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2.11.09

लोकतंत्र की लाज ...

मोहल्ला लाइव पर टीवी पत्रकार आशुतोष का एक लेख
सर कलम करने की विचारधारा शीर्षक से छपा है,
जिस पर अभी-अभी मैंने अपनी प्रतिक्रिया वहां छोड़ी है.
उसी प्रतिक्रिया को मैं अपने पाठक मित्रों के लिए यहां पुनर्पेश कर रहा हूं.


विश्‍वसतसूत्र और क्‍या कहते हैं पता नहीं. पर आशुतोष जैसे लोगों की पत्रकारिता को कम से कम लोकतंत्र की रक्षा में ज़रूर खड़ा होना चाहिए. सारे के सारे लोकतंत्र के ‘वकील’ दो दिन पहले बता रहे थे कि इंदिरा को उनके दो सुरक्षाकर्मियों ने किस किस तरह से गोली मारी और किस तरह सोनिया गाउन में ही दौड़ी, फोतेदार दौड़े, धवन दौरे … एंबुलेंस की गैरमौजुदगी में … कार से तमाम लालबत्तियों को पार करके एम्‍स ले जाया गया गोलियों से छलनी मैडम गांधी को जो बाद में शहीद के शव में तब्‍दील हो गया….
भाई-बहनजी लोग उस दिन सुबह से ही चालू हो गए थे. दिन भर इनका तांडव चलता रहा.

मेरे जैसा बकलोल नागरीक देश-दुनिया की खबर देखना चाह रहा था, जानना चाह रहा था कि दो शाम पहले जयपुर के तेल डिपो में लगी आग की क्‍या हालत है, 6 साल की वो जो लड़की अपने मां-बाप से बिछुड़ गयी थी और मां-बाप दहाड़ मार कर जो रहे थे उनकी स्थिति में क्‍या कुछ बदलाव हुआ है या कुछ हुआ ही नहीं, इस अग्निकांड के पीछे तेल माफिया तो नहीं है, या फिर चटकारे लेकर मुनिरका में पूर्वोत्तर की एक लड़की की बलात्‍कार-हत्‍या को जो ख़बर चंद रोज़ पहले दिखाई थी उस केस में कितनी प्रगति हुई है, और नहीं तो कम से कम आज कल वे सरदार परिवार कैसे जी रहे हैं जिनके घर के बुजुर्गों और जवानों को दिल्ली की सड़कों पर जिंदा आग के हवाले कर दिया गया था या जिनकी पेट से होकर कृपाण गुज़ार दिया गया था. रातोंरात विधवा और अनाथ बना दी गयी उन औरतों और बच्‍चों का जीवन कैसे चल रहा है …

आंध्र के उस आकाश के नीचे जहां मुख्‍यमंत्री रेड्डी का हवाई जहाज लापता बताया गया उसके जमीनी इलाके के बारे में सारे लोकतंत्ररक्षी पत्रकारों ने गला फाड़-फाड़ कर बताया और ग्राफिक्‍स के ज़रिए बताया कि कैसे वहां कभी सरकारी अमला पहुंचा ही नहीं और कैसे वो नक्‍सलाइट एरिया है; भइया कभी गए हो नहीं, तुमने पहले कभी उस एरिया का नाम लिया नहीं और अचानक तुम्‍हें वो पूरा का पूरा इलाक़ा नक्‍सलाइट दिखने लगता है! जियो उस्‍ताद! है नहीं वर्ना तत्‍काद दो-चार कट्ठा ज़मीन तुम्‍हारे नाम कर देते. पत्रकारिता देखिए, नेता के मुंह में अपनी बात ठूंस को बोकरने के लिए फोर्स करते थकते नहीं हैं, पिछले दिनो ऐसे ही एक पत्रकार अरुणाचल प्रदेश पहुंच गए और वहां के किसी लोकल नेता से हालिया चीनी अग्रेशन पर उनकी राय खुद बताने लगे जिससे अंत तक नेताजी अपनी असहमति जाहिर करते रहे. देखिए ज़ीरो से राज ठाकरे को हीरो बना दिया, चटक-मकट ऐसे पेश करते हैं मानो सचमूच की ख़बर दिखा रहे हों. ‘कॉमेडी सर्कस’ के डायलॉग और ‘बिग-बॉस’ की बत्तीसियों पर बुलेटिन तैयार कर देते हैं जबकि राखी के स्‍वयंवर को प्राइम टाइम का हेडलाइन.
एक ‘स्‍पेशल’ बना देते विदर्भ, पंजाब या आंध्र के ही किसानों की आत्‍महत्‍या पर! चाहे नितीश बाबु के राज में क्राइम, करप्‍शन, कमिशनख़ोरी और कनबतियों की क्‍या स्थिति रही; इसी पर स्‍पेशल रिपोर्ट बना देते. बताते कि मोदीजी के यहां जो मुसलमान काटे, भोंके, जलाए, उजाड़े गए थे उनके सर्वाइवरों का क्‍या हुआ! एक दिन थोड़ा दिखा देते कि बाहरी दिल्‍ली की जिन दो-चार पुनर्वास बस्तियों में कुछ दिन पहले चिकनगुनिया फैली थी, वहां इलाज-बात की क्या व्‍यवस्‍था हो पाई है. या ये बताते कि कैसे आनन-फानन में कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स की तैयारी के बहाने ग़रीब-गुर्बा को शहर के फुटपाथों, गलियों और सार्वजनिक पार्कों से खदेड़ा जा रहा है, कैसे मिठाई पुल के नीचे एक औरत खुले आसमान में बच्चा जनती है! कैसे यहां का कोई पुलिसकर्मी बावर्दी बिना हेल्मेट के मोटरसाइकिल की सवारी करता है और कैसे साहब के सामने हवलदार रिक्‍शा पलटकर उसकी रिम पर हुमचता है और रिक्‍शा वाले के मां-बहन के साथ सरेआम संबंध स्‍थापित करता है या कर लेने की धमकी देता है! क्‍यों जाएगा इन बातों पर ध्‍यान, ये सब तो लोकतांत्रिक आदर्श हैं! होते रहना चाहिए चहल-पहल बना रहता है! वैसे भी ग़रीबों का काम तो टहल-उहल करते रहना होता है क्‍या करेगा वो गरिमा और आत्‍मसम्‍मान जैसी सभ्‍यता के प्रतीकों का! वो तो मेट्रो और फ़्लायओवरों के निर्माण के दौरान हादसों का शिकार होकर बुनियाद मजबूत करने के लिए होते हैं, खुले आसमान में सोने के लिए होते हैं, सोते हुए सड़क पर कुचल दिए जाने के लिए होते हैं.

