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Thursday, November 8, 2007

बिदुरजी नहीं रहे

परसो रात माताजी से फ़ोन पर बातचीत हुई. हालचाल के शुरूआती आदान-प्रदान के बाद उन्होंने बताया कि उनके पैर में एक गांठ बन गयी है, मेरी छोटी मामीजी के साथ वो पटना में किसी डॉक्टर दिखवाकर आयीं हैं. एक महीने बाद फिर बुलाया है.

जानकर राहत मिली. पिताजी के बारे में पूछने पर पता चला कि आजकल गांव में धान की कटाई और तैयारी का काम चल रहा है. उन्होंने ये भी बताया कि खेतों में अब भी पानी है. समय लगेगा और शायद अगले फसल के लिए दिक़्क़त होगी. फ़ोन रखते-रखते माताजी ने बताया कि चनेसर का (चन्देश्वर काका) नहीं रहे, और फिर एकदम से ख़ामोश हो गयीं.

चनेसर का, मेरे लिए चनेसर बाबा हमेशा एक रहस्य रहे. उनकी उम्र मेरे ख़याल से अस्सी के आसपास रही होगी. हो सकता है ज़्यादा भी. छुटपन की स्मृति कहती है कि मैंने सबसे पहले उन्हें ही साइकिल चलाते देखा था. वही मेरे लिए सबसे पहले साइकिल-सवार थे. मेरे गांव में किसानों के घर और बथान/डेरा/घेर में कम से कम से दो किलोमीटर की दूरी थी, कुछ का बथान तो तीन किलोमीटर से भी ज़्यादा दूर था. जैसे हिटलर साहब का. हिटलर साहब, असली नाम तपेश्वर सिंह, रिश्ते में मेरे बाबा लगते थे. कुछ साल पहले वो भी गुज़र गए. एक बार कभी अपनी ज़वानी के दिनों में वे गांव के सरपंच चुने गए थे. उस ज़माने में ग्राम कचहरी का बड़ा रूतबा था. बात-बात में लोगों को न्याय मिलता था. तपेश्वर बाबा के उस त्वरित न्याय-प्रणाली के कारण ही गांव के कुछ लोगों ने उनको हिटलर के खिताब से नवाज़ दिया था, जो आगे चलकर उनके नाम को एक किस्म से स्थानापन्न ही कर दिया. तो हिटलर साहब की हालत तो ऐसी थी कि उनके परिवार में डेरा पर रहने की ड्यटी बांट-सी दी गयी थी कि कौन किस समय डेरा पर जाएगा.

असल में डेरा और घर का एक बेहद जीवन्त और असरदार संबंध हुआ करता था उस ज़माने में. खेती-बाड़ी का सारा काम डेरे के आसपास हुआ करता था, क्योंकि ज़्यादातर खेत-पथार उधर ही थे. माल-मवेशी भी डेरे पर ही. पर कटाई-पिटाई, दौनी-ओसाई के बाद तैयार अनाज घर पहुंचा दिए जाते थे. अब अनाज पर परिवार की बुजुर्ग महिलाओं का स्वामित्व होता था. स्वामित्व इसलिए कि असली मिल्कियत तो डेरा पर बैठे मर्दों की होती थी. डेरा और उसके आसपास खेती संबंधी काम के बाद बन/मज़दूरी के लिए कामगार को एक पर्ची दे दी जाती थी, जो आमतौर पर मेरे परिवार में चाचा देते थे, जिस पर लिखा होता था बन की संख्‍या और बदले में दिए जाने वाले अनाज का वज़न, जैसे तीन बन, 3x3, कुल 9 किलो अनाज. अब उस पर्ची को दादी किसी बच्चे से या फिर आंगन में मेरी मां से पढ़वाती थी और फिर उस कामगार की मज़दूरी तौली जाती थी. अनाज तौलने का काम आम तौर पर वो मज़दूर करता था जिसे मज़दूरी लेनी होती थी.

हम बच्चे तब बेढ़ी/ठेक में कूदने के लिए बेचैन रहते थे. बेढ़ी/ठेक बांस के पतले-पतले फट्ठे से बुना गया एक बड़ा-सा घेरा होता था, जिस पर मिट्टी और गोबर का लेप होता था और उपर छतरीनुमा एक छप्पड़ भी. ईंटों से जुड़ी नींव पर रखे इस घेरे में सामने की तरफ़ एक छोटी सी खिड़की होती थी. कई-कई क्विंटल अनाज उस ठेक में आ जाते थे. जब घर की कोठियों में अनाज समाप्त हो जाता था तब दादी किसी बड़े आदमी से खिड़की का ताला खुलवा देती थी और आसपास चक्कर लगा रहे किसी बच्चे को उसके अंदर घुसकर अनाज निकालने के लिए कहती थीं. बहुत मज़ा आता था अनाज के उस कमरे में. बहुत मजा! तो ये घर और डेरे के संबंध और उन संबंधों के चलने-चलाने के बहुतेरे तरीक़ों में से एक की बानगी थी. कमोबेश हर खेतीहर परिवार में ये होता था.

