28.7.08

'चंबल तक का सोना यहां गलाया जाता है'

पेश है गोपाल प्रधान के लेख अट्ठाईस कि.मी. इंग्लिश चैनल की अगली किस्त. अब तक आपने पढ़ा कि लेखक किस हालत में शाहजहांपुर पहुंचे थे। उन्होंने शाहजहांपुर ज़िले और पुवायां तहसील का एक संक्षिप्त तार्रुफ़ भी दिया. आइए आगे पढ़ते हैं वहां जेवरात और बंदूक की क्या अहमियत है और कैसे इन्हें जुटाया जाता है तथा किस तरह यहां अधिकारी मौज़ करते हैं.
ज़ेवरात और बंदूक़
यहाँ आते ही दो चीज़ें सबसे पहले आपका ध्यान आकर्षित करती हैं। क़स्बे की छोटी-सी आबादी के बावज़ूद ज़ेवरात की

आर्थिक लूट के तीन स्रोत परंपरागत रूप से रहे हैं: ग्रीन मनी - अर्थात खेती, मुख्यतः गन्ना मिलों के इर्द-गिर्द बना माफ़िया तंत्र, व्हाइट मनी अर्थात ब्राउनशुगर की तस्करी से मिला पैसा और यलो मनी अर्थात सोने के व्यापार से पैदा होने वाला पैसा। इसी के साथ दो नए स्रोतों को जोड़ लीजिएसांसदों-विधायकों को विकास कार्यों के लिए मिले धन का कमीशन और अपरहण उद्योग।

70 दुकानें और ज़िला मुख्यालय पर तक़रीबन 500 दुकानें। आख़िर ये सब दुकानें करती क्या हैं? ऊपर से पूछिएगा तो पता चलेगा गिरवी गाँठ का काम होता है। बताते हैं कि चंबल तक का सोना यहाँ गलाया जाता है। वैसे तो बंदूक़ भी एक ज़ेवर की तरह यहाँ के घरों में विराजती है। आमदनी का एक बड़ा हिस्सा असलाह ख़रीदने में ख़र्च होता है। शस्त्र लाइसेंस दिलाना भी नेताओं की एक बड़ी ज़िम्मेदारी है। अफ़सरों के मुँहलगे दलाल इसी के लए तमाम लोगों को आगे-पीछे दौड़ाते रहते हैं। एक लाइसेंसी असले के पीछे कम से कम पाँच ग़ैर-लाइसेंसी असले मिलेंगे।
आर्थिक लूट के तीन स्रोत परंपरागत रूप से रहे हैं: ग्रीन मनी - अर्थात खेती, मुख्यतः गन्ना मिलों के इर्द-गिर्द बना माफ़िया तंत्र, व्हाइट मनी अर्थात ब्राउनशुगर की तस्करी से मिला पैसा और यलो मनी अर्थात सोने के व्यापार से पैदा होने वाला पैसा। इसी के साथ दो नए स्रोतों को जोड़ लीजिएसांसदों-विधायकों को विकास कार्यों के लिए मिले धन का कमीशन और अपरहण उद्योग। सहकारिता आंदोलन पर पहले कॉन्ग्रेस की पकड़ थी। भाजपा के प्रभुत्व के बढ़ने के साथ नए समीकरण उभरते हैं। चीनी मिलों में पहले जब पर्चियों के ज़रिए भुगतान होता था तो गन्ना माफ़िया ज़रूरत के वक़्त गन्ना किसानों को गन्ने का औना-पौना दाम लगाकर पैसे दे देता था और बदले में पर्चियाँ रख लेता था जिनका पूरा भुगतान चीनी मिल से होता था। अब चीनी मिलों को अधिकांश समय बंद रखने के लिए क्रशर मालिक डायरेक्टर्स और मिल प्रबंधन को घूस देते हैं, क्योंकि मिल के बंद रहने पर क्रशर में मनमाना दाम लगाकर गन्ना ख़रीदने में आसानी होती है। को-ऑपरेटिव बैंकों में गन्ना किसानों के भुगतान और खेती के लिए ज़ारी क़र्ज़ पर बँधा-बँधाया कमीशन है, जिसका एक हिस्सा संचालकों, नेताओं और आधिकारियों को जाता है।
अपहरण उद्योग के बारे में मुझे एक परिचित के अपहरण और उनकी रिहाई से पता चला। हमारे कॉलेज से बी.. करके वह विद्यार्थी एम.. में ज़िला मुख्यालय के एक कॉलेज में आया था। बीच में गाँव जाने पर पुवायाँ दशहरा के मेले में गया। वह और उसका एक दोस्त मोटरसाइकिल पर थे। अचानक उनके पीछे से एक सुमो जैसी जीप आई और उसकी मोटरसाइकिल के आगे इस तरह खड़ी हुई कि उन्हें मोटरसाइकिल रोक देनी पड़ी। छह-सात लोगों ने दोनों को उठाकर जीप में लाद लिया और उनके हाथ पीछे बाँध दिए। उन्होंने उनकी आँखों पर पट्टी चढ़ाकर सीट के ऊपर लिटा दिया तथा उनके ऊपर बैठ गए। फिर उन्हें काफ़ी देर चलने के बाद एक जगह उतारा गया। वहाँ से पैदल घंटों चलकर वे पास के एक जंगल में पहुँचे। यह जगह शाहजहाँपुर-बदायूँ की सीमा पर जलालाबाद तहसील में रामगंगा की कहदी कहलाती है। वहाँ उन्हें ज़मीन पर डाल दिया गया और एक-एक रोटी खाने को दे दी गई। भोजन की यह अल्पमात्रा इसलिए दी जाती थी ताकि वे इतने कमज़ोर हो जाएँ कि भाग सकें। फिर उनकी रिश्तेदारियों में फ़िरौती की रक़म के लिए चिट्ठियाँ भेजी गई। अपहर्ताओं को इस बात का पता रहता था कि उनके ग़ायब होने की कोई रिपोर्ट लिखवाई गई है या नहीं। इस इलाक़े में दस-पंद्रह बरस