कभी नर्मदा घाटी से, कभी नेतरहाट से, कभी गुमला और खूंटी से जबरन खदेड़ने के लिए होते हैं. उनकी ज़मीन पर उनका हक़ क्‍यों हो! ज़मीन रख कर ही क्‍या कर लिया सालों से! बना दो बांध, दे दो इत्तल-मित्तल, जिंदल-उंदल को. कुछ में फैक्‍ट्री लगा देंगे और कुछ लोहा-उहा निकालने की जगह हो जाएगी. क्‍या कहे , आदिवासियों की ज़मीन उनसे पूछे बिना नहीं ले सकते ? बड़ा उलझाउ काम है? होगा उलझाउ, पर पूछना क्‍यों है. क़ानून? धत्त तेरे की, उसकी धज्‍जी न उड़ेगी तो संविधान की इज्‍जत कितने पैसे की रह जाएगी! चूं-चपड़ होने पर देखे नहीं कैसे-कैसे सलटा दिए जाते हैं. देखे नहीं कैसे बस्‍तर में कैसे-कैसे सिखाए जाते हैं पाठ ऐसे लोगों को. कमल पासवान एक साधारण जेपीआइट थे, कैसे सन् 1989 में अपने भाषण में कहते थे कि 80 साल के बुधन महतो के गुप्‍तांग में दबंगों ने लाठी घुसेड़ दी थी …

तात्‍पर्य ये कि ग़रीबों के साथ होने वाली हिंसा की गिनती कुछ और में होनी चाहिए पर पुलिस कमिश्‍नर साहब के कुत्ते का डाक्‍टरी ज़रूर होना चाहिए क्‍योंकि कुछ घंटों के लिए बेचारा घर से बाहर था! लाज देखिए लोकतंत्र के प्रहरियों का, हर ख़बर के साथ ब्रेकिंग न्‍यूज़ का पट्टा टांगे रहते हैं. और तो और पीआईबी में हो रही किसी प्रेस कॉन्‍फ्रेंस का लाइव प्रसारण भी इनके हिसाब से ब्रेकिंग न्‍यूज़ होता है.

रही बात भैया लेनिन की चिट्ठी और माओ की हिंसा की, तो मैं भी इस पर और खुलासा के पक्ष में हूं. कुछेक और प्रमाण हो तो सबको साथ लेकर एक लंबा आलेख पेश किया जाए और बाक़ायदा संदर्भ दिया जाए ताकि ज़रूरत पड़ने पर इस्‍तेमाल किया जा सके!

20.4.09

इ कौन-सी डिमोक्रेसी है सरजी

सिर्फ़ प्रोमो ही देख पाया था. पूरी बातचीत तो बीते इतवार को दस बजे रात को आना था रजत शर्मा वाली 'आपकी अदालत में'. पर जितना देख सका, उससे ज़ाहिर हो गया कि जगदीश टाइटलर को गहरा ठेस लगा है. उनकी आंखों में पानी आ गया था. सुबक भी रहे थे. सुबकते हुए उन्‍होंने सिखों के साथ 84 में हुई ज्‍़यादती के लिए माफ़ी भी मांगी थी. बात आगे बढ़ाने से पहले यह साफ़ कर देना अच्‍छा रहेगा कि मेरी मंशा जगदीश टाइटलर को दोषी या दोषमुक्‍ती का प्रमाणपत्र देना कदापि नहीं है. मुझे नहीं मालूम कि टाइटलर साब कितने दोषी हैं और कितने नहीं. कितने सरदारों का कत्‍ल उन्‍होंने किया और कितनों को ऐसा करने को उकसाया, कितने घर उन्‍होंने ख़ुद फूंके और कितने फुंकवाए... बस मैं तो अपनी स्‍मृतियों को खंघालते हुए कुछ दृश्‍यों के ज़रिए अपनी समझ साझा करने की कोशिश भर करूंगा.

उन दिनों मैं उत्तर बिहार के पूर्णियां शहर में एक आश्रमनुमा स्‍कूल में पढ़ता था, जो उस स्‍कूल के तत्‍कालीन प्रधानाध्‍यापक सच्चिदा बाबू के स्‍कूल के नाम से जाना जाता था. सच्चिदा बाबू ने अपनी सेवानिवृति के बाद अपने ही अहाते में कुछ कमरे बनवाकर उसे स्‍कूल सा शक्‍ल दे दिया था और उनके परिचितों और शिष्‍यों के बच्‍चे वहां ज्ञानार्जन करते थे. ज्‍़यादातर बच्‍चे रहते भी वहीं थे. यानी हॉस्‍टल में. हमारे सच्चिदा बाबू सत्‍याग्रह वगैह में गांधी के साथ रहे थे और कई बार बापू के किस्से सुनाते-सुनाते वे फफक पड़ते थे. माने पक्‍के कांग्रेसी थे. गप-शप (हमारी पढाई-लिखाई इसी शैली में होती थी) के दौरान कई बार वे इंदिराजी की बहादुरी के किस्‍से भी सुना डालते थे. लिहाज़ा अक्‍टूबर 1984 की ही किसी दोपहरी में जब रंगभूमि मैदान में इंदिराजी की जनसभी हुई, तो वे हम बच्‍चों को भी उनका भाषण सुनाने ले गए. याद है उस दिन इस्‍त्री वाली हाफ़ पैंट और कमीज़ बहुत दिनों बाद धारण किए थे बच्‍चों ने. मेरे जैसे कुछ बच्‍चों ने चानी पर कड़ुआ तेल भी थोप लिया था. बस, चप्‍पल फटफटाते बच्‍चे लाइन-बाज़ार के आस पास से पैदल ही पहुंच गए थे रंगभूमि मैदान. याद नहीं है क्‍या-क्‍या बोला था इंदिराजी ने, केवल उनके आधे सफे़द और आधे काल बाल ही याद हैं.