हर किसान परिवार का कोई न कोई पुरुष रात को डेरे पर ज़रूर रहता था. शायद यह एक अनकहा नियम ही था. अगली सुबह वही आदमी दूध, सब्जी, जलावन, फल इत्यादि लेकर गांव (गांव में घर को गांव ही संबोधित करते हैं लोग आज भी) पहुंचता था. कुछ मामलों में ढुलाई का यह काम चरवाहा भी करता था. चरवाहे अमुमन डेरे के आसपास के दलित परिवारों के बच्चे होते थे. इक्के-दुक्के बच्चियां भी चरवाही का काम करती थीं. हमारे परिवार के लिए ये काम मेरी याद्दाश्त में चिकरना (कैलाश राम), और नथुनिया यानी नथुनी राम ने किया. ये चरवाहे सिर पर बड़ी-सी टोकरी में दूध का डोल और थोड़ी-बहुत सब्ज़ी लेकर हवेली (किसानों के घर को जन-मज़दूर हवेली कहा करते थे) पहुंचते थे. टोकरी उतारने के बाद चरवाहे हाथ-मुंह धोकर आते थे और साथ में केले का पत्ता भी लाते थे, जिस पर आम तौर पर रात की बची-खुची रोटी और सब्ज़ी रख दी जाती थी. बहुत कम ही परिवार थे जो ताज़ा खाना खिलाते थे चरवाहे को. मेरी चचेरी दादी तो अकसर बासी भोजन ही चरवाहे के पत्ते पर रख देती थीं. इक्के-दुक्के परिवारों में आज भी यही प्रैक्टिस जारी है. मैं जब भी ऐसा देखता हूं, बड़ी पीड़ा होती है मुझे, गुस्सा भी आता है. कभी-कभी लगता है नादानी में कितने अपराधों का हिस्सा रहा हूं मैं!

हां तो मैंने जिस साइकिल सवार को सबसे पहले जाना, वे 20-22 बरस पहले भी मुझे ज़्यादा उम्र के लगते थे. तब उनके घर में उनके अलावा उनकी एक बहन जो शादी के कुछ सालों बाद अपने ससुराल से वापस आ गयीं और फिर कभी लौटी ही नहीं, पिछले कुछ सालों से उनकी मानसिक स्थिति भी ख़राब रहने लगी है, रहती थीं, सफ़ेद बालों वाली उनकी मां और बेहद सुन्दर और शांत स्वभाव की उनकी पत्नी रहती थीं. उनकी पत्नी जिनको हमलोग फुआजी पुकारते हैं, उम्र में चनेसर बाबा से आधी या आधी से थोड़ी कम थीं. चनेसर बाबा के छोटे भाई केदार बाबा जो बड़काकाना, हज़ारीबाग में सीसीएल में फ़ौरमैन थे, वहीं परिवार समेत रहते थे. उनको रिटायर हुए भी 6-7 बरस हो गए होंगे, अब भी बड़का काना में ही रहते हैं. घर-परिवार के बड़े-बूढ़ों से सुना है कि चनेसर बाबा के परिवार में खेत-पथार कम था. वे ज़्यादा पढे-लिखे भी नहीं थे. केदार बाबा लगनशील और मेहनती थे. आज भी बड़े कर्मठ लगते हैं मुझे. मुज़फ़्फ़रपुर से आईटीआई का कोर्स कर लिया था किसी तरह, जिसकी वजह से उन्हें तब झारखंड के जंगल में नौकरी मिल गयी थी. वहां उन्होंने नौकरी के अलावा एक दुकान भी शुरू कर दी थी जिसको चलाने के लिए वे अपने रिश्‍तेदारों को साथ ले जाते थे या बुलवा लेते थे. बाद में चनेसर बाबा का बड़ा बेटा यानि केदार बाबा का बड़ा भतीजा बिट्टु जो मुझसे 4-5 साल छोटा होगा, दुकान चलाने के लिए बड़काकाना गया और वहीं रह गया. सुनते हैं अब वो दुकान बिट्टु की ही है.

नौकरी लगने के बाद केदार बाबा की शादी हो गयी. उनका ससुराल और मेरा ननिहाल एक ही गांव में है. मुज़फ़्फ़रपुर और दरभंगा जिले के सीमांत गांव पिपरा में. बचपन से सुनते आ रहा हूं कि अपनी शादी के कुछ सालों बाद केदार बाबा ने अपने ही ससुराल में बड़े भाई यानि चनेसर बाबा की शादी के लिए एक लड़की का इंतजाम किया. लड़की मेहनती थी, शायद ग़रीब थे मां-बाप. लगभग दो गुने उम्र के दुल्हे के साथ अपनी लड़की ब्याहने के लिए वे राजी हो गए. चनेसर बाबा को दो बेटे हैं. बिट्टू बड़काकाना में दुकानदारी करता है और छोटा जुगनू गांव में ही रहकर खेतीबाड़ी करता है और परिवार की देखभाल भी.