यहाँ अगर किसी अधिकारी की नियुक्ति हो गई तो वह किसी भी स्थिति में तबादला नहीं चाहता। और तो और पुश चिकित्सा अधिकारी भी मालमाल है क्योंकि पशुओं को काटने के लिए उनके बीमार होने का प्रमाण पत्र ज़ारी करने के लिए उनकी फ़ीस नियत है। एक ज़िलाधिकारी महोदय बग़ल के ज़िले के रहने वाले थे। उन्होंने अपने गाँव में अपने माता और पिता के नाम से दो डिग्री कॉलेज खोले जिनके लिए ईंट, सरिया सीमेंट और पैसा शाहजहाँपुर से जाता था। तमाम अधिकारियों यहाँ तक कि यातायात अधिकारी ने भी दो ट्रक गिट्टी और कुछ पैसा उनको दिया था।

से जो पुलिसवाले तैनात हैं, वे कहीं और तबादला हो जाने पर उसे रद्द कराने के लिए राजनीतिज्ञों के ज़रिए अधिकारियों पर दबाव डलवाते हैं।
गिरोह के लोग रोज़ आते और अपने अपहरणों के क़िस्से सुनाते। उसी क्रम में उन्होंने यह भी बताया कि यदि अपेक्षित रक़म उन्हें नहीं मिली तो वह इसपकड़को बड़े गिरोह के हाथों बेच देंगे जो या तो बड़ी रक़म वसूलेगा या उसके शरीर के विभिन्न अंगों को निकलवाकर बेच देगा। इस उद्योग से जुड़े हुए गिरोह मिथकीय माहिमा रखते हैं। और गिरोह के मुखियाओं का नाम बड़े अदब से लिया जाता है।
यहाँ कुछ गाँव ऐसे हैं जहाँ के लोग दिन में खेतों में काम करते हैं और शाम को डकैती के लिए निकल पड़ते हैं। पुराने क़िस्म के गिरोह घोड़ियों पर चला करते हैं। मेरे एक मित्र ने बताया कि वे शाम को एक गाँव के क़रीब पहुँचे तो वहाँ के एक बुजुर्ग ने सावधान करते हुए कहा किघोड़िन को सजन को टाइम हुई गयो है।ये गिरोह पुलिस थानों को नियमित हिस्सा देते हैं जो थाने सेऊपरउसका बँटवारा राजनेताओं और अधिकारियों के बीच होता है।
अधिकारी की मौज़
यहाँ अगर किसी अधिकारी की नियुक्ति हो गई तो वह किसी भी स्थिति में तबादला नहीं चाहता। और तो और पुश चिकित्सा अधिकारी भी मालमाल है क्योंकि पशुओं को काटने के लिए उनके बीमार होने का प्रमाण पत्र ज़ारी करने के लिए उनकी फ़ीस नियत है। एक ज़िलाधिकारी महोदय बग़ल के ज़िले के रहने वाले थे। उन्होंने अपने गाँव में अपने माता और पिता के नाम से दो डिग्री कॉलेज खोले जिनके लिए ईंट, सरिया सीमेंट और पैसा शाहजहाँपुर से जाता था। तमाम अधिकारियों यहाँ तक कि यातायात अधिकारी ने भी दो ट्रक गिट्टी और कुछ पैसा उनको दिया था। पुवायाँ तहसील में चार साल रुकने वाले एक उप-ज़िलाधिकारी ने तक़रीबन पाँच करोड़ रुपए बनाए। उसके यहाँ कोई अधिकारी आए एक अच्छी