शायद छठ की छुट्टी से लौटे थे धमदाहा से. मेरी फुआ का कामत था वहां. हॉस्‍टल आने पर पता चला कि इंदिराजी को उनके अंगरक्षकों ने गोली मार दी. हॉस्‍टल में सन्‍नाटा पसरा था. हेडमास्‍टर साहब सच्चिदा बाबू बार-बार गमछा से आंखे पोछते रहते थे. हमारी पढ़ाई-लिखाई भी बाधित हो गयी थी. पता नहीं अचानक कहां से पंजाबियों (सरदारों) पर आफत आ पड़ी. फारबिसगंज मोड़ से कचहरी के रास्‍ते में एक 'पंजाब टेंट हाउस' था, रातोंरात उसने बोर्ड पर 'भारत टेंट हाउस' लिखवा लिया. हमारे स्‍कूल के क़रीब ही तत्‍कालीन पूर्णिया शहर के गिने-चुने खू़बसूरत घरों में से एक सरदार मंगल सिंह के घर पर ताबड़तोड़ बमबारी कर दी थी किसी ने. सरदार साहब के परिवार की औरतें बदहवास रोती जा रही थीं. अच्‍छी तरह याद है तब तमाम ग़ैरसरदार न केवल तमाशा देख रहे थे बल्कि सरदारों के खिलाफ़ अफ़वाहों की खेती कर रहे थे. रोज़ नए-नए अफ़वाह! बचपन के आंकलन के मुताबिक तब शहर के ट्रांसपोर्ट व्यवसाय में सरदार ही सबसे आगे थे. शायद वो दिलवाड़ा सिंह थे 'ऐतियाना' वाले, और एक और सिख बस व्‍यवसायी थे. हमारे स्‍कूल में ही किसी बच्‍चे ने कहा था कि दिलवाड़ा सिंह ने अपने अहाते में 50 आतंकवादियों को छुपा रखा है, उनके पास रडार-वडार सब कुछ है. वे लोग डीएम और एसपी को उड़ाने वाले हैं ... महीनों ऐसी अफ़वाहें उड़ती रही थीं.उन्‍हीं दिनों दिसंबर-जनवरी या फरवरी में राजीव गांधी की जनसभा होने वाली थी, अफवाह सुनी, 'फलां सरदार ने अपने छत पर ही मशीनगन सेट कर लिया है, अपने घर से ही भाषण वाले मंच पर राजीव गांधी को टीक देगा.उसके बाद का राजनीतिक घटनाक्रम याद दिलाना मेरे ख़याल से ज़रूरी नहीं है.

एक-आध बातें जो ज़हन में आ रही हैं वो ये कि तब कांग्रेस के लोग इस क़दर भावुक हो गए थे कि वे सही-ग़लत का निर्णय न कर सके. आम लोगों में इंदिरा गांधी की हत्‍या को लेकर रोष था जिसका नाजायज फायदा दंगाइयों ने उठाया. हिन्‍दु कट्टरपंथियों ने कांग्रेस के कुछ लफुओं को आगे करके अपने मन माफिक काम किया जिसका प्रमाण तत्‍काल बाद वाले चुनाव में कांग्रेस का समर्थन करके उन्‍होंने दिया. तब के कई कांग्रेसी आज संघ के विभिन्‍न मंचों और संगठनों के मार्फ़त अपना काम कर रहे हैं. कुछेक विधायक, सांसद और मंत्री भी बनने में कामयाब रहे. मेरे ख़याल से पूर्णिया की तत्‍कालीन सांसद माधुरी सिंहा के सुपुत्र पप्‍पू सिंह ने भी उत्तरार्द्ध में शायद ऐसा ही कुछ किया.

अपनी बात समेटते हुए मैं बस यही कहना चाहूंगा कि दंगाइयों का एक तबक़ा चुनाव से बाहर कर दिया जाए और दूसरा प्रधानमंत्री बनने और बनवाने के लिए अखाड़े में ताल ठोकता रहे. मेरे खयाल से नेचुरल जस्टिस इसे तो नहीं ही कहा जा सकता. इ कौन-सी डिमोक्रेसी है सरजी.

16.4.09

पीत चट्टी प्रहारक केसरिया कार्यकर्ता

जाते-जाते पूर्व अमेरिकी राष्‍ट्रपति श्रीमान् बुश महोदय मुंतज़र अल ज़ैदी के जूतों से बच निकले. दुनिया को समझते देर न लगी कि ज़ैदी ने ये तोहफ़ा क्‍यों दिया बुश को! विगत दिसंबर से अब तक दुनिया भर में कई नेताओं पर जूते उछाले गए. मज़े की बात ये कि पिछले आठ-दस दिनों में जितने जूते भारतीय नेताओं पर उछाले गए उतने कभी और दुनिया के किसी अन्‍य हिस्‍से में न उछाले गए.

पिछले हफ़्ते जागरणी जर्नलिस्‍ट जरनैल सिंह ने चितंबरम जैसे धाकड़ नेता पर जूते उछाले. चिदंबरम सर को किसी प्रकार की चोट नहीं आयी और उन्‍होंने गांधी की राह पर चलते हुए जरनैल को माफ़ कर दिया. पर दिल्‍ली के दो दिग्‍गज आज भी रह-रह कर जरनैली जूते की चोट को सहलाने लगते हैं. बेचारों का राजनीतिक जायक़ा ख़राब हो चुका है. न जाने कब तक इन्‍हें राजनीतिक पनाह की बाट जोहनी पड़ जाए. 1984 में इंदिरा अम्‍मा की हत्‍या के बाद राजधानी में सिख विरोधी दंगे भड़काने के आरोपी इन दोनों कांग्रेसी नेताओं की टिकटें न कटतीं तो ख़ुद कांग्रेस को चुनाव परिणाम से प्राप्‍त होने वाली कुल सीटों में दो और का इज़फ़ा तय माना जा रहा था. यानी संभव है कि जरनैल के जूते का असर भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस पर पड़ जाए.

दिल्‍ली से चले जरनैली जूते चंद रोज़ बाद कुरुक्षेत्र पहुंचे. अबकी ये सख्‍़त सोल वाले मास्‍टरी थे और इसकी जद में आए देश के जाने-माने उद्योगपति, शौकिया पोलो खिलाड़ी और निवर्तमान कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल साहब. जिंदल साहब वही हैं जो दिल्ली हाई कोर्ट से आदेश प्राप्‍त करने के बाद हमेशा अपनी जेब पर तिरंगा टांगे रहते हैं. पर ये जूते नियत डेस्टिनेशन से पहले ही गुरुत्‍वाकर्षण के नियमों के चंगूल में फंस कर चंद क़दम की दूरी पर वापस धरती को ही कुछ चोट पहुंचा गए. उसके बाद स्‍थानीय लोगों (कुछ लोगों के मुताबिक़ कांग्रेसी कार्यकर्ताओं) ने सरकार से क्षुब्‍ध सेवानिवृत्त उस मास्‍साब पर न्‍यूटन के तीसरे नियम का पालन करते हुए तब तक लात-घुसों की बारीश करते रहे जब तक कि पुलिस न आ गयी. शाम को टेलीविज़न पर ख्‍़ाबर देखते हुए ज्ञात हुआ कि जिंदल साहब ने मास्‍साब का लिहाज़ करते हुए उन पर कोई मुक़दमा दायर नहीं करवाया है, हां पुलिस अपनी कार्रवाई करने के लिए आज़ाद है जो कि होकर रहेगी.