चनेसर बाबा बहुत मेहनती थे. जवानी के दिनों में कई हाथों का काम उनके दो हाथ करते थे और बहुतेरे पावों के काम में उनकी साइकिल के दो पहिए उनकी दोनों पैरों की मदद करते थे. खेती से जो भी धान, गेहूं, दलहन, तिलहन इत्यादि उपजता था, उनमें से अच्छे-अच्छे अनाज वे बड़का काना पहुंचा देते थे या फिर वहां के लिए बचा कर रखवा देते थे कि केदार के भेज दिअहु. कुछ साल पहले केदार बाबा ने डेरे पर ही घर बनवाया था. चनेसर बाबा परिवार समेत वहीं रहते थे.

हर गांव में होती है, या किसी-किसी गांव में नहीं होती होगी, मेरे गांव में एक ख़ास परंपरा है, चाल और चेहरे के अनुरूप कुछ लोगों को उपाधियां दी जाती थीं. हिटलर साहब तो थे ही बिदुरजी भी थे. हमारे चनेसर बाबा को बिदुरजी का खिताब मिला था. अबकी जाउंगा तो पता करूंगा किन विशेषताओं के कारण चनेसर बाबा बिदुरजी कहे जाते थे.बिदुरजी के नहीं रहने से डेरा पर रात बिताने की परंपरा को भारी नुक़सान हुआ है.

Monday, October 29, 2007

पत्ता बुहारने वा‍ली औरतें

छोटा था. नौ-दस साल का. चौथी-पांचवीं में रहा होउंगा शायद. रेणू के पुर्णिया में एक हॉस्टल था. हॉ्स्टल क्या आश्रम कहना ज़्यादा वाजिव होगा. हां, तो मैं उसी पुर्णिया में आश्रमवासी था. छुट्टियों की बड़ी किल्लत रहती थी. गुरुजी ये तो सुनाते रहते थे कि कैसे महात्मा गांधी अनशन पर बैठे थे और कैसे उन्होंने गांधीजी से कहा था कि बापू आप अनशन तोड़ दीजिए, आपको कुछ हो गया तो अंग्रेज़ फिर नहीं जाएंगे... पर छुट्टी देने में न जाने वे इतने कंजूस क्यों थे. सबसे बड़ी छुट्टी गर्मी की. 15 दिनों की.

ख़ैर, ख़ुशी इस बात की होती थी कि पन्द्रह दिन ही सही, जमकर आम खाएंगे. गांव पहुंचते ही अपने हमउम्र दोस्तों के साथ सीधा गाछी (आम का बगीचा) ...

उन दिनों दिन-दिन भर गाछी में ही रहती थी बच्चों की टोली. बड़ों की भी. तब आम के बगीचे में पेड़ से टपके आम के पीछे एक साथ बच्चे दौड़ पड़ते थे. कभी-कभी उस पछड़ा-पछड़ी में आम केवल गुठली बन कर रह जाती थी. हाथ आते थे केवल रस सने छिलके. यानि पेड़ से टपके आम उस वानर टोली के लिए कम पड़ते थे. फिर रास्ता निकलता था पेड़ पर चढ़कर डाल हिलाकर. कई तीन फुटिए पेड़ पर चढ़ने में बड़े माहिर थे. सेकेंड में ही बंदर की तरह क़ूद कर उंची-उंची फुनगियों पर चढ़ जाते थे और किसी डाढ़ (डाल) को दो बार हिला देते थे. पके आम भड़भड़ा कर ज़मीन पर गिर पड़ते थे. और भी तरीक़े थे आम से पेट भरने के. कभी और चर्चा करेंगे.

गाछी में आम खाने के अलावा और बहुत कुछ करते थे हमलोग. कभी-कभी बोका/बोतू (बकरा) आ जाता गाछी में. टोली का कोई बड़ा लड़का उस पर सवार हो जाता और उसके काम उमेठने लगता था. बोतू घोड़े की तरह उमकने लगता था और बाक़ी बच्चे हो-हो करते उसके पीछे दौड़ पड़ते थे. कई बार इस प्रक्रिया में बोतूसवार गिर भी पड़ता था. हमारी टोली में अकसर उमा शंकर, जो बेला के नाम से प्रसिद्ध था: बोतूसवारी किया करता था. हम बच्चों को वो समझा देता था कि हम गिर जाएंगे.