मंडी में जिन व्यापारियों की दुकानें हैं, उनमें से एक व्यापारी अपने तराज़ू के पल्ले के नीचे किलो का बटखरा चिपकाए हुए था। वह अधिकारियों का सबसे चहेता व्यापारी है। ये व्यापारी पूरे साल किसानों को खेती के लिए कर्ज़ देते हैं। बदले में किसान उन्हीं के यहाँ ग़ल्ला बेचता है। अनाज़ की क़ीमत में से क़र्ज़ और सूद काट लिए जाते हैं। उस व्यापारी ने अफ़सरों को मौज़ कराने के लिए क़स्बे में स्वीमिंग पूल बनवा रखा था। इसके अलावा पंजाब से आए लोगों में से भी बड़े किसान, पेट्रोल पम्प मालिक, ट्रैक्टर ट्रॉली के विक्रेता इत्यादि ऐसे लोग हैं जिनके घर अफ़सरों की आरामगाह हैं। अफ़सर को ये सब सुविधाएँ पासपोर्ट बनवाने, हथियारों के लाइसेंस दिलाने, किसी मामले में फँस जाने पर राहत दिलाने और मुख्यतः अवैध काग़जात को क़ानूनी सुरक्षा प्रदान करने के लिए मुहैया कराई जाती हैं।

दुधारू गाय पहुँच जाएगी। उसका चारा भी कोई पहुँचा जाएगा और दूध भी दुहकर उसके घर पहुँच जाएगा। सिर्फ़ छह महीने के लिए उप-ज़िलाधिकारी रहे एक सज्जन ने मारूति ख़रीद ली।
मंडी में जिन व्यापारियों की दुकानें हैं, उनमें से एक व्यापारी अपने तराज़ू के पल्ले के नीचे किलो का बटखरा चिपकाए हुए था। वह अधिकारियों का सबसे चहेता व्यापारी है। ये व्यापारी पूरे साल किसानों को खेती के लिए कर्ज़ देते हैं। बदले में किसान उन्हीं के यहाँ ग़ल्ला बेचता है। अनाज़ की क़ीमत में से क़र्ज़ और सूद काट लिए जाते हैं। उस व्यापारी ने अफ़सरों को मौज़ कराने के लिए क़स्बे में स्वीमिंग पूल बनवा रखा था। इसके अलावा पंजाब से आए लोगों में से भी बड़े किसान, पेट्रोल पम्प मालिक, ट्रैक्टर ट्रॉली के विक्रेता इत्यादि ऐसे लोग हैं जिनके घर अफ़सरों की आरामगाह हैं। अफ़सर को ये सब सुविधाएँ पासपोर्ट बनवाने, हथियारों के लाइसेंस दिलाने, किसी मामले में फँस जाने पर राहत दिलाने और मुख्यतः अवैध काग़जात को क़ानूनी सुरक्षा प्रदान करने के लिए मुहैया कराई जाती हैं।
जंगलात की ज़मीन के अलावा अन्य कई तरह की ज़मीनें हैं जिन पर अवैध क़ब्ज़ा बना हुआ है। मसलन, एक गौसदन है जिसके नाम चार सौ एकड़ ज़मीन है लेकिन इस पर अवैध कब्ज़ा है और इसके लिए अक़सर हत्याएँ भी होती रहती हैं।

4 comments:

  1. ये तो किसी बर्बर युग की किसी बर्बर इलाके की दास्तान लगती है...

    हे ईश्वर, क्या भारत में अब भी ऐसी जगहें हैं?

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  2. बहुत गजब का सामान ढूंढ लाये हैं आप. शुक्रिया

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  3. शाहजहाँपुर में मैं सात वर्ष रहा हूँ (८ से १५ वर्ष तक) । इस पोस्ट ने कुछ यादों की पोटली खोल दी है ।

    अब बाकी की पोस्ट भी पढूँगा,

    धन्यवाद !!!

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