कल पता चला कि बीते कुछ दिनों में कुछ हज़ार किलोमीटर का सफ़र तय करके कुछ जूते मध्‍यप्रदेश की सीमा में प्रवेश कर गए हैं. पता ये भी चला कि कुछ ने तो अपनी शक्‍ल भी बदल ली है. प्रधानमंत्री बनने के लिए उतावले माननीय लालकृष्‍ण आडवाणी जी पर जो चरण पादूका कल कटनी में उछाली गयी थी दरअसल टेलीविज़न स्क्रीन पर देखने से वो दादाजी के ज़माने की पीत चट्टी प्रतीत हो रही थी. लकड़ी के सोल पर रबर की पट्टी लगी इस प्रकार की चट्टी को जानकार धार्मिक दृष्टि से बेहद शुद्ध और पवित्र मानते हुए खड़ाउं की श्रेणी में रखते हैं. 'पंडिताई' की शुरुआत में रंगरुटिए को चट्टी पहनने की ही सलाह दी जाती है क्‍योंकि सीधे पैर की उंगलियों में खड़ाउं का अंकुसा फंसाने भर की कोशिश से ही पैर के चोटिल हो जाने का ख़तरा बना रहता है. बचपन में ऐसी चट्टियों पर हम खेल-कूद कर घर लौटने के बाद पैर धोया करते थे.

कल समाचारों से ज्ञात हुआ कि भारत के पूर्व गृहमंत्री, एक समय यहीं के उपप्रधानमंत्री, निवर्तमान लोकसभा में विपक्ष के नेता और आज प्रधानमंत्री बनने के लिए अधीर व व्‍याकुल वृद्ध माननीय लालकृष्‍ण पर उस पीत-चट्टी का प्रहारक उनकी ही पार्टी का कार्यकर्ता था (हालांकि भारत के दो बड़े राजनीतिक दलों में परिस्थितियों व पारिवारिक पृष्‍ठभूमियों के हिसाब के कुछ नौजवानों के लिए कार्यकर्तागिरी करना आवश्‍यक नहीं रह गया है. उदाहरण के लिए सिंधिया व गांधी परिवार से संबद्ध राजनीतिपसंद लोग) वैसे जब पुलिस उसके कमर में हाथ डाल कर ले जा रही थी उस वक्‍़त उसने अपने गले पर पीतांबरी अंगवस्‍त्र (या कहिए कि थोड़ा गाढ़ापन लिए) धारण किया हुआ था.

यहां उद्देश्‍य उपर्युक्त वर्णित जूतेबाज़ी के चारों उदाहरणों से कुछ सबक निकालना है. मुंतजर के जूते अमेरिका के हाथों इराक की हुई बर्बादी के विरोध में थे, जरनैल के जूते 84 के दंगा-पीडितों के साथ हो रही नाइंसाफ़ी की मुखालफ़त कर रहे, मास्‍साब के जूते हरियाणा सरकार के प्रति उनके आक्रोष का प्रतिविंबन कर रहे थे. यहां तक तो बात समझ आ रही है, पर कटनी में आडवाणीजी पर चट्टी का प्रहारक तो संघ संप्रदाय का ही हिस्‍सा था. उस भले आदमी ने ऐसा क्यों किया?

मेरी शंकाएं इस प्रकार निम्‍न हैं :
  • आडवाणीजी उन्‍हें पसंद न हों,
  • आडवाणीजी के क्रियाकलाप उन्‍हें पसंद न हों,
  • आडवाणीजी ने कभी कोई ऐसा अपराध किया हो जिसका दंड वे भरी सभा में देना चाह रहे हों,
  • आडवाणीजी ने कभी किसी तरह उनका अपमान किया हो, जिसका बदला लेने का वे मौक़ा तलाश रहे हों,
  • आडवाणीजी के मन में कोई खोट हो,
  • आडवाणीजी की कथनी और करनी में नाबर्दाश्‍तग़ी की हद तक उन्‍होंने फ़र्क़ महसूस किया हो,
  • आडवाणीजी से संरक्षणप्राप्‍त नेताओं से उन्‍हें चीढ हो,
  • आडवाणीजी ने उनसे कभी कोई कोई वायद किया हो और बाद में मुकर गए हों,
  • आडवाणीजी के हस्‍तक्षेप से उनको कभी मिलने वाला चुनावी टिकट कट गया हो,
  • आडवाणीजी का पाकिस्‍तान में जिन्ना के मज़ार पर कशीदा पढ़ना उन्‍हें चुभ गया हो,
  • आडवाणीजी का राम के नाम परा वोट मांग कर राम का घर आज तक न बनवा पाना उन्‍हें सालता रहा हो,
  • निवर्तमान संसद में आडवाणीजी का सार्थक हस्‍तक्षेप न देख कर क्रोध आ गया हो,
  • आडवाणीजी की लिडरई में भाजपा द्वारा जबरन हिन्‍दुत्‍व का ठेका हथिया लेने पर हज़ारों हिन्‍दुओं की तरह उनकी आस्‍था पर भी चोट पहुंची हो,
  • आडवाणीजी की लिडरई में 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्‍वंस उन्‍हें नागवार गुज़रा हो,
  • आडवाणीजी का वाजपेईजी के कैबिनेट पर दूसरे नंबर पर होने के बावजूद उड़ीसा में ग्राहम स्‍टेंस और उनके दो बच्‍चों को बजरंगियों द्वारा जिंदा जला देने पर भी आडवाणीजी का चुप्पी साधे रखना उन्‍हें याद आ गया हो,
  • आडवाणीजी के गृहमंत्री रहते देश के विभिन्‍न हिस्‍सों में ननों के साथ हुए बलात्‍कार को उन्‍होंने धर्म के खांचे में बांटकर देखने के बजाय स्‍त्री जाति और मानवता पर हमला मान लिया हो,
  • आडवाणीजी की भागीदारी वाली सरकार के दिनों में गुजरात में वहां की सरकार के नेतृत्‍व में मुसलमानों के नरसंहार का दृश्‍य उन्‍हें याद आ गया हो,
  • आडवाणीजी की भागीदारी वाली सरकार के दौर में झज्‍जर में गोहत्‍या का आरोप लगाकर दलितों की मार देने की घटना एक बार फिर उनके ज़हन को झकझोर गयी हो,
  • आडवाणीजी की भागीदारी वाली सरकार के दिनों में ग़रीबों पर हुए अत्‍याचार के नमूने उनके नज़र में नाच गए हों,
  • आडवाणीजी द्वारा भारतीय संविधान की अक्षुण्‍ण्‍ता बनाए की सौगंध खाने के बाद अपने देश का नाम हिन्‍दुस्‍थान उच्‍चारित करना उन्‍हें बिल्‍कुल नागवार गुज़रा हो,
  • आडवाणीजी द्वारा हाल में वरूण गांधी वाले प्रकरण में वरूण को निर्दोष करार दिये जाने से वे क्षुब्‍ध हों,
  • आडवाणीजी द्वारा अचानक बीच चुनाव में काले धन की बात करके असली मुद्दे से जनता को बरगलाना उन्‍हें न भाया हो क्‍योंकि पिछले पांच साल जब वे विपक्ष के नेता थे तब उन्‍होंने एक बार भी इस मसले का संसद के किसी सदन में न ख़ुद उठाया और न ही किसी से उठवाया,
  • आडवाणीजी के उस विज़न से उन्‍हें दिक़्क़त हो जिससे भारत में तानाशाही को बल मिलता हो.
बहरहाल, प्रधानमंत्री पद कब्‍जाने को आतुर माननीय लालकृष्‍ण आडवाणी पर पीत चट्टी से प्रहार करने वाले पीत अंगवस्‍त्रधारी केसरिया कार्यकर्ता ने उपर वर्णित कारणों में से किसी एक, या एक से अधिक या सभी कारणों से ऐसा किया हो; या किसी अन्‍य कारणवश्‍ा ऐसा किया हो - मेरे हिसाब से लोकतंत्र में ये नाकाबिल-ए-बर्दाश्‍त है. ऐसी किसी भी घटना की जितनी भी निंदा की जाए कम है.
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17.12.08

यानी आडवाणीजी रामद्रोही भी हुए?

मुझे लगा कि आगे बढ़ने से पहले कुछ मित्रों की भ्रांतियों को दुरुस्‍त करने की एक और कोशिश कर ली जाए. सिलसिलेवार ठीक रहेगा.

कल मैंने ये लिखा कि आतंकवाद से निबटने के लिए जो भी क़ानून अपने देश में बनाए जाएंगे उसके तहत अगर सबसे पहले आडवाणीजी पर कार्रवाई होगी तो मुझ जैसे टैक्‍सपेयर को बड़ी तसल्‍ली होगी और देश में अमन-चैन को भी बढ़ावा मिलेगा. और ये मेरा प्रस्‍ताव था. जिस पर मैं आज भी क़ायम हूं. और आपलोगों ने इसे पता नहीं किन-किन रिश्‍तेदारियों में ढालने की कोशिश की. मेरे लिए तर्क यानी दलील अलग चीज़ है और रिश्‍तेदारी अलग. और शायद तमाम विवेकशील लोग मेरी इस राय से सहमत होंगे. आप ज़रूर अपने लिए इसे किसी रिश्‍तेदारी की चीज़ मानें. हां, जहां तक रिश्‍तेदारी की बात है तो मैं ख़ुद को वसुधैव कुटुम्‍बकम वाली जमात का मानता हूं.
आडवाणीजी की फिरकापरस्‍त गतिविधियों की चर्चा करना देशद्रोह हुआ, क्‍यों भाई? कौन नहीं जानता कि आडवाणीजी उस राजनीतिक वंश के बूढ़े बरगद ठहरे जिसका ताल्‍लुक़ कभी भी देशहित के बारे में विचारने या करने से नहीं रहा. जी हां, मैं राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की ही बात कर रहा हूं. पुराना ही सवाल दोहरा रहा हूं : बता सकते हैं आप कि आज़ादी के आंदोलन के दौरान आडवाणी या संघ से जुड़े किसी भी सख्‍़स ने बलिदान किया हो? मित्र आप (यानी संघ परिवार के विभिन्‍न घटक) तो पैदा होते ही हिन्‍दू राष्‍ट्र के चक्‍कर में पड़ गए, या आपको पैदा ही इसलिए किया गया. आपको भारत की आज़ादी या आज़ाद भारत की फिक्र करने का मौक़ा कहां मिला! आपका दोष नहीं है. थानेदार को माफ़ीनामा देकर कौन कैसे भागा और कैसे आज़ादी के आंदोलन में शामिल लोगों के बारे में अंग्रेज़ों को जानकारी दी जाती रही, नहीं जानते हैं आप? आपको जानना चाहिए. कम से कम अपना इतिहास तो आपको क़ायदे से जानना चाहिए.
ये बताने की बार-बार ज़रूरत क्‍यों होनी चाहिए कि देशद्रोही क़रार दिए जाने की पात्रता आडवाणीजी के पास है. अंग्रेज़ों से लड़कर, करोड़ों कुर्बानियां देकर हमारे स्‍वतंत्रता से‍नानियों ने जो देश हमें दिया वो एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्‍य है. चाहें तो प्रस्‍तावना पर एक नज़र मार लें. किसी ख़ास धर्म, समुदाय, रंग, लिंग या क्षेत्र के प्रति पक्षधरता हो हमारे संविधान का, ऐसा उल्‍लेख तो नहीं मिलता उस किताब में जिसे डॉ. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने बनाया था और जिसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया. वही 26 जनवरी जिस दिन समूचा देश गणतंत्र दिवस मनाता है. हमें ये दिन इसलिए भी याद है कि इस दिन स्‍कूल के प्रधानाध्‍यापक श्री लक्ष्‍मीनारायण ठाकुर को झंडोत्तोलन के तुरंत बाद एनसीसी द्वारा पेश किए जाने वाले गार्ड ऑफ़ ऑनर का निरीक्षण करने के लिए मैं आमंत्रित करता था. और इस रस्‍म के बाद थोड़ा भाषण-वाषण और फिर नयी बिल्डिंग में सीढियों के बग़ल में हम बच्‍चों के बीच जलेबी वितरण कार्यक्रम होता था. हमारे रोएं खड़े हो जाते थे जब हम अपने स्‍वतंत्रता सेनानियों के बारे में सुनते थे. पर मित्रों, तब से लेकर अब तक एक भी बार आपके संघ से जुड़े किसी नेता के नाम के साथ 'अमर रहें' न हमसे बोलवाया गया और न हम बोल पाए.
हां तो कह रहा था कि आडवाणीजी देशद्रोही क़रार दिए जाने की पर्याप्‍त पात्रता रखते हैं. चाहें तो देशद्रोह की परिभाषा पर आप स्‍वयं एक निगाह डाल लें. वो ऐसे कि हमारे देश के नाम का जान-बूझकर ग़लत उच्‍चारण करते हैं, जिससे यह घ्‍वनित होता है कि यह देश किसी धर्म विशेष का है, इससे हमारे संविधान का ही नहीं, उन करोड़ों स्‍वाधीनता से‍नानियों का अपमान होता है जिन्‍होंने इस देश को आज़ाद करने के लिए बेहिसाब यातनाएं झेलीं और अपने जान न्‍यौछावर किये. वैसे तो इस मुल्‍क में आज तक किसी ने ऐसी ज़ुर्रत की नहीं लेकिन सेकेंड भर के लिए यह मान लें कि कोई इसे कृश्चिस्‍थान, सिखिस्‍थान, इस्‍लामिस्‍थान, बु‍दिस्‍थान, जैनिस्‍थान, कबीरस्‍थान, नास्तिकस्‍थान कह दे. आपको लगता है कि राज्‍य ऐसा कहने वालों को छोड़ देगा? छोड़ नहीं देगा, तोड़ देगा. हर तरह से तोड़ देगा, हर तरह से. और धर्म विशेष के पक्ष और विपक्ष में उनके कई भाषण यत्र-तत्र बिखरे पड़े हैं. मुझसे ज्‍़यादा सहजता से आप ढूंढ लेंगे, और अपनी पसंद का. लचीला या तीखा : जैसा चाहेंगे मिल जाएगा. यानी वैसा कुछ भी करने की क्षमता और माद्दा न केवल वे रखते हैं बल्कि समय-समय पर इज़हार भी करते रहते हैं जिससे इस देश की धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक संरचना तार-तार होती है.
थोड़ी चर्चा आतंकवाद की. परिभाषा स्‍वयं देख लें. अब बताएं कि क्‍या श्रीमान आडवाणीजी के कारनामे आतंकवादी कहे जा सकने लायक़ हैं या या नहीं. उनके द्वारा, या उनके निर्देश से या उनके संरक्षण में या प्रत्‍यक्ष/परोक्ष रूप से उनकी मिलीभगत से, या उनकी जानकारी में, या उनकी निगरानी में होने वाली हर वो गतिविधि और हर वो कार्रवाई आतंकवादी है जिससे समाज समग्रता में या तबक़ा विशेष ख़ौफ़जदा होने को मजबूर होता या है. मिसालें जितनी चाहें, आपको मिल जाएंगी. फिर भी कुछ मोटे उदाहरण आपकी खिदमत में पेश करने की गुस्‍ताख़ी कर रहा हूं. क़रीब सोलह साल पहले श्रीमान लालकृष्‍ण ने राम के नाम पर एक यात्रा निकाली. उसके बाद क्‍या-क्‍या हुआ, कहां-कहां हुआ, कब-कब हुआ, कितना-कितना हुआ, कैसे-कैसे हुआ - आप जानते ही होंगे; हां आपको उस पर गर्व हो रहा होगा, हमें शर्म आती है. सरयूतीरे रचित नव अयोध्‍याकांड के प्रणेता कौन हैं और कौन प्रेरणास्रोत: मेरे ख़याल बताने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए. इस पर भी आप गर्व करेंगे.
यही सख्‍स कुछ साल पहले इस देश के गृहमंत्री थे और उसके उप भी जिसके प्रधान बनने की जल्‍दबाज़ी में हैं आजकल. तो उन दिनों देश के विभिन्न हिस्‍सों में और विशेषकर उन प्रदेशों में जहां-जहां सीधे उस पार्टी जिससे लालकृष्‍णजी ताल्‍लुक़ रखते हैं, की सरकार थी या फिर सहयोगी दलों का शासन जहां-जहां था; ईसाइयत में आस्‍था रखने वालों के साथ जमकर दुर्व्‍यवहार हुआ. दुर्व्‍यवहार क्‍या, संगठित जघन्‍य अपराध. जिन्‍दा जलाने से लेकर सामूहिक बलात्‍कार तक. लौहपुरुष एक बार भी न पिघले. पिघलते क्‍या, उल्‍टे परोक्ष रूप से अपराधियों की तरफ़दारी ही कर पाए. देखा नहीं आपने गुजरात के 'हिन्‍दु राष्‍ट्र' में प्रहरियों ने तलवार की नोंक से कैसे कौसरबानों की अजन्‍मी बिटिया को कोख से बाहर खींच कर सड़क पर मसल दिया! क्‍या-क्‍या कहा जाए. बहुत बातें हैं. मुझे मालूम है जितने तथ्‍य मैं गिना रहा हूं उसे ग्रहण तो आप करेंगे लेकिन पचा तभी पाएंगे जब आपको अमन और इंसानियत से प्यार होगा.
एक बात और बताउं आपको? ये आडवाणीजी देवद्रोही भी हैं. राम नामक एक देवता हुए हैं. उनके नाम पर मंदिर बनवाने के बहाने काफ़ी कुछ किया गया. मसलन देश भर में ईंटें घुमायी गयीं, डीजल वाला रथ घुमाया गया, देश भर से लोगों को ख़ासकर नौजवानों से फ़ैज़ाबाद जिले के अयोध्‍या में जमा होने का आवाहन किया गया और हज़ारों की तादाद में नौजवान बताए हुए स्‍थान पर पहुंचे, एक पुरानी मस्जिद ढाही गयी, उसके बाद दंगे हुए और करवाए गए, फिर चुनाव के वक्‍़त वोट मांगे और बटोरे गए, फिर जगह-जगह राज भोगा गया. और ये सब हुआ श्रीमान लालकृष्‍ण आडवाणी जी के प्रत्‍यक्ष और कभी-कभार परोक्ष नेतृत्‍व में. और इन 'महत्त्वपूर्ण' प्रक्रिया में डेढ़ दशक से ज्‍़यादा अवधि की खपत हो गयी. पर वो रामालय आज तक नहीं बन पाया. रामजी सोचते नहीं होंगे? सोचते होंगे, ज़रूर सोचते होंगे. मेरे खयाल से इतना कुछ हो जाने के बाद तो देवद्रोह का मामला भी बनता है. बल्कि स्‍पष्‍ट रूप से कहें तो रामद्रोह का. यानी आडवाणीजी रामद्रोही भी हुए?

आडवाणीजी और अनलॉफुल ऐक्‍िविटिज़ (प्रिवेंशन) अमेंडमेंट बिल 2008

लोकसभा चैनल पर चर्चा देख रहा हूं. थोड़ी देर पहले गृह मंत्री पी चितंबरम महोदय ने 'नेशनल इंवेस्टिगेटिंग एजेंसी बिल 2008 ऐंड अनलॉफुल ऐक्टिविटिज़ (प्रिवेंशन) अमेंडमेंट बिल 2008 पेश किया था और दोनों ही प्रस्‍तावित कानूनों के महत्त्वपूर्ण बिंदुओं को सदन के सामने रेखांकित किया था. उसके बाद सदन के अध्‍यक्ष ने विपक्ष के नेता लालकृष्‍ण आडवाणी को इस प्रस्‍ताव पर चर्चा आगे बढ़ाने के लिए आमंत्रित किया. आडवाणीजी 20 मिनट से ज्यादा बोल चुके हैं लेकिन अब तक गृह मंत्री द्वारा पेश किए गए बिल से अपनी 'सैद्धांतिक सहमति' जताने के अलावा कुछ नहीं बोला है उन्‍होंने. 20-25 मिनट से पकाए जा रहे हैं. कहे जा रहे हैं कि किस तरह दस साल पहले ही उन्‍होंने आतंकवाद से निपटने के रास्‍ते ढूंढ लिया था. उन्‍होंने मौजूदा सरकार को दृष्टिहीन बताया, ये भी बताया कि सरकार की निंद देर से खुली है. पता नहीं क्‍या-क्‍या बोला आडवाणीजी ने. सुनकर किसी भी क्षण ऐसा नहीं लगा कि उनकी किसी भी बात से कोई संदेश मिलेगा इस देश को. कितने स्‍वार्थी हैं आडवाणीजी. जो बोलते हैं वोट की दृष्टि से ही बोलते हैं. पता है कि देश के लोग देख रहे हैं, अच्‍छा मौक़ा है रिझाने का; सो रिझाने लगे.
गृहमंत्री द्वारा पेश किए गए दोनों विधेयकों में क्या-क्‍या है या होगा: अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है. इससे पहले भी आते रहे हैं ऐसे विधेयक, बनते रहे हैं क़ानून और इक्‍के-दुक्‍के मामलों को छोड़कर कमज़ोर लोगों पर इन क़ानूनों के तहत अत्‍याचार किया जाता रहा है. मतलब ये कि थोड़ा घटा-बढा कर फिर कोई टाडा या पोटा आ जाएगा जिसे अख़बार और टेलीविज़न वाले बता देंगे. अन्‍यथा कई अन्‍य स्रोतों से पता चल जाएगा. हम विश्‍लेषण कर लेंगे कि दोनों विधेयकों में आतंकवाद को रोकने की कूवत है या नहीं, कहीं ये विधेयक हमारे बुनियानी आजादी तो नहीं छीन लेंगे, या किसी धर्म, जाति, रंग या किसी अन्‍य मसलों से प्रेरित तो नहीं हैं ये विधेयक, आदि-आदि. पर आडवाणीजी ने जो कहा, उनमें इन विधेयकों पर उनकी राय के अलावा अपने आप को आतंकवाद का चैंपियन बताने के अलावा उन्‍होंने कुछ नहीं कहा्. आज आडवाणीजी को सुनकर लगा कि ये आदमी आठ दशक जी लेने के बाद भी बचकानी हरकते ख़ूब करता है. जैसे बच्‍चे झूठ बोलते हैं, गाल बजाते हैं, बात-बात पर अपनी राय और पोजिशन बदलते हैं, चीखने-चिल्‍लाने लगते है, छाव धरते हैं, इतराते हैं, अगराते हैं, डराते हैं, धमकाते हैं, पैर पटकते हैं, नाक-भौं चमकात हैं, आदि-आदि; लालकृष्‍ण आडवाणी को सुनकर लगा कि इनके स्‍वभाव में ये सारे लक्ष्‍ण प्रचूर मात्रा में मौजूद है.
शाम तक शायद ये दोनों विधेयक पारित हो जाएं. मुझ जैसे एक टैक्‍सपेयर को उस वक्‍़त बड़ी खुशी होगी जब इन विधेयकों के क़ानून बन जाने के बाद इनके तहत सबसे पहले आडवाणीजी पर क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी. शायद इन क़ानूनों के तहत कार्रवाई के लिए इनके मुक़ाबले का योग्‍य पात्र कम ही मिल पाएगा.
सन् 92 में इन्‍होंने देश भर से नौजवानों को बरगला कर उत्तरप्रदेश के फ़ैज़ाबाद जिले के अयोध्‍या नामक क़सबे में इकट्ठा किया. इस क्रम में जगह-जगह अयोध्‍या पहुंचने वालों की हुड़दंगी कार्रवाइयों से लाखों का नुकसान हुआ. इतना ही नहीं लालकृष्‍ण की अगुवाई में 6 दिसंबर को इन लोगों ने भारतीय पुरातत्त्व के नज़रिए से बेहद महत्त्वपूर्ण इमारत को ढाह दिया दिया. आडवाणीजी के नेतृत्‍व में देश भर में सिर पर केसरिया पट्टी बांधे लोग सरेआम अस्‍त्र-शस्‍त्र लेकर नाचते रहे. न जाने कितनी हत्‍याएं हुईं, कितने घर और अस्‍मत लुटे उस दौरान और उसके बाद; इतिहास के पन्‍नों में दर्ज हैं. क्‍या इतना संगठित अपराध और उसका नेतृत्‍व करना आतंकवादी कार्रवाई नहीं है? अपने हिसाब से तो है. है तो आडवाणीजी फिट पात्र हैं इसके तहत बुक करने के लिए.
ये आडवाणीजी न केवल आतंकवादी हैं, बल्कि शायद देशद्रोही भी हैं. संविधान के मुताबिक़ हमारे देश का नाम भारत और इंडिया है. वैसे तो यहां-वहां बोलते ही रहते हैं लेकिन आज लोक सभा में अपने भाषण के दौरान भी कम से कम एक दर्जन से ज्‍़यादा बार आडवाणीजी ने हिन्‍दुस्‍थान उच्‍चारित करके हमारे देश के संविधान का न केवल उल्‍लंघन किया बल्कि कलंकित भी किया. हमारी ये बदकिस्‍मती है कि जिस सख्‍़श को आतंकवादी और देशद्रोही कार्रवाइयों के लिए सलाखों के पीछे होना चाहिए था आज संसद में बैठकर हमारे लिए क़ानून बना रहा है और कल प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहा है.

22.7.08

किंग बनकर निकले सिंह

आखिरकार, युपीए की सरकार को लोक सभा में सम्मानजनक विश्वास मिल गया और सिंह किंग बन कर निकले. दो दिन से प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा लोकसभा में पेश किए विश्वास मत पर बहस की कोशिश हो रही थी. कोशिश इसलिए कि सदन में बातचीत का जितना सिकुड़ा माहौल दिखा उसमें किसी भी प्रकार का बहस संभव नहीं लगता. किलकारी के क्रेश और प्ले स्कूल में बच्चे भी ऐसी अनुशासनहीनता और उद्दंडता पर नहीं उतरते जैसी लोकसभा के सदस्यों ने दिखायी. किसी सदस्य ने एक शब्द बोला नहीं कि बगल से दर्जनों मुंह उसके खिलाफ़ थूक समेत न सुनाई देने वाली चीख उगलने लगते थे. मज़ेदार ये दिखा कि भाजपा और उसके सहयोगी दलों के सदस्यों को बेमतलबी चीख में शेष दलों के सदस्यों के मुक़ाबले ज़्यादा महारत हासिल है. विश्वास मत के पक्ष में बोलने वालों का विरोध तो किया ही उन्होंने, जो इस मोशन के खिलाफ़ बोलते थे उसके पीछे से (समर्थन में ?) शोर मचाने का मौक़ा भी नहीं जाने दिया. और प्रधानमंत्री बनने की हड़बड़ाहट में बेचैन, जिनकी भारतीय लोकतंत्र में कोई आस्था नहीं है जो हमेशा हमारे देश को ग़ैरसंवैधानिक नाम ‘हिंदूस्थान’ से संबोधित करते हैं – से अपने सांसदों को अनुशासित रहने का निर्देश देने की उम्मीद आप कर सकते हैं, मुझे तो नहीं है. और तो और आज दोपहर बाद तक सदन से बाहर रहकर वे ‘संसद में नोट’ नाटक का निर्देशन करते रहे.
दो दिनों में कम से कम चार बार सदन की कार्रवाई रोकनी पड़ी अध्यक्ष या पीठासीन उपाध्याक्ष को. और इसका सारा श्रेय भाजपा और उसके सहयोगियों को जाता है. हां, सरकार से हाल ही में नाता तोड़े वामपंथी भी इस हुले-हुले में पीछे नहीं रहे. और तो और कॉमरेड वासुदेव आचार्या तो अपने बाद वाले वक्ता को बोलने देने को तैयार ही नहीं दिखे. बार-बार अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी अगले वक्ता को बोलने देने का अनुरोध करते रहे लेकिन कॉमरेड ने उनकी एक न सुनी. भाजपा के तीन सांसदों ने अपना नाटक शुरू न किया होता तो शायद कॉमरेड रूकते भी नहीं.
इससे और नीचे क्या गिरेगी सदन की मर्यादा, नोटों की थैली आ गयी. जिसकी चर्चा पिछले एक हफ़्ते से हो रही थी आज सदन में साक्षात दिखा. इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इस विश्वास मत के पक्ष में सहयोग जुटाने के लिए कुछ-न-कुछ अतिरिक्त हुआ है जो आम तौर पर नहीं होता. यानी तरह-तरह के सुख-सत्ता, धन-पद और प्रतीष्ठा का प्रलोभन. पर इसका ये अर्थ नहीं कि इस तरह से किसी नाटक का मंचन किया जाए. भाजपा के तीन सांसदों ने जो रोल प्ले किया आज सदन में उससे भाजपा की खलनायकी खुलकर सामने आ गयी. उन्हीं सांसदों ने 4 बजे के क़रीब लोकसभा की कार्रवाई स्थगित हो जोने के बाद ख़ूब फुदक-फुदक कर ख़बरिया चैनलों को बताया कि कैसे-‍कैसे उन्होंने इस नाटक का मंचन किया. नाम लिया अमर सिंह, अहमद पटेल और किसी एक और नेता का. उन्होंने ये बताया कि कल से ही नेपथ्य में काम चल रहा था. आज सुबह लोकसभा का सत्र आरंभ होने से पहले नाटक की तैयारी कर ली गयी थी. मेरा प्रश्न ये है कि अगर रिश्वत लेने-देने की कार्रवाई दोपहर से पहले पूरी हो गयी थी तो चार बजे तक का इंतज़ार क्यों किया गया ? क्यों ये ड्रामा संसद में खेला गया? अरे भैया, पहली बात तो ये कि कोई आपकी जेब में जबरन पैसा ठूंस नहीं दिया और ठूंसा भी नहीं जा सकता, क्योंकि आपके मुताबिक रुपया एक करोड़ था (शुक्र है पूरा 9 करोड़ नहीं था वर्ना कम से कम ऑटो लेकर लोकसभा जाना होता). यानी आपकी मिलीभगत के बिना ये लेन-देन हो ही नहीं सकती थी. अगर मान लिया जाय कि आपको कोई स्टींग ही करना था आपको तो पुलिस हेडक्वार्टर चले जाते, लोकसभा अध्यक्ष के पास चले जाते और नहीं तो लोक सभा के बाहर मीडिया वालों और आम जनता के सामने एक-एक नोट गिनकर दिखा देते. आपने लोकसभा को कमानी और श्रीराम सेंटर बना दिया. आपको क्या लगता है कि भारत का आम जनमानस आपकी इस कार्रवाई से बड़ा खुश होगा! जिस संसद परिसर में और उसके बाहर चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा एजेंसी तैनात होती है, उस परिसर में लोकसभा में कोई नोटों से भरा बैग लेकर कैसे चला गया? क्या सांसदों को बिना जांच-पड़ताल संसद परिसर में कुछ भी ले जाने की इजाजत है. संभव है ऐसे में किसी दिन कोई बैग में आरडीएक्स भी ले जाता सकता है.
हैं कोई स्वयं साहब. उड़ीसा से आते हैं. भाजपा से संबद्ध हैं. अपने आप को सदन का सबसे तेज़-तर्रार सदस्य समझते हैं. युवा हैं. हमेशा जोश-ओ-खरोश में रहते हैं. शायद ही कोई वक्ता रहा हो जिसके बोलते समय उन्होंने अपना मुंह न खोला हो. और तो और अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी तक को उन्होंने नहीं बख़्शा. आरोप लगाया अध्यक्ष पर कि वे सदन में स्तरीय बहस होने ही नहीं देना चाहते हैं. लगता है जैसे शेष सांसद अनर्गल बकवास करने वाले हैं या कर रहे हैं. हालांकि विश्वास मत के विरोध में बोलने वालों में ज़्यादातर ने मुख्य मुद्दे से इतर ही कहा. ज़्यादातर अनर्गल.
कल कॉमरेड सलीम ने लोकसभा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की ओर बड़ा उग्र भाषण दिया, बड़ी भावुक बातें की. पर उनकी बात में एक बार भी सिंगूर या नंदीग्राम का जिक्र नहीं आया. इस साल की शुरुआत में जिस तरह का अत्याचार बंगाल सरकार और सीपीएम ने नंदीग्राम की ग़रीब और स्वाभिमानी जनता पर किया, मेरे ख़याल से आज़ाद भारत में वैसी मिसाल कम ही मिलेगी. ख़ैर, सीपीएम सदस्य क्यों बोलते सिंगूर पर. लेकिन जगते-सोते वामपंथ को कोसते वाली भाजपा भी सिंगूर और नंदीग्राम पर मौन रही.
अंत में, लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी की जितनी भी सराहना की जाए कम होगी. जिस सूझ-बूझ से उन्होंने कार्रवाई का संचालन किया वो उन जैसे व्यक्तित्व वाले लोगों से ही हो सकता है. ‘नोटों के नाटक’ वाले इस ज़माने में शायद अब ऐसे व्यक्तित्व दर्शक दीर्घा में भी नहीं मिलेंगे.