आम के महीनों में कभी-कभी शिकार भी होता था. बच्चे पेड़ों की डालियों का मुआयना करते रहते थे कि किस डाल पर पंडूक का घोंसला है और किसमें चूजा या अंडा है. पता लगते ही टोली का कोई बच्चा पेड़ पर चढ़कर घोंसले से चूजे या अंडे उतार लेता था और फिर सामूहिक भोज होता था. कई बार गाछी में ही भून-भान कर खा लिया जाता था. कभी-कभी किसी गाछ (पेड़) पर धामन सांप होने की ख़बर फैल जाती थी. उसके बाद तो बच्चे बांस के लंबे-लंबे फट्ठे लेकर उसको उतारने की कसरत करने लगते थे. कभी-कभार सफलता भी मिल जाती थी. उसके बाद बच्चों में उसे हाथ से छूने की मारामारी होने लगती थी. फिर घुमते-फिरते ये किस्सा आता था कि धामन तो दुधारू पशुओं के पांव छानकर उसका दूध पी लेता है. ऐसे किस्से ख़ूब चलते थे.

पेड़ों के अलग- अलग नाम थे. जैसे बमई (बंबइया), मालदह (लंगड़ा टाइप), किसनभोग (कृष्णभोग), केरवा (केले जैसा लंबा होता है), सेनुरिया (सिंदुरी), बभना (बहुत स्वादिष्ट होता था वो आम, सालों से खाने को नहीं मिला), खजवा (खाजे जैसा मीठा), घिउअहवा (थोड़ा-थोड़ा घी जैसा स्वाद), भदइया (भादो में पकता था, ज़्यादातर अंचार के लिए इस्तेमाल होता था), सबजा (पकने पर इसमें कीड़ा लग जाता था. अंचार बहुत अच्छा होता था उस आम का. किसी को मुफ़्त में देना होता तो घर वाले इसे ही याद करते थे). और भी बहुत थे, नाम भूल गया.

हमारे खजवा और घिउहवा के पेड़ के नीचे गड्ढा था. बारिश होने पर उसमें पानी जमा हो जाता था. कहें तो अकसर गड्ढे में पानी रहता ही था, इसलिए इन दोनों पेड़ों के टपके आम खाने के लिए गड्ढे में जाना ही होता था. उस गड्ढे का एक बड़ा फ़ायदा ये था कि दीर्घशंका-निबटान के बाद पानी के लिए इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता था.

अमूमन दोपहर में हमलोग मचान पर लेटे होते थे. सरसराहट की आवाज़ आती थी कभी-कभी. उठकर देखता था कुछ औरतों और लड़कियों की टोली पत्ते बुहार रही होती थी. हम झपट पड़ते थे उनकी तरफ़. उनके पत्ते के ढेर को ढहा देते थे. कहते थे, देखाब कए गो आम नुकैले हते (दिखाओ तुमने कितने आम छुपाए हैं)?’ तब पता नहीं था कि वो कौन औरतें हैं, क्यों पत्ते बुहार ही हैं. अपनी टोली के लड़के फिर बताते थे कि जरना (जलावन) के लिए. वो ग़रीब थीं. ज़्यादातर दलित-पिछड़ी जातियों की. पति दिहाड़ी करने जाया करते थे और ये रात के भोजन के लिए जलावन इकट्ठा करती थीं. अब उस नादानी को याद करके बहुत अपराधबोध होता है.

पिछली मर्तबा जब गांव गया था तो देखा अब वो गाछी नहीं है. पिछले दस-बारह साल से जो बाढ़ आए उसमें सारे पेड़ ख़राब हो गए, गिर गए. दो-एक बचे थे उसको टोले के लोगों ने जलावन और चौखट-किवाड़ के लिए काट दिया. अब केवल रेत है उस जगह पर जहां कभी दूर-दूर तक गाछी ख़त्म नहीं होती थी. पहले मधु भैया की गाछी, फिर हमारे दादा की, केदार बाबा की, टुना बाबा की, पत्ती की, राणा बाबा की, बच्चाजी की, मठवाले की, किरपाल (कृपाल) बाबा की, उधर श्रीनारायण सिंह के खानदान की, उसके बाद बिपुलवा की, ... वैसे भी हमारी गाछी तो परबाबा (पिताजी के दादा) या फिर उनके पिताजी ने लगवायी थीं. इसीलिए तो लगभग टोले भर की गाछी एक ही जगह पर थी.

अब वहां गाछी नहीं है. गांव में पत्ता बुहारने वाली अब भी हैं. बहुत दूर जाना पड़ता है उन्हें. हाई स्कूल के आगे. पिछली मर्तबा चचेरे भाइयों ने बताया दो-तीन साल पहले हाई स्कूल के आगे वाली गाछी में पत्ता बुहारने वा‍ली औरतों के साथ जोर-जबरदस्ती की थी गांव के कुछ नए रईसज़ादों ने.

Tuesday, October 23, 2007

चाचीजी कड़ाही ख़रीदने निकलीं


दोपहर में भोजन के बाद मुझे नींद आने लगी थी. सोने की कोशिश कर रहा था. मच्छरों की भनभनाहट और बच्चों की उधम-कूद के बीच आंखों का बन्‍द होना और खुलना जारी था. इसी बीच एक तीखी आवाज़ कानों में पहुंची. पर मैं बिस्तर पर पड़ा ही रहा. इधर आंगन से मेरी छोटी चाचीजी बुझाई अ बरतन वाला जानु आएल हई कहकर बाहर निकलीं. किसी बच्चे से पूछा, बरतन वाला हकार देइत रहलई ह, केन्ने गेलई?’ बच्चे ने कहा, जा, दाई उ त ओन्ने सड़क ओरि चल गेलौ. चाची ने उस बच्चे से उसे बुलाने के लिए कहा. थोड़ी देर में वर्तन वाला दरवाज़े पर आ चुका था.

चाची ने उसे बिठाया और उससे बातचीत शुरू कर दी. बातचीत इतनी उंची आवाज़ में हो रही थी कि मेरे लिए सोने की कोई भी कोशिश करना बेकार था. उठकर बाहर आ गया. देखा, एक वृद्ध ठठेरा एल्युमिनियम के वर्तनों को एक बड़े से जाले में लिए बैठा था. चाचीजी और उनके बातचीत के दौरान पता चला कि वह पड़ोस के गांव बेलहियां का रहने वाला है. ख़ैर चाचीजी ने उससे एक कड़ाही दिखाने को बोला. उन्होंने कड़ाही दिखाई. समय आ गया था मोलभाव करने का. ठठेरे ने जो भी क़ीमत बतायी थी कि चाचीजी ने बड़े नाटकीय अंदाज़ में उसे खारिज करते हुए कहा, बुझाई अ उमिर के जौरे-जौरे बुढ़वा के अकिलो घटल जाई छई. अंहेर बतियाई छि. भल न ओई अंगना में 130 के लेलथिन ह कड़ाही. अई से लमहरे होतई. ठठेरे ने कहा, त हम कहां कहइले कि लेईए लिउ अतेक में. आहां न बताउ कि कतेक देबई?’ चाचीजी ने जो भी क़ीमत लगाया, ठठेरे को वो मंजूर नहीं था. उन्होंने कहा, ठीक हई, आहां दाम लगा न लेली. जहां मिलत एतना में उंहें से ले लेब. काहे ला बेसी पइसा जियान करब. इसी के साथ उन्होंने से कड़ाही मांगी. काहे ला हड़बड़ाई छि. रुकू न पूछवा देइले भाव कहकर चाचीजी ने किसी बच्चे से पड़ोस की एक दूसरी चाचीजी को बुलावा भेजा. थोड़ी देर वो चाचीजी भी आ गयीं. एक बार फिर मोलभाव शुरू हुआ. अब दो चाचियों के सामने एक अकेला बुजुर्ग ठठेरा! क़ीमत और कड़ाही की क्वालिटी को लेकर दोनों पक्षों के बीच जिरह होती रही. इस बीच सामने से एक भाभीजी आ गयीं. रह-रह कर भाभीजी भी जिरह में अपना योगदान देती रहीं.

क़ीमत संबंधी जिरह हो ही रही थी कि चाचीजी ने उनसे पूछा, त अनाजो त ले न लेब हो बुढ़ा?’ बुढ़े ने कहा, न, नगद लागत. लेबे के है त लिउ न त जाए दिउ. आउरो जगह जाए के है हमरा. चाचीजी का अपना ये अस्त्र भी जाता दिखा. उन्होंने ज़ोर देकर कहा, है अनाज न काहे लेब? धान देब. आहां स के गांव में है धान?’ ठठेरे ने कहा, न है त कि भेलई. एखुन कुंटल (एक-एक क्विंटल) चाउर (चावल) न मिललई ह रिलीफ़ में, आ उपर से पांच-पांच सौ रुपइयो मिललई ह. कि करबई हम धान लेके?’

उसके बाद, गांव-जवार में धान की फसल कैसी है इस बार - चर्चा होने लगी. आखिरकार ठठेरे ने अनाज लेने से मना कर दिया. चाचीजी इस फिराक में थीं कि किसी तरह क़ीमत पर चर्चा हो जाती है, तो कुछ पैसे और कुछ अनाज देकर वो कड़ाही ले लेंगी. पर बात न बनती देख उन्होंने उस बूढ़े ठठेरे को ये बताना शुरू किया कि वो तो लोकल सामान इस्तेमाल ही नहीं करती हैं, ये तो त्यौहार (नवरात्रे) आ रहा हैं इसीलिए वो ये कड़ाही ले लेना चाह रही थीं. इसी बहाने एक वर्तन हो जाता. वर्ना मुज़फ़्फ़रपुर तो रोज़ का आना-जाना है, वहीं से मंगवा लेंगी. ठठेरा बार-बार ये कहते रहे, ओहो, जाउ न त मुजफरेपुर से मंगवा लेब, हम कहां कहइले कि हमरे से ले लिउ. हमरा जाए दिउ आउरो जगह जाए के हैं. मोलभाव में एक घंटा से भी ज़्यादा समय गुज़र गया. नतीजा वही रहा जिसका ठठेरे को संदेह था. चाचीजी ने कड़ाही नहीं ली.

Wednesday, October 17, 2007

मोबाइल फ़ोन के लिए कसरत


सात बज रहे होंगे. मैं दातून की तलाश में लल्ला (चचेरे चाचा) की घर की तरफ़ जा रहा था. तभी अचानक ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ आने लगी, ‘जोर से बोलिए न ... नहीं सुनाई दे रहा है आपका आवाज ... बोलिए न ... जोर से बोलिए न ...’ मैं इधर उधर ताकता रहा लेकिन मुझे पता नहीं चल पाया कि आवाज़ किधर से आ रही है. मैं अब लल्ला के घर की मुहार पर था. फिर एक बार वैसी ही आवाज़ आयी. मैं दो क़दम पीछे आया. देखा, रामदेव बाबा की छत पर कोई लड़का कान से सेलफ़ोन चिपकाए तेज़ क़दमों से इधर से उधर कर रहा था.

मैंने लल्ला के आंगन में मिनी जो लल्ला के बड़े भाई की पोती है, मेरी भतीजी लगती है – से कहा, ‘मिनी ए गो दतुअन दे न’. उसने हंसते हुए कहा, ‘जा, कहां है दतुअन! हम स त बरस से मुंह धोई छी.’ ‘जा, गांव में रहके तु स दतुअन न रखई छे. केहन बुड़बक छे गे हे’ कहकर मैं आंगन से निकलने लगा. तभी आंगन में घुसते हुए कान में जो आवाज़ आयी थी उसके बारे में मैंने मिनी से पूछ लिया. ‘काहे अतेक ज़ोर-ज़ोर से बोलइत रहलई ह ओई छत पर से कोनो?’ मिनी ने बताया, ‘फ़ोन पर न बतियाइत रहलई ह. न नु न मिलइत रहई छई फ़ोन. नेटबर्के न पकड़ईत रहई छई हालि.’ ‘ओ’ कहकर जाइए औरो केकरो घरे दतुअन खोजे कहकर मैं वहां से निकल पड़ा. ख़ैर, मुझे प्रभु बाबा के घर में जुलुम सिंह की मां से एक दातून मिली. उनसे दो-चार बातें करके मैं अपने दरवाज़े की ओर वापस आ गया. पर फ़ोन वाली बात रह-रह कर मेरे दिमाग़ में आती रही.

मेरे चचेरे भाई ने बताया कि मोबाइल पर बात करने के लिए गांव में बहुत कसरत करनी पड़ती है. उसने अपना ही उदाहरण दिया और कहा कि उसने अपने मोबाइल को कोने वाले कमरे में एक ख़ास स्थान पर रख दिया है. जब भी घंटी बजती है तो वहीं जाकर बात करते हैं उसके घरवाले. उसने यह भी बताया कि बात भी ख़ास ऐंगल से कान को गर्दन को मोड़कर ही करनी पड़ती है, अन्यथा बीच में ही फ़ोन कट जाता है. उसने बताया कि एक बार उसके मोबाइल की घंटी ख़राब हो गयी, यानि फ़ोन आने पर घंटी नहीं बजती थी. तब उसे फ़ोन सुनने के लिए ख़ास इंतजान करना पड़ा था. ‘एक थाली में पतली पेंदी वाली कटोरी उल्टा करके रखा और फिर कटोरी की पेंदी पर फ़ोन. फ़ोन का वायब्रेटर ऑन कर दिया. होता ये था कि जब भी कोई कॉल आता था तो वाइब्रेटर की वजह से कांप-वांप के फ़ोन कटोरी पर से नीचे थाली में गिर जाता था, फिर झनाक से आवाज़ आती थी और जो भी आंगन में होता था वो आके फ़ोन रिसीव कर लेता था. जब तक घंटी ठीक नहीं हुआ तब तक ऐसे ही चला.’

एक रात मेरे फ़ोन की घंटी बजी. देखा, बाबु लिखा आ रहा था. सुनने के लिए कुंजी दबाया और हेलो, हेलो करने लगा. अंदर कमरे में चाचा सो रहे थे. शायद हेलो, हेलो से आंख खुल गयी होगी. बोल पड़े, ‘बाहर चल न जो’ न त छत पर चल जो, उहां साफ़-साफ़ सुनाई देतउ अवाज.

अगले दिन मिनी के घर गया. पीढ़ा पर बैठा ही था कि निगाह छप्पड़ के अगले सिरे से टंगी सेलफ़ोन पर गयी. पूछा तो बताया उसने, ‘कखनियो घंटी बजई छई त सुनाई पड़ जाई छई आ अई तर नेटबर्को ठीक पकड़ई छई. ’

Tuesday, October 16, 2007

भयानक त्रासदी के भयावह अवशेष II

सपाटु वाली दाई का अंगना

बहुत दिनों बाद मैं गांव में था. अपने एक भाई के साथ मैं किसी दिशा में निकल रहा था. सपाटु वाली दाई के घर के बग़ल से गुज़र रहा था कि आवाज़ आयी, ‘डिट्टू तनी एन्ने आबे त (डिट्टू थोड़ा इधर आओ)’. ये आवाज़ कीचड़ में सनी एक 13-14 साल की लड़की की थी. डिट्टू ने बताया कि ये दाई की पोती है. मैं भी डिट्टू के सा‍थ उनके आंगन में गया. दाई अपने आंगन से कीचड़ साफ़ कर रही थी और वो लड़की डोल (छोटी बाल्टी) से आंगन का पानी निकाल रही थी. पूछने पर पता चला कि वो कीचड़ पिछले तीन महीनों के जल-जमाव का असर है.

दाई का छोटा लड़का रमेश जो रिश्ते में चाचा हैं, दीदी के साथ पढ़ते थे – चारपाई पर बैठे थे. कहा, ‘यहां रहते तुम तब पता चलता कि तीन महीना कैसे गुजरा है लोगों का इस गांव में. बाईस दिन लगातार मुसलाधार बारिश. साग-सब्ज़ी के लिए लोग तरस गया. आना-जाना सब बंद था. देख रहे हो न कि आज तक किस तरह कीचड़ जमा है...’ बात ख़त्म भी नहीं हुई थी कि दाई बोल पड़ी, ‘तीन महीना से जोना घर में सुतई जाई छई लोग ओही में खनो बनई छई. ओहु में कखनियो एन्ने से त कखनियो ओन्ने से टप-टप पानी टपकइते रहलई (तीन महीने से उसी घर में खाना बन रहा है जिसमें सब सोते हैं. उस पर भी कभी इधर से तो कभी उधर से, पानी टपकता ही रहा).’

जिस चूल्हे पर उनका खाना बनता था, आंगन में अब वो जीर्ण-शीर्ण हालत में है. दाई की पोती ने पहले डोल से बचा-खुचा पानी निकाला और उसके बाद दाई अब कीचड़ पर हाथ फेर रही थी. लिपाई कर रही थी. आंगन के चारो तरफ़ यानी टाट-फूस की झड़ी दीवार, नीचे की तरफ़ पर्याप्त सीलन और कहीं-कहीं जमी काई इस बात की गवाही देते हैं कि पानी में ये भी डूबे हुए थे. असोरा (गैलरी) की मिट्टी भी धंस रही थी. उस पर कुछ ईंटें रखी हुई थी, जिस पर पांव रखकर बारिश के दिनों में उनके घर के लोग एक कमरे से दूसरे कमरे में जाते थे. आंगन के बाहर जो चापाकल है उसका नीचला सिरा भी पानी में डूबा हुआ था. चापाकल से दो कदम दूर एक गबरा (गंदे पानी का जमाव) है जो उस दौरान उपट गया था. यानी उसका पानी भी आंगन में आया होगा. सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कितना मुश्किल रहा होगा उस चापाकल से पानी लेना और उसका इस्तेमाल करना! आज भी सड़ांध आती है आंगन से.

तमाम तरह के किटाणुओं और गंदगी के साथ जमे रहे दाई के परिवार वाले. दाई का घर और दरवाज़ा अच्छे दिनों में ख़ुशबूदार फूलों से महकता रहता था. बचपन के दिनों में हम चोर-सिपाही खेलते हुए उनके आंगन में छुपने चले जाया करते थे. दाई के चेहरे पर अब झुर्री आ गयी है. चौदह-पन्द्रह साल पहले नहीं थी. बस समानता एक ही है उनके तब और अब के चेहरे में. जितने सफ़ेद बाल तब थे उनके आज भी कमोबेश उतने ही हैं. दाई बच्चों में अपने उस सपाटु (चीकू) के पेड़ के कारण बहुत लोकप्रिय थीं जिसके बारे में तब ये सुना करता था कि ‘बरमसिया’ (बारहों महीने फलने वाला) है. वैसे तो दाई हम बच्चों को सपाटु ज़रूर देती थीं लेकिन न देने की स्थिति में बच्चे उनके सामने ही ढेले से तोड़ने से नहीं डरते थे. तब दाई बच्चों के पीछे दौड़ पड़ती थीं और जो बच्चा उनकी पकड़ में आ जाता था उसे उसकी मां के पास ले जाती थीं और शिकायत करती थीं. पीटती नहीं थीं. वो काम अकसर बच्चों की मां कर दिया करती थीं.

बहुत दिन हुए उस पेड़ के कटे. शायद ऐसी ही किसी बारिश में या बाढ़ के दिनों में जलावन के लिए उसे काटा गया होगा. पता नहीं इस बरसात में दाई ने जलावन का इंतजाम कैसे किया होगा!

Sunday, October 7, 2007

भयानक त्रासदी के भयावह अवशेष

6 अक्टूबर

आंखें मलते हुए जब सुबह उठा तो कम्बल-तकिए वाले ने कहा, 'सर पटना जंक्शन उतरिएगा न ? बस आ गया, सामान तैयार कर लीजिए.' फटाफट अंगौछा बैग में घुसेड़ा और बेसिन पर जाकर आंखों में पानी झोंका. रेल प्लेटफ़ॉर्म पर आ चुकी थी. ग़लती से सामने की तरफ़ निकल गया. बस स्टैंड के लिए ऑटो नहीं मिल रहा था. दो-एक ऑटो वाला राजी भी हुए तो ज़्यादा पैसे की मांग की. आखिरकार एक रिक्शावाले ने बताया, 'इस सामने जो गल्ली देख रहे हैं, उधरे से निकल जाइए. ओ पार ढेर टेम्पु वाला मिलेगा.' वही किया. ऑटो भी मिला और मैं बस स्टैंड आ गया. मधुवनी जयनगर आवाज़ लगाते एक कंडक्टर/हेल्पर ने पूछा, 'कहां? कहां जाना ?' मुज़फ़्फ़रपुर सुनने के बाद उसने कहा, 'आइए-आइए. समुच्चा सीट त खालिए है. बइठिए, बस अब चलने ही बाली है. टाइम हो गया है.' मैं दाखिल हो गया.

थोड़ी देर में एक आदमी आया और मेरे सामने उस बक्से को खोलकर उसने एक सीडी की पन्नी रखी जिसमें टेलीविज़न रखा था. एक-बार बग़ल में रखे रिमोट से कुछ-कुछ करने के बाद उसने कहा, 'कहां है साला सोहना, बहानचोद मोबाइल चार्ज करता है, अब इ सीडी चलिए नहीं रहा है.' चंद सेकेण्ड में ही वो आदमी आ गया और यह जानकारी ले लेने के बाद कि दिक़्क़त क्या है, अपनी उस्तादी करने लगा और सीडी चालू. दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे हाजीपुर तक मैंने भी देखा. बीच-बीच में कभी-कभार ध्यान इधर-उधर गया वर्ना बड़ी तल्लीनता से देखता रहा था. हाजीपुर में दाखिल होते ही बड़ी त्रासदी के अवशेष दिखने लगे. रेलवे क्रॉसिंग के ठीक बग़ल मे जो नवोदय विद्यालय है, उसके हाते में अब भी 3-4 फ़ीट के क़रीब पानी जमा था. आगे बढ़ने पर देखा - जेल और कचहरी परिसर जलमग्न. थाना भी सड़क पर ही. मेज़-कुर्सी लगाकर बैठे दारोगा साहब और उनके अगल-बगल खड़े दो-चार सिपाही. कहीं-कहीं सड़क पार करता पानी का धार.

ये तब की बात है जब लोग कह रहे हैं बाढ़ समाप्त हो गया है. 75-80 किलोमीटर की दूरी तय करने में बस को क़रीब साढे तीन घंटे लगे, और ऐसा भी नहीं कि पूरा रास्ता ख़राब हो. जगह-जगह जाम. सड़क किनारे बसे कुछ टोलों और गांवों को देखकर बेहद हैरानी हुई. पांच फ़ीट से भी ज़्यादा पानी में कुछ खड़े और कुछ लुढ़के टाट-फूस के घर. किसी की छप्पर झुकी हुई तो किसी की पानी में औंधी पड़ी. लोग कहां गए, सीट पर बैठा सोचता रहा. पर जब कहीं-कहीं सड़क किनारे साड़ी, लुंगी और कटी-फटी प्लास्टिक से तनी सिरकियां दिखीं तो लगा जिन्दा हैं लोग शायद. कहीं-कहीं ऐसी सिरकियां रेलवे लाइनों के किनारे भी दिखे. दरअसल, रेलवे लाइन ही सबसे उंची जगह नज़र आ रही थी.

मुज़फ़्फ़रपुर पहुंचने से थोड़ी देर पहले इन दृश्यों को कैमरे में क़ैद करने की बात ध्यान आयी. पर काफ़ी देर हो चुकी थी और कई बार लगा कि मैं उल्टी तरफ़ बैठा हूं. फिर भी एक-आध तस्वीरें ले पाया, जो इस पोस्ट के साथ लगा रहा हूं.

क्रमश: