं देसी, कहीं इन्ट्री फ़्री थी तो कहीं जुगाड़ का पास, कहीं सुरक्षा में कमांडो थे तो कहीं बिल्कुल निरीह-निहत्थे।

इसी बीच मित्रों ने नुक्कड़ नाटक तमाशातैयार कर लिया। कहा, रामलीला में दिखाएँगे। भई, सियावर ऐरे-ग़ैरे हैं जो रामलीला में तमाशा करोगे?’ हठधर्मी नहीं माने। चलो, इसी बहाने श्री राम के दर्शन हो जाएँगे, मौका मिलने पर एक इंटरव्यू भी ले लूँगा - सोचकर नुक्कड़ मंडली का ताम-तोबड़ा थाम लिया। पहला पड़ाव पड़ोस की एक रामलीला स्थली। पूछताछ के बाद आयोजको ने हरी झंडी दी। डुगडुगी बजाई। तमाशा दिखाया। तालियाँ बटोरीं। चल पड़े। रास्ते में एक ने कहा, ‘मंच पर सोमरसमहक रहा था।विश्वास न होना था। न हुआ। बस उनसे एक छोटे रोल का निवेदन किया। सहानुभूतिपूर्वक मंजूर हुआ। अगली मर्तबा समय से पहले बुला लिए गए। पर्दे की आड़ में स्तंभवत हुए बालि-बध देखना पड़ा। अग्रज़ के गदे के प्रहार पर अनुज़ की दहाड़पूर्वक कराह और कल्ले में गुटखा दबाए बालि पर वाण चलाने को उतावले श्रीराम। वाण चल पड़ा। जा लगा पीठ में। बारी थी तारा-विलाप की। नेपथ्य-लीलाचरमोत्कर्ष पर थी। छिड़ चुकी तारा का विलापऔर विद्रोह जायज़ था। किसी तरह प्राणनाथ के विलाप के लिए स्टेज पर ठेली गई। छाती पर लोटी भी नहीं थी, साड़ी पैर में उलझ गई। पतलून दर्शकों के सामने थी। पर्दा गिरा। तमाशाशुरू।

अगला पड़ाव रोहिणी। लक्ष्मणजी मूर्च्छित पड़े थे। अचानक भगदड़ मची। संजीवनी बूटी लेकर पवनपुत्र हेलीकॉप्टर से लौटे हैं। मंडली तमाशाे फिराक में लगी रही। बात नहीं बनी। गली-मोहल्ले की लीला थोड़े ही थी! राय बनी ऐन रावण-वध के दिन तमाशा होगा। साज-बाज लेकर श्री राम-दरबार की ओर चल पड़े। आवाज़ आई - राम और रावण में घमासान ज़ारी है, थोड़ी देर में मेघनाथ, कुंभकरण सहित दुष्ट रावण का पुतला दहन होगा।पुतला दहन! तपाक से एक कानफाड़ आवाज़ - अब एक और बड़े हास्य कवि मंच पर आ रहे हैं, तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत कीजिए।श्री राम दरबार क़रीब था। लाउडस्पीकर फिर बोला - इस दशहरे के आयोजन उनका नया प्रॉडक्ट ख़ुशबू प्लस-प्लस भी आज़माएँ।भोंपू से निकला- गुप्ताजी हमारे क्षेत्र के पूर्व विध गायक हैं। अपने कार्यकाल में इन्होंने बहुत काम किया है। अब ये ग़रीबों के लिए भी कुछ करना चाहते हैं, इसलिए इन्होंने नया शक्ति मंचबनाया है ...’तभी एक ज़ोरदार धमाका, आकाश में सतरंगी आकृति और लाउडस्पीकर की चीख - अभी जो आतिश बाज़ी आपने देखी, वह लव-कुश रामलीला कमेटी के मुक़ाबले की है और इसके लिए हम सिंहानियाजी के शुक्रगुज़ार हैं।मंडली मायूस भई। एक ने पूछा, लीला रास नहीं आ रही?’दूसरा बोला, लेकिन तमाशा कब दिखाएँगे?’फूट पड़ गई। कुछ ने कहा - पुतला दहन के बाद यहीं सड़क पर, तो कुछ ने -ऐसा ठीक न होगा। धर्मसंकट। रामजी आए! लीला दिखा दी! ुतला भी फूँक दिया! पर बीते दिनों हुए बलात्कार, पुलिस हिरासत में मौत, झुग्गी-झोपड़ियों के सफ़ाए, रसोई गैस और बिजली की किल्लत जैसी जन साधारण की समस्याओं पर मौन रहे? तमाशाके जम्हुरे ने झकझोरा, कहाँ खो गया?’अपनी समस्या उसे बताई। बोल पड़ा,‘भाई देख, जिनकी श्रीराम से नज़दीकी है वो तो ऐसी लीलाएँ करवाकर ख़ूब शुभ-लाभ कमाएँगे और स्वास्तिक बनाएँगे। इनकी तो मति मारी गई है, रामभक्ति के नाम पर आए जा रहे हैं। इसीलिए तो अपना तमाशा ज़रूरी